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99 big irrigation projects, which have been stalled for decades, are now being fast tracked, at a cost of almost Rs. 90,000 crore: PM
Government is working with a new vision for agriculture and farmers, by trying to fundamentally solve problems associated with agriculture: PM
For the first time since independence, the Government is thinking of housing needs of the middle class and giving relief on interest, along with financial assistance: PM

मंच पर विराजमान झारखंड के राज्‍यपाल श्रीमतीद्रोपदी मुरमू जी, राज्‍य के ऊर्जावान मुख्‍यमंत्री श्रीमान रघुवर दास जी, मंत्रीपरिषद के मेरे सहयोगी श्रीमान सुदर्शन भगत जी, बिहार और झारखंड से आए हुए संसद के मेरे साथीगण, झारखंड मंत्रीमंडल के मानयीय सदस्‍य विधायकगण और इतनी विशाल संख्‍या में पधारे हुए मेरे प्‍यारे भाईयो और बहनों और मैं देख रहा हूं, मेरे सामने जो दिखता है अब पता नहीं चल रहा है कि सच्‍ची सभा वहां है कि यहां है। शायद इससे तीन गुना लोग वहां है और जो बाहर धूप में खड़े हैं, मुझे पता नहीं कि उन्‍हें सुनाई देता होगा कि नहीं देता होगा, इतनी बड़ी तादाद में इतने उंमग और उत्‍साह के साथ आप सब हम लोगों को आशीर्वाद देने के लिए आए। मैं आपका सर झुकाकर के अभिनंदन करता हूं, आपको नमन करता हूं।

झारखंड की विकास यात्रा के साक्षी आप सब इस विकास यात्रा के भागीदार हैं। ये आपका साथ और सहयोग है जिसके कारण ये विकास यात्रा तेज गति से आगे बढ़ रही है। 2019 का वर्ष प्रारंभ हुआ है और पहले ही सप्‍ताह जब आपके बीच आया हूं। तो मैं आप सबको नव वर्ष की भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

वीर प्रसुत्‍ता धरती पलानो जहां अंग्रेजों के नाको चने चबाने वाले स्‍वतंत्र सेनानी नीलांबर पीतांबर की गौरव गाथा के जीवन का हिस्‍सा है। इस धरती के हर सपूत, हर वीर, हर बेटी को हम सब नमन करते है। मैं प्रधानमंत्री आवास योजना के उन 25 हजार लाभार्थी परिवारों को भी विशेष बधाई देता हूं जो आज अपने नए, पक्‍के घर में प्रवेश कर रहे हैं। नए साल में नए घर की उन्‍हें डबल बधाई और घर पक्‍का होता है तो संकल्‍प भी पक्‍का बन जाता है और सपने भी सुहाने लगने लगते हैं। और इसलिए पक्‍के नए घर के लाभार्थियों को अनेक-अनेक बधाई।

साथियों, आज मुझे किसानों का जीवन बदलने वाली कृषि से जुड़ी साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्‍यास करने का भी अवसर मिला है। आज जिन सिंचाई परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ है वो किसान की आय को दोगुना करने के हमारे प्रयास का अहम हिस्‍सा है। सिंचाई पर खर्च कम हो तो लागत अपने आप कम हो जाती है। लिहाजा देश में सिंचाई की पारंपरिक व्‍यवस्‍था से लेकर नई तकनीक को किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। करीब 12 सौ करोड़ रुपये की सोन कनहर पाइप लाइन योजना से यहां के 14 हजार हेक्‍टयर से ज्‍यादा भूमि की सिंचाई हो सकती है। साथ ही इस क्षेत्र के 3 लाख से ज्‍यादा लोगों को पीने का पानी भी उपलब्‍ध हो रहा है। इस परियोजना के तहत 25 किलोमीटर से अधिक लंबाई का पाइप जमीन के भीतर बिछाया जाएगा, यानी जमीन पर खेती भी होती रहेगी और सिंचाई की सुविधा भी रहेगी।

साथियों, किसानों को सशक्‍त करने के लिए जिन योजनाओं पर काम होना चाहिए था उनको लेकर पहले की सरकारों का क्‍या रवैया रहा उसकी गवाही यहां की उत्‍तर कोयल परियोजना दे रही है। ये मंडल डैम प्रोजेक्‍ट उसकी गवाही है। सोचिए 47 साल यानी आधी सदी ये परियोजना खंडहर के रूप में अधूरी लटकी पड़ी है। 1972 में इसकी फाइलें चली थी और फिर लटकती रही, भटकती रही। पिछले 25 साल से इस परियोजना का काम एक तरफ से ठप्‍प ही पड़ा हुआ था1

