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मंच पर बिराजमान प्रात:स्मरणीय, वंदनीय, परम श्रद्धेय पूज्य संतगण, माँ भारती की भक्ति में डूबे हुए उपस्थित सभी महानुभाव, जिन संतो के चरणों में बैठना जीवन का एक बहुत बड़ा सौभाग्य होता है, उन संतों के बगल में बैठने का जो अवसर आए, तो बैठने वाले की हालत क्या हुई होगी इसका आप अंदाज कर सकते हैं..! जिनकी वाणी सुनने के लिए मीलों दूर से कष्ट उठा कर के करोड़ों-करोड़ों लोग पहुंचते हैं, शब्द रूपी प्रसाद ग्रहण करने के लिए तपस्या करते हैं ऐसे ओजस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, माँ सरस्वती के धनी, जिनके आशीर्वाद से लाभान्वित हुए हैं ऐसे महापुरूषों के बीच खड़े होकर के कुछ कहने की नौबत आए, तो उस कहने वाले का हाल कैसा होता होगा इसका आप भली-भांति अंदाजा कर सकते हैं..! ईश्वर ने जब से मुझे दुनिया को जानने और समझने का सामर्थ्य दिया, तब से जितने भी कुंभ के मेले हुए उन सब में मैं उपस्थित रहा और कभी ये भी सौभाग्य मिला था कि पूरा समय भी मैं वहाँ रहा था। लेकिन इस बार का ये पहला कुंभ का मेला ऐसा था कि जिसमें मैं पहुंच नहीं पाया था। मन में एक कसक थी, एक पीड़ा थी कि मैं ये क्यों कर नहीं पाया..? और जब मुझे गुरू जी अभी मिले तो तुरंत पूछा कि बेटा, इस बार कुंभ में क्यों नहीं दिखाई दिए..? मन में एक कसक तो अभी भी है कि नहीं पहुंच पाया, लेकिन आज इस समारोह में और वो भी गंगा के तट पर हरिद्वार की भूमि में इसी पवित्र स्थल पर इन सभी संतों, आचार्यों और भगवंतों के दर्शन का मुझे सौभाग्य मिला..! शायद ईश्वर की इच्छा होगी कि मेरी वो कसक कम हो, और इसलिए ही ये कुछ व्यवस्था ईश्वर ने बनाई होगी..! ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज आप सब लोगों के चरणों में वंदन करने का अवसर मिला है..!

मैं एक बात यहाँ बताना चाहता हूँ। हमारे देश में किसी के लिए कुछ भी कह देना बहुत आसान हो गया है। शब्दों का मूल्य ना समझते हुए, शब्दों का सामर्थ्य ना समझते हुए, किसी के लिए कुछ भी कह देना ये मानों एक नया स्वभाव पनपा है। और इसलिए पता नहीं किस-किस के लिए क्या-क्या कहा गया होगा..! लेकिन एक समृद्व राज्य के इतने वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर रहने के बाद मैं सार्वजनिक रूप से और इन मीडिया वाले मित्रों की हाजिरी में अपने अनुभव से घोषित करना चाहता हूँ। यहाँ एक भी संत महात्मा, एक भी संस्था ऐसी नहीं है जिसने कभी भी, कभी भी गुजरात में मुख्यमंत्री के पास आकर के किसी भी चीज की कभी मांग की हो..! ये देने वाले लोग हैं..! वरना आसानी से यह कह दिया जाता है। और इसलिए आज मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ ये कहना चाहता हूँ कि मेरे 12 साल के कार्यकाल में मुझे एक भी संत महात्मा, एक भी समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति ऐसा मिला नहीं है जिसने सरकार से कुछ मांगा हो..! बहुत लोग होंगे जिनको ये बात नजर आना मुश्किल है। संतो की शक्ति ऐसे चश्मों को निर्माण करे, ऐसे ऐनक का निर्माण करे ताकि ऐसे लोगों को कुछ सत्य दिखाई दे..! और उस अर्थ में, उनकी वाणी का सामर्थ्य हजारों गुना बढ जाता है..! उन्होंने जो मर्यादा रेखाएं तय की होती हैं उस मर्यादा रेखाओं के बाहर जाने का साहस कत्तई कोई नहीं कर पाता है, क्योंकि वो सिर्फ शब्द नहीं होते हैं, वो एक साधना का अंश होता है..!

मैं बाबा रामदेव जी को सालों से जानता हूँ। वो जब साइकिल से घूमते थे तब से जानता हूँ और एक छोटी सी पुडिया में से काजू का टुकड़ा देते थे वो भी याद है..! आप कल्पना कर सकते हैं, एक व्यक्ति अहर्निश, एक निष्ठ, अखंड, अविरत, ‘वन लाइफ, वन मिशन’ इस तरह चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति... इस देश में लगातार भ्रमण करता रहे..! प्रतिदिन डेढ़-दो लाख लोगों को योग के माध्यम से स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करते रहें..! अगर बाबा रामदेव जी की ये मूवमेंट दुनिया के किसी और देश में हुई होती, तो ना जाने कितनी यूनिवर्सिटीयों ने उस पर पी.एच.डी. की होती..! मैं ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ वालों को कहना चाहता हूँ कि आपने ना जाने कितने रिकॉर्ड प्रतिस्थापित किये होगें, लेकिन कभी आपने इस रिकॉर्ड की तरफ ध्यान दिया है कि अपने इतने छोटे से काल खंड में एक व्यक्ति ने टीवी के माध्यम से नहीं, फोटो के माध्यम से नहीं, रेडियो के माध्यम से नहीं, टैक्नोलॉजी के माध्यम से नहीं, रूबरू में इतने करोड़ लोगों के साथ आंख में आंख मिला कर के बात की हो ऐसा रिकॉर्ड शायद दुनिया में कहीं नहीं होगा..!

ये हमारा दुर्भाग्य है मित्रों, कि हम लोग हमारे देश के सामर्थ्य की चर्चा कभी करते नहीं हैं। किसी ने कल्पना की है कुंभ के मेले की..? कुंभ के मेले की व्यवस्था कितनी जबर्दस्त होती है..! वहाँ संतों मंहतों के एक-एक छोटे नगर बस जाते हैं। और गंगा के किनारे पर हर दिन यूरोप का एक देश इक्कठा हो इतनी भीड़ जमा होती है, इतने भक्तों का जमघट जमा होता है। और उसके बाद भी ना कोई मारकाट, ना कोई लूट, ना कोई अकस्मात, ना कोई मौत, ना कोई बीमारी... और दो-दो, तीन-तीन महीने तक बिना किसी आमंत्रण के बिना किसी सूचना के करोड़ों-करोड़ों लोग पहुंचते हैं..! क्या किसी मैनेजमेंट गुरु ने सोचा है, क्या दुनिया को मैनेजमेंट सिखाने वालों ने कभी सोचा है कि ये कौन सी मैनेजमेंट है, ये कौन सी व्यवस्था है..? ये संत-शक्ति के सामर्थ्य और सहस्त्र वर्षों की परंपरा का परिणाम है। लेकिन हम स्वाