भारत में अब महिलाओं का व्यवसाय चलाना एक आम बात बन चुकी है। भारतीय महिलाएं अब परिवर्तन की ताकत के रूप में उभर रही हैं और विभिन्न क्षेत्रों में विकास, नवाचार(इनोवेशन) और मजबूती को बढ़ावा देते हुए आर्थिक सशक्तिकरण की अग्रदूत बन रही हैं।
यह बदलाव यूं ही नहीं हुआ है। यह नारी शक्ति को नए अवसर प्रदान करने लिए लगातार किए गए प्रयासों का नतीजा है — जिसमें नीतिगत समर्थन, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता के लिए सहयोग जैसी चीजें शामिल हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत ने एक आदर्श बदलाव देखा है, जहां महिलाओं को सशक्त बनाना अब सिर्फ राजनीतिक फायदे का जरिया नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नीति बन गया है।
महिलाओं को वित्तीय सेवाओं तक पहुंच दिलाने से लेकर बिना गारंटी के लोन देने तक — वर्तमान सरकार बहुआयामी तरीकों से हर वह बाधा हटा रही है जो नारी शक्ति को आर्थिक रूप से सशक्त होने से रोकती है।
हर महिला को मिला आर्थिक बल
इस बहुआयामी प्रयास का पहला कदम था महिलाओं को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना। रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2011 में भारत में केवल 26% महिलाओं के पास ही बैंक खाता था। हर ऐसे व्यक्ति को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने के लिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की शुरुआत की गई। और इस योजना की सबसे बड़ी लाभार्थी महिलाएं बनीं।
इस योजना की शुरुआत के दो साल के भीतर, बैंक खाता रखने वाली महिलाओं की संख्या 77% तक पहुंच गई।
ये सिर्फ आर्थिक बल ही नहीं बल्कि इन खातों का एक सकारात्मक सामाजिक प्रभाव भी देखा गया। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक स्टडी के मुताबिक, जिन राज्यों में PMJDY खातों की संख्या ज्यादा है, वहां इस योजना का असर भी ज्यादा दिखा है।
इन राज्यों में अपराध के मामलों में कमी तथा शराब व तंबाकू के सेवन में भी गिरावट दर्ज की गई है।
यह असर 'जन धन–आधार–मोबाइल (JAM)' ट्रिनिटी की वजह से और बढ़ा, जिसने सब्सिडी वितरण को बेहतर बनाया और ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-उपयोगी खर्च को भी कम किया गया है।
बिना गारंटी वाला लोन, अब हर किसी की पहुंच में
अगला कदम महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के रूप में उठाया गया।
एक समय था जब लोगों को स्थानीय साहूकारों से ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ता था और कई बार कर्ज न चुका पाने की स्थिति में उन्हें अपनी जमीन या घर जैसी ज़मानत खोनी पड़ती थी।
इस स्थिति को सुधारने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि के तहत लगभग एक दशक पहले प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PM-MUDRA Yojana) शुरू की गई। इस योजना के तहत 20 लाख तक का बिना किसी ज़मानत के लोन दिया जाता है, जिससे मुख्य रूप से वंचित तबके के लोगों को लाभ मिला है।
इसकी शुरुआत से अब तक 52 करोड़ से अधिक लोन स्वीकृत किए जा चुके हैं। इन लोन में से 70% महिलाओं को दिए गए हैं, जिससे उनके उद्यमशीलता के आत्मविश्वास को मजबूती मिली है। 2024 तक महिलाओं को शिशु श्रेणी में 1.08 लाख करोड़ से अधिक, किशोर श्रेणी में 1 लाख करोड़ से अधिक और तरुण श्रेणी में 13,400 करोड़ से अधिक के लोन दिए जा चुके हैं, जिससे वे उद्यमी बन सकीं।
महिलाओं को अधिक लोन देने से महिलाओं के नेतृत्व वाले MSMEs के माध्यम से रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो लक्षित वित्तीय समावेशन की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और श्रम बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ाने में प्रभावशीलता को दर्शाता है।
इसके अलावा, महिलाओं के स्वामित्व वाले MSMEs, जो उद्यम पोर्टल पर 2020 से पंजीकृत कुल MSMEs का 20.5% हैं। ये महिला स्वामित्व वाली MSMEs कुल पंजीकृत उद्यमों द्वारा सृजित रोजगार का 18.73% योगदान देती हैं।
महिलाओं के नेतृत्व वाले MSMEs न केवल उत्पादन बढ़ाते हैं, बल्कि लैंगिक समावेशन में भी योगदान देते हैं।
यह बदलाव विशेष रूप से ग्रामीण(रूरल) और अर्ध-शहरी(सेमी अर्बन) क्षेत्रों की महिलाओं के लिए प्रभावशाली है, जिनके पास पहले औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच नहीं थी।
यह वित्तीय समावेशन केवल व्यक्तिगत जीवन ही नहीं बल्कि पूरे समुदाय और राष्ट्र को बदल रहा है।