आप मुझे बताइए, कि क्‍या किसी बांध परियोजना को पूरा होने में आधी शताब्‍दी लगनी चाहिए, क्‍या ये सूखा प्रभावित क्षेत्र में किसानों के साथ की गई एक आपराधिक लापरवाही है कि नहीं है, साथियों ये योजना किसानों के साथ, ठग्‍गी के साथ ही, देश के ईमानदार करदाताओं के साथ बेईमानी का भी सबूत है।

जिस परियोजना को 30 करोड़ रुपए सिर्फ... 30 करोड़ रुपये में पूरा होना था वो अब करीब 2 हजार 400 करोड़ रुपये में पूरी होगी। यानी करीब-करीब 80 गुना ज्‍यादा कीमत अब देश के करदाताओं को इस पूरी योजना के लिए चुकानी होगी। आप मुझे बताइए जिन्‍होंने ऐसा किया है वो समाज के गुनहगार हैं कि नहीं हैं, वो किसानों के गुनहगार हैं कि नहीं हैं, वे आपके गुनहगार हैं कि नहीं हैं, वो बिहार के गुनहगार हैं कि नहीं हैं, वो झारखंड के गुनहगार हैं कि नहीं हैं। ऐसे गुनहागारों को सजा मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए... ऐसे गुनहगारों के खिलाफ मोदी को लड़ना चाहिए कि नहीं लड़ना चाहिए... एक चौकीदार को ये काम करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए....

आजादी के बाद इतने सालों तक देश कैसे चला है, ये परियोजना उसका हाल, किसानों का बेहाल ये जीती-जागती एक केस स्‍टडी करने जैसा काम है। ये परियोजना इस बात की भी गवाह है कि कैसे पहले झारखंड और बिहार के लोगों के साथ नाइंसाफी की गई है।

 

भाईयो और बहनों ये किसान को सिर्फ वोट बैंक समझने वाले और किसान को अन्‍नदाता समझने वाले.... एक तरफ वो लोग है जिनके लिए किसान वोट बैंक है, एक तरफ हम लोग हैं जिनके लिए हमारा किसान अन्‍नदाता है। ये फर्क है जो पहले थे उन्‍होंने किसान को वोट बैंक समझा और आज हम हैं जो आपको अन्‍नदाता मानकर आपकी खेती में आने वाली हर मुश्किलें दूर करने का ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं।

साथियों, आज कुछ लोग इस अवसर को इस रूप में देखेगें कि आज इतने सालों से लटका हुआ एक काम आगे बढ़ रहा है। ये बात इतनी छोटी नहीं है। आप विचार कीजिए जब संयुक्‍त बिहार था, झारखंड नहीं बना था। एक ही सरकार पटना में बैठती थी अगर थोड़ी सी संवेदनशीलता किसानों के प्रति होती, यहां के लोगों की मुसीबतों का थोड़ा सा भी ज्ञान होता तो एक संयुक्‍त सरकार रहते हुए ये काम इतने दिनों तक लटका हुआ नहीं होता और तीस करोड़ का 24 सौ करोड़ का मामला नहीं होता।

दूसरी बात आज हिन्‍दुस्‍तान में पानी को लेकर के अड़ोस-पड़ोस के राज्‍यों के बीच ऐसी लड़ाई चल रही है, सुप्रीम कोर्ट में मामले पड़े हुए हैं। पानी बह रहा है समुंदर में जा रहा है। लेकिन अपने राजनीतिक कारणों से लड़ाईयां लड़ी जा रही हैं।

आज की ये घटना विशेष रूप से देश को नोटिस करनी होगी। मैं बिहार के मुख्‍यमंत्री मेरे मित्र नितिश कुमार जी को बधाई देता हूं। मैं झारखंड के मेरे साथी मुख्‍यमंत्री रघुवर दास जी को बधाई देता हूं। कि दोनों सरकारों ने मिलकर के, दोनों राज्‍यों से जुड़ा हुआ इस प्रोजेक्‍ट को उन्‍होंने संपन्‍न करने की दिशा में समझदारी पूर्वक कदम उठाया है।

मैं बिहार से आए हुए हमारे सांसदों का अभिनंदन करता हूं। मैं झारखंड के मेरे सांसदों का अभिनंदन करता हूं। दोनों राज्‍यों ने, सांसदों ने मिलकर जब भी मेरे पास आए झारखंड और बिहार के दोनों दिशा के साथ-साथ, साथ में आए और ये समस्‍या इस राज्‍य की... उस राज्‍य की नहीं, हमारे देश के किसानों की है उनको लाभ मिलना चाहिए... मिलजुल करके और इन सभी एमपीस को बधाई देता हूं कि इस एक मुद्दे को लेकर के वो कभी चैन से बैठे नहीं है, चैन से सोए नहीं है। आपके लिए ये दिन-रात दौड़ते रहे हैं और मुझे भी दौड़ाते रहे हैं और इसलिए मैं इन सांसदों का आज विशेष रूप से अभिनंदन करता हूं और इसलिए आज ये डैम बन रहा है उसके साथ-साथ भारत के federalism को एक नई ताकत देने का काम बिहार और झारखंड दोनों सरकारों ने मिलकर के किया है। ये मेरे लिए विशेष गर्व की बात है। आनंद की बात है। और देश के अन्‍य राज्‍यों के लिए भी इसमें से बहुत कुछ सीखने का है। और इसलिए मैं विशेष रूप से सांसदों को, दोनों सरकारों को, दोनों मुख्‍यमंत्रियों को हृदयपूर्व बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों, आज कुछ लोग देश के किसानों को कर्जमाफी के नाम पर बहला रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रहे हैं। मुझे पता है कि उन्‍होंने कभी उत्‍तर कोयल परियोजना का नाम तक नहीं सुना होगा। उनको तो ये भी पता नहीं लगा कि कोयल पंखी का नाम है कि डैम का नाम है कि नदी का नाम है कुछ पता ही नहीं लगा। जब उनकी सरकार केंद्र में थी तो ऐसे लोगों ने कभी परवाह ही नहीं की कि देश में जो सिंचाई परियोजनाएं बरसों से अटकी हैं, अधूरी हैं उन्‍हें पूरा किया जाए।

आप मुझे बताइए... कि ये करीब-करीब आधी शताब्‍दी से लटका हुआ प्रोजेक्‍ट ये समय पर पूरा हुआ होता तो इस क्षेत्र का किसान कभी कर्जदार बना होता क्‍या... बना होता क्‍या... उसको कर्ज लेना पड़ता क्‍या... वो कर्ज में डूबता क्‍या... उसको पहले आपने कर्ज करने के लिए मजबूर कर दिया। उसका जीना बिना कर्ज असंभव कर दिया और अब राजनीति करने के लिए निकल पड़े हैं। अच्‍छा होता अगर किसानों के प्रति थोड़ी सी भी संवेदना होती.. ऐसे सारे काम पूरे कर दिए होते तो मेरा किसान कभी कर्ज के बोझ में डूबा नहीं होता अरे.... वो तो दुनिया को कर्ज देने की ताकत बन गया होता।

भाईयो और बहनों, जब हमारी सरकार आई तो किसान के खेत में पानी पहुंचाने का बीड़ा हमनें उठाया। जब पुरानी अधूरी सिंचाई परियोजना के कागज निकलवाए तो ऐसे-ऐसे कारनामों का पता चला कि मेरी तो आंखें खुल गई... खुली की खुली रह गई। एक प्रकार से आंखे फट गई... ऐसा काम करके गए हैं।

आप कल्‍पना कर सकते हैं, कि सिर्फ उत्‍तर कोयल परियोजना नहीं अनेक ऐसी सिंचाई परियोजना थी जहां पर बांध बन गए.. नहर नहीं बनी। नहर बन गई तो बांध का काम अधूरा पड़ा हुआ था। बांध और नहर दोनों बन गए तो उसको जोड़नें का काम नहीं हुआ है। ऐसा... कोई परवाह ही नहीं, पैसे गए तो गए जमीन गई तो गई, किसान मर रहा है तो मर रहा है। यही काम करते रहे है। किसानों के साथ, देश की सिंचाई परियोजना के साथ इस तरह का अन्‍याय किया जा रहा है।

मैंने देश भर के ऐसी बड़ी परियोजनाओं की लिस्‍ट बनवाईं, बजट में पैसों का इंतजाम किया और फिर शुरू की प्रधानमंत्री सिंचाई परियोजना। आज इस परियोजना की वजह से देश के उन 99वें बड़ी परियोजनाओं को पूरा किया जा रहा है। जो 30-30, 40-40 साल से अटकी पड़ी थी, फाइलें भी खो गई थी।