सरकारी योजनाएं महिलाओं को नौकरी देने वाली बनने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार कर चुकी हैं। स्टैंड-अप इंडिया योजना के तहत 75% लोन महिला उद्यमियों को दिए गए हैं।
महिला उद्यमियों के खातों की संख्या 55,644 से बढ़कर 1,90,844 हो गई है, और स्वीकृत राशि लगभग 12,452 करोड़ से बढ़कर 43,984 करोड़ से अधिक हो गई है।
इसी तरह, पीएम स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि (PM SVANidhi) के तहत भी महिलाएं बिना ज़मानत के सूक्ष्म ऋण सुविधाएं ले रही हैं। शुरूआत से अब तक कुल लाभार्थियों में से 45%, यानी लगभग 30 लाख लाभार्थी महिलाएं सड़क विक्रेता हैं।
केंद्र सरकार के बजट 2025-26 में एससी/एसटी समुदाय की 5 लाख पहली बार उद्यमी महिलाओं के लिए नई योजना की घोषणा की गई है, जिसमें अगले पांच वर्षों में 2 करोड़ तक के टर्म लोन दिए जाएंगे।
ग्रामीण विकास में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका
स्वयं सहायता समूह (SHGs) ग्रामीण विकास के केंद्र बिन्दू में हैं। साल 2014 से प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने हर गरीब ग्रामीण परिवार की कम से कम एक महिला को SHGs में शामिल करने और उन्हें आर्थिक गतिविधियों में सशक्त बनाने का मिशन शुरू किया है।
जनवरी 2025 तक लगभग 10.05 करोड़ महिलाओं के परिवारों को 90.90 लाख SHGs में जोड़ा गया है। साथ ही, सरकार ने SHGs के उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी भी की है।
DAY-NRLM के तहत, सामुदायिक संस्थाओं को लगभग 48,000 करोड़ की पूंजी सहायता मिली है, जबकि स्वयं सहायता समूहों ने 9.85 लाख करोड़ के बैंक लोन प्राप्त किए हैं।
इस मिशन ने लगभग 4 करोड़ महिला किसानों को सशक्त बनाया है और 3.13 लाख से अधिक उद्योगों का समर्थन किया है।
प्रधानमंत्री मोदी के 3 करोड़ लाखपति दीदियों के विजन के अनुरूप, अब तक 1.15 करोड़ महिलाएं लाखपति दीदी बन चुकी हैं, और पूरे भारत में 2.91 करोड़ संभावित लाखपति दीदियों की पहचान की गई है।
सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए, सरकार महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक से लैस कर रही है। अगले तीन वर्षों (2023-24 से 2025-26) में इन SHGs को 15,000 ड्रोन दिए जाएंगे, जो कृषि और संबंधित क्षेत्रों में स्थायी व्यावसायिक अवसर खोलेंगे।
यह साहसिक पहल प्रत्येक SHG की वार्षिक आय को कम से कम 1 लाख तक बढ़ाने का लक्ष्य रखती है, जिससे ग्रामीण महिलाओं की आजीविका में बड़ा बदलाव आएगा और वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनेंगी।
आगे का रास्ता
नारी शक्ति अब नौकरी देने वाली बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं, उनकी वित्तीय साक्षरता बढ़ी है, वे जनधन खातों और डिजिटल उपकरणों जैसे जन समर्थ पोर्टल और मुद्रा कार्ड के जरिए सीधे बैंकिंग सेवा तक पहुंच रही हैं। महिलाएं अब स्वतंत्र वित्तीय निर्णय ले रही हैं, रोजगार सृजित कर रही हैं और अपने समुदायों में प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं।
महिलाएं अब स्वतंत्र वित्तीय निर्णय ले रही हैं, रोजगार सृजित कर रही हैं और अपने समुदायों में प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं।
इसका प्रभाव ग्रामीण महिला श्रम भागीदारी दर (FLFPR) में भी देखा जा सकता है। PLFS डेटा के अनुसार, ग्रामीण महिला श्रम भागीदारी दर 2017-18 और 2023-24 के बीच 23 प्रतिशत अंक से काफी बढ़ी है।
नारी शक्ति न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं, बल्कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी शामिल हो रही हैं, क्योंकि लगभग आधे DPIIT-स्वीकृत स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक होती है।
आधिकारिक स्तर पर निर्णय लेने के अलावा, महिलाएं परिवार के निर्णय लेने में भी आगे हैं। NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाएं 88.7% महत्वपूर्ण घरेलू निर्णयों में हिस्सा लेती हैं।
सरकार के पिछले एक दशक में किए गए बहुआयामी प्रयासों से बदली महिलाओं की अनगिनत कहानियां यह दिखाती हैं कि एक छोटा सा कर्ज कैसे जीवन बदल सकता है, समुदायों को सशक्त बना सकता है और भारत के भविष्य को आकार दे सकता है।
महिलाओं को वित्तीय रूप से सशक्त बनाना न केवल उनकी आज़ादी सुनिश्चित करता है, बल्कि देश की समावेशी विकास की दिशा में भी प्रगति को आगे बढ़ाता है।