साथियों, आप जानते हैं कि हम इस पर कितनी राशि खर्च कर रहे हैं। मैं आपको बताता हूं.... करीब-करीब 90 हजार करोड़ रुपया यानी एक प्रकार से 1 लाख करोड़ रुपया... ये है हमारा काम करने का तरीका।

भाईयो और बहनों, अगर मुझे राजनीति करनी होती अगर मुझे किसानों को वोट बैंक का हिस्‍सा ही बना कर रखना होता तो मेरे लिए तो बहुत सरल था ये 1 लाख करोड़ रुपये की इतनी सारी जिन योजनाओं के पीछे मेहनत करने की क्‍या जरूरत थी। दिन-रात पूछताछ करने की क्‍या जरूरत थी, बाबुओं को दौड़ाने की क्‍या जरूरत थी। सीधा-साधा 1 लाख करोड़ रुपया किसानों को कर्जमाफी करके बस बांट देता। लेकिन मैंने किसानों को गुमराह करने वाला रास्‍ता नहीं चुना, पाप नहीं किया। कर्जमाफी तो एक पीढ़ी की हो जाती, एक साल की हो जाती लेकिन 1 लाख करोड़ से जो पानी आएगा वो आने वाली सदियों तक लोगों का भला करेगा। किसान की 5-5, 25-25 पीढ़ी का भला करेगा। वो कभी कर्जदार न बने ये ताकत उसको मिलने का काम हमने किया। हमनें वो वोट बैंक की राजनीति नहीं की हमनें मेरे किसान को मजबूत करने का काम किया है और इसलिए भाईयो और बहनों ये चुनाव जीतने के खेल जो चल रहे हैं उसी खेल का परिणाम है कि उन्‍होंने किसान को कर्जदार बना कर रखा है। उन्‍होंने नौजवान को याचक बना कर रखा हुआ है। उन्‍होंने माता-बहनों को असु‍रक्षित बना कर रखा हुआ है। उन्‍होंने सारी चीजें लोग सरकार के भरोसे जिए ऐसी व्‍यवस्‍था बना कर रखी है उस व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए मैं कोशिश कर रहा हूं।

देश सरकार से नहीं, देश देशवासियों से चलना चाहिए। देश हम लोगों से नहीं आपके लिए होना चाहिए, आपकी ताकत के भरोसे चलना चाहिए। इसी इरादे से हम काम कर रहे हैं।

भाईयो और बहनों, सरकार के निरंतर प्रयास की वजह से आज अनेक योजनाएं पूरी हुई हैं और मैं ज्‍यादातर मैं देख रहा हूं बहुत से प्रोजेक्‍ट आखिरी चरण में पहुंच गए हैं। और आखिरी चरण में है इसी बात को लेकर के कि पहले की सरकारों जो किसानों को वोट बैंक समझने वालों और हमारी सरकार किसानों को अन्‍नदाता समझती है इसका सीधा-सीधा फर्क है। आपको ये फर्क...ये टीवी के एयरकंडीशनर रूम में बैठने हुए लोगों से कभी पता नहीं चलेगा, अखबार की सुर्खियों में पता नहीं चलेगा और इसलिए भाईयो और बहनों, देश के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए, किसान को ताकतवर बनाना इस राह पर चलना है और हमनें सिर्फ और सिर्फ अपने कर्म और अपने कर्तव्‍य किसानों की सेवा करना, देश की सेवा करना ये हमारा धर्म मानकर के हम काम कर रहे हैं।

साथियों, हमारी सरकार खेती और किसान को सशक्‍त करने के लिए एक नई सोच के साथ आगे बढ़ रही है हमारा प्रयास बीज से बाजार तक नई व्‍यवस्‍थाएं खड़ी करके किसान को मजबूत करने का है।

भाईयो और बहनों, देश की तमाम सरकारों ने आजादी के बाद से ही अपनी समझ और क्षमताओं के हिसाब से काम किया है। किसी ने नाम पर ध्‍यान दिया तो किसी ने काम पर ध्‍यान दिया। आज यहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 25 हजार लोगों को नए घर मिले हैं। और इसलिए मैं आपको एक उदाहरण इस योजना का भी देना चाहता हूं।

साथियों, साढ़े चार वर्ष पहले जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आप सभी ने अवसर दिया था तो हमनें देश के गरीबों से, बेघरों से एक वायदा किया था। वायदा एक कि 2022 तक देश का गांव हो या शहर हो हर देशवासी के सिर पर पक्‍की छत देने का प्रयास किया जाएगा। इस कोशिश में हमारी सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की। शहरों के लिए अलग, गांव के लिए अलग जब हमनें इस योजना को शुरू किया तो फिर ये सवाल उठाया गया कि ऐसी योजना तो पहले भी थी आप अलग क्‍या करेंगे, कैसे करेंगे आप तो सिर्फ नाम बदल रहे हैं शायद वो नाम बदलने से तिलमिलाए होंगे। लेकिन इस योजना में असली बदलाव क्‍या हुआ, कैसे हुआ, इसका प्रभाव क्‍या रहा ये आज मैं आपके माध्‍यम से झारखंड की पवित्र धरती से देश के हर गरीब तक पहुंचाना चाहता हूं।

भाईयो और बहनों, हमारे देश में गरीबों को घर देने के लिए योजना पहले भी चलती थी। लेकिन वो किसी परिवार के नाम से योजना चलती थी उसमें घर की चिंता कम होती थी परिवार का नाम बनाए रखने की चिंता होती थी। हमने आकर के बदलाव किया... हमने नरेंद्र मोदी आवास योजना नहीं बनाई, हमने नमो आवास योजना नहीं बनाई, हमने रघुवर दास आवास योजना नहीं बनाई हमने simple सी बात बता दी कि प्रधानमंत्री आवास योजना को भी जब भी जो प्रधानमंत्री आएगा वो उसको आगे बढ़ाएगा। नाम का झगड़ा नाम के लिए नहीं काम होना चाहिए।

मैं जानता चाहता हूं यहां किसी को याद नहीं होगा कि पहले जिन बड़े-बड़े नेताओ के नाम पर योजनाएं चलती थी वो घर है कहां... कागज पर नजर आएंगे.. धरती पर नजर नहीं आएंगे। ये रुपये कहां गए...कहां गए वो लोग, कहां गए वो घर, कहां गए वो पैसे यही खेल चलता रहा भाईयो बहनों। पहले की योजना में क्‍या–क्‍या होता था। जब तक उनके खासदारों को उनके आस-पास के चेले-चपाटों को दक्षिणा नहीं देते तब तक आपका नाम भी तय नहीं होता था।

साथियों, देश में पहले जो आवास योजना थी उसमें किसे घर मिलेगा, कैसे मिलेगा इसकी चयन-प्रक्रिया में बहुत बड़े-बड़े खेल हुआ करते थे। दलाली हुआ करती थी। मैं सार्वजनिक रूप से पूछ रहा हूं। ये जो मुझे सर्टिफिकेट दिखा रहे थे, 25 हजार लोगों को घर मिला है ऐसे लोग बैठे हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्‍या प्रधानमंत्री आवास योजना पाने के लिए आपको किसी को रिश्‍वत देनी पड़ी है, जोरों से बताइए वो सर्टिफिकेट ऊपर करके बताइए देनी पड़ी है... किसी को पैसे देने पड़े है, किसी ने आपसे पैसे मांगे है।

मैं देश भर के लोगों को कहना चाहता हूं। दलालों को हमारे यहां कोई जगह नहीं है, बिचौलियों की कोई जगह नहीं है और इसलिए गरीब के खाते में सीधे बैंक से पैसे जमा करा रहे हैं। नाम तय करने में भी हमने वैज्ञानिक तरीका अपनाया है। 2011 की जनगणना के आधार पर और पहले तो बीपीएल लिस्‍ट और वो भी बदलता रहता था। लोग शिकायतें करते रहते थे कि मेरा नाम नहीं है। पहले था लेकिन अब कट गया है। वो कटता इसलिए था वो बिचौलिये की जेब में कुछ डालता नहीं था। प्रधानमंत्री आवास योजना में हमने सबसे पहले इसी अव्‍यवस्‍था को सुधारा।

अब गावों में किसे घर मिलेगा ये 2011 में जो जनगणना हुई थी उसके आधार पर ग्राम सभाओं द्वारा तय किया जाता है। इतना ही नहीं अगर किसी वजह से किसी का नाम उस लिस्‍ट में नहीं है या किसी को कोई शिकायत है तो उसे भी अपील करने का पूरा मौका दिया जाता है।

घर आंबटन में पारदर्शिता और ज्‍यादा बढ़ाने के लिए हमारी सरकार ने ये भी तय किया है कि जिन-जिन को घर दिया जा रहा है उनकी लिस्‍ट को ग्राम पंचायतों की दीवारों पर लगाया जाए। पूरे गांव को पता होना चाहिए कि ये-ये लोग हकदार है और उनको घर मिलने वाला है। यानी हर स्‍तर पर हमारा ये प्रयास रहा कि गरीबों को घर मिले जबकि पहले हर स्‍तर पर प्रयास होता था कि गरीबों का नाम कटे, लिस्‍ट से नाम निकले और दलालों की जेब भरती रहे। यही कारोबार होता रहा था।

भाईयो और बहनों, पुरानी योजना से अलग एक और महत्‍वपूर्ण कार्य हमने किया, आज जिन्‍हें घर मिले हैं वो भी इसके गवाह है कि पहले यहां लाभार्थी का ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन होता है और फिर उसके बैंक खाते का सत्‍यापन किया जाता है। ये भी इसलिए किया जाता है ताकि लाभार्थी के खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर करने में कोई दिक्‍कत न आए।

भाईयो और बहनों, पहले की योजना में स्थिति ये रहती थी कि अलग-अलग स्‍तर पर अलग-अलग बैंक खाते होते थे। जहां से लाभार्थियों को पैसे रिलीज किए जाते थे इस वजह से अक्‍सर उनका पैसा अटक जाता था। अब हमने राज्‍य स्‍तर पर सिर्फ एक खाता बना दिया है जहां से सारे लाभार्थियों को पैसे ट्रांसफर किए जाते हैं। यानी घर पाने वालों की एक और दिक्‍कत को दूर करने का हमने प्रयास किया है।

अब आते हैं घर निर्माण की मॉनि‍टरिंग पर..... पहले की योजना में किस तरह के घर बनते थे, आपने भी देखा होगा उनकी ऐसी बुरी हालत रहती थी कि लोग घर मिलने के बाद भी उसमें जाने के लिए तैयार नहीं होते थे। ये स्थिति इसलिए थी क्‍योंकि पहले की योजनाओं में मॉनि‍टरिंग का कोई उचित तरीका ही नहीं था। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले घरों की क्‍वालिटी पर नजर रखने के लिए हमने नई व्‍यवस्‍था स्‍थापित की।

अब जो घर बनते हैं उनमें निर्माण के दौरान तीन अलग-अलग स्‍तरों पर फोटो ली जाती है। उसकी जियोटैकिंग की जाती है। यानी किस तारीख पर फोटो ली कहां पर ली ये सारी जानकारी सही तरीके से जमा की जाती है। इतना ही नहीं सरकार ने जो व्‍यवस्‍था बनाई है उसमें ये भी इंतजाम किया है कि इन फोटो को कोई भी देख सकता है।

भाईयो और बहनों, पहले जो घर मिलते थे उसमें सिर्फ खाली चारदीवारें होती थी। अब जो घर मिल रहे है उसमें तमाम मूल सुविधाएं हैं जो एक परिवार के लिए जरूरी होती है। बिजली का कनेक्‍शन, रसोई गैस का कनेक्‍शन, शौचालय ये सब सुविधाएं घर के साथ ही मिल रही हैं। इसके अलावा एक और बड़ा काम किया है। हमनें घर की डिजाईन को लेकर.. पहले छोटे-छोटे घर बनते थे हमनें उनका जरा क्षेत्रफल.. दायरा बढ़ा दिया जिन्‍हें घर मिलता है उन्‍हें डिजाईन के कई विकल्‍प भी उपलब्‍ध कराए जाते हैं। कोशिश ये होती है कि स्‍थानीय साम्रगी का इस्‍तेमाल करते हुए कम लागत में आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए नए डिजाईन के घर लोगों को दिए जाए।

साथियों, आज जो मैं आपको बता रहा हूं वो यहां मौजूद हजारों लोगों का अपना अनुभव है लेकिन देश में बहुत से लोग है जो इस बारे में जानना भी नहीं चाहते अब उन्‍हें बताने और जताने का समय आ गया है। आज जो लोग मुझ पर कीचड़ उछाल रहे हैं जब वो सरकार में थे तो उन्‍होंने अपने पांच साल में गरीबों के लिए पांच साल में जरा याद रखोगे आंकड़ा मैं बताता हूं, याद रखोगे मैं जो बता रहा हूं याद रखोगे पक्‍का रखोगे। उनकी जब सरकार थी। मैडम रिमोट कंट्रोल से जब सरकार चला रही थी तब गरीबों के लिए गांव में पांच साल में सिर्फ 25 लाख घर बनवाए थे और जब से ये सेवक आया है न, आपकी सेवा के लिए आया है न मोदी... सेवक ने पांच साल में और उससे भी कम समय में 1 करोड़ 25 लाख घर बना दिए.... 1 करोड़ 25 लाख यानी उनके पांच साल में जितने बने उससे पांच गुना। मतलब हमने जितना काम किया वो करना है तो उनको और 25 साल लग जाते मतलब आपके बच्‍चों के बच्‍चे भी बड़े हो जाते लेकिन आप झोंपड़ी में ही जिंदगी गुजारते।

इतना ही नहीं ये हमारा ही काम करने का तरीका है कि पहले की सरकार में जहां एक घर बनने में करीब-करीब 18 महीनें लगते थे अब जिस प्रकार की टेक्‍नोलॉजी, जिस प्रकार के साधन जिस प्रकार की व्‍यवस्‍था को हमने लागू किया है 18 महीनें से ज्‍यादा समय पहले लगता था आज 12 महीनें से भी कम समय में वो अपने घर में रहने चला जाता है और भाईयो बहनों, हमारे देश में घर है तो पुरुष के नाम पर, गाड़ी है तो पुरुष नाम पर, जमीन है खेती है तो पुरुष के नाम पर, दुकान है पुरुष के नाम पर, जो कुछ भी है पुरुष के नाम पर और पुरुष का स्‍वर्गवास हो जाए तो उसके बेटे के नाम पर बेचारी मां के नाम कुछ है ही नहीं। हमने तय किया प्रधानमंत्री आवास योजना उस परिवार की जो मुख्‍य महिला है उसके नाम पर दिया जाएगा। मेरी माताए-बहनें ताकत है..... उसी के खाते में पैसा जमा होगा। ये जो मकान बन रहे हैं उसके पीछे ये भी कारण है कि पैसे इधर-उधर नहीं जाते हैं वो बहनें ध्‍यान देकर के मकान बनवा देती हैं।

देश में जो भी बेघर है उनको घर मिलने में... हमारा वायदा है, काम तेज गति से चल रहा है, अभी भी बहुत लोग जिनको मकान पहुंचाना है। जिनको घर मिला नहीं उनको मैं विश्‍वास दिलाता हूं। हमने करके दिखाया है पांच गुना तेजी से काम साढे चार साल में करके दिखाया है। 2022 में मकान का काम पूरा करने के इरादे से दौड़ रहे हैं। जिसको नहीं मिला है उनको भी मकान मिलेगा ये मैं विश्‍वास आज देना चाहता हूं। मेरे सामने ऐसे अनेक भाई-बहन बैठे है जो गवाह है कि उनको कितनी आसानी से बिना किसी को खिलाए-पिलाए अपना घर मिल गया और मैंने पूछ लिया है अभी...

साथियों, मैं खुद सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद करता रहता हूं। ऐसे ही यहां झारखंड के लाभार्थियों से मैंने बातचीत की है और जिससे मुझे पता चला है कि किस प्रकार का बदलाव आया है।

मुझे एक बार वीडियो कॉन्‍फ्रेंस से झारखंड की बहनों से बात करने का मौका मिला था। खुंडी की बहन नीरु, अंजली, गायत्री सहित अनेक ऐसी बहनों से उस दौरान मेरी काफी बातचीत हुई थी। उसमें बहनों ने बताया कि कैसे उन्‍होंने अपना घर बनाया। झारखंड की सरकार ने जो रानी मिस्‍त्री बनाने की जो ट्रेनिंग दी है उसके बाद पहले उन्‍होंने दूसरों के लिए शौचालय बनाया और बाद में अपने लिए घर बनाया।

भाईयो और बहनों, ऐसे तमाम लाभार्थी बताते हैं कैसे चार किश्‍तों में सीधे उनके बैंक खाते में करीब सवा लाख रुपये पहुंच रहे है। टायलेट के लिए अलग से पैसे मिल रहे हैं। पहले सिर्फ 70 हजार रुपये मिलते थे उस पर से भी घर पर कितने लगते थे, ये आप उनको पूछिए जिन सौभाग्‍यशाली लोगों को पहले की सरकार के दौरान घर मंजूर हुए है।

साथियों, गरीब को जब घर मिल जाता है तो उसका आत्‍म विश्‍वास चरम पर पहुंच जाता है। जब उसको गर्मी, सर्दी बरसात की चिंता नहीं रहती तो वो कमाई पर ध्‍यान देता है और उसका जीवन स्‍तर ऊपर उठने लगता है।

इतना ही नहीं ये जो घर बन रहे हैं वो परिवार की महिला सदस्‍य के नाम पर हम दे रहे है ऐसे में सिर्फ एक घर से ही गरीब के सशक्‍तीकरण का पूरा आंदोलन खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। घर भी मिल रहा है, रोजगार भी, आत्‍मसम्‍मान भी और आत्‍मविश्‍वास भी जो गरीबी को भारत से हटाने में बहुत मददगार सिद्ध हो रहा है।

जब घर की बात होती है तो एक और बड़ा अंतर पहले की तुलना में ये है कि आजादी के बाद पहली बार किसी सरकार ने मध्‍यम वर्ग के घर की भी चिंता की है। मध्‍यम वर्ग को आर्थिक मदद के साथ ही ब्‍याज में भी राहत दी जा रही है। इस देश के हर नागरिक का अपने घर का सपना पूरा हो इसी तरह हम पूरी ईमानदारी से हम प्रयास कर रहे हैं और अगर मध्‍यम वर्गीय परिवार 20 लाख रुपये का फ्लैट लेने जाता है तो बैंक से उसको कर्ज लिया है तो हमने उसमें मदद ऐसी की है कि 20 साल में जब पैसे जमा करेगा तो पहले की तुलना में उसका छ: लाख रुपया कम हो जाएगा, बच जाएगा। ये काम मध्‍यम वर्गीय परिवारों के लिए हमने किया है। 20 लाख रुपया भरते-भरते उसका छ: लाख रुपया बचाने का काम ब्‍याज कम करके हमने किया है।

भाईयों और बहनों, झारखंड यहां के आदिवासियों को, यहां के सामान्‍य जन के संघर्ष का परिणाम है। ये राज्‍य आप सभी की आंकाक्षाओं का प्रतीक है। जिसको अटल जी की सरकार ने सम्‍मान दिया था। इसके संतुलित और समग्र विकास के लिए केंद्र और झारखंड की सरकारें पूरी ईमानदारी से जुटी है। सबका साथ सबका विकास हमारा मार्ग भी है और लक्ष्‍य भी है।

इसी सोच का परिणाम है कि यहां से जिस आयुष्‍मान भारत प्रधानमंत्री जय योजना पीएमजे योजना की शुरूआत मोदी केयर के नाम से लोग जानते हैं। तीन महीने पहले की गई थी वो आज लाखों गरीबों को जीवन-दान दे रही है। सिर्फ सौ दिन के भीतर ही करीब-करीब साढ़े छ: सात लाख से अधिक बहन भाईयो को देश भर के हजारों अस्‍पतालों में या तो इलाज मिल चुका है या फिर वो अस्‍पताल में इलाज करा रहे हैं इसमें झारखंड के भी करीब 28 हजार लाभार्थियों की मदद हुई है।

साथियों, आज आयुष्‍मान योजना का इतना विस्‍तार हो चुका है कि हर रोज करीब-करीब 10 हजार लोगो को इसका लाभ मिल रहा है। यानी ये योजना हर रोज 10 हजार लोगों के जीवन को बचाने, उनकी परेशानी को कम करने का प्रयास कर रही है।

भाईयो और बहनों विकास की पंचधारा यानी बच्‍चों की पढ़ाई, युवाओं को कमाई, किसान को सिंचाई, बुजुर्गों को दवाई और जन-जन की सुनवाई इसको न्‍यू इंडिया के संस्‍कार बनाने में हम जुटे हैं।

आप सभी झारखंडवासियों का भरपूर आशीर्वाद हमारे साथ रहा है। न्‍यू इंडिया के लिए रहा है, न्‍यू झारखंड के लिए रहा है। विकास के प्रति अपने विश्‍वास को आप यूं ही बनाए रखेंगे इसी भावना के साथ मैं फिर एक बार नीतीश कुमार और रघुवार दास जी को दोनों को बधाई देता हूं। हमारे सभी एमपीस को बधाई देता हूं और जनता जनारधन को बधाई देता हूं।

इस परियोजनाओं के लिए अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं। और आपने इतनी बड़ी संख्‍या में आकर के, इतने धैर्य के साथ आशीर्वाद दिए इसके लिए मैं फिर एक बार सर झुका करके नमन करता हूं। मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए... दोनों मुट्ठी बंद करके बो‍लिए....

भारत माता की जय....ऐसे नहीं,

भारत माता की जय....शाबाश....

भारत माता की जय....

भारत माता की जय....

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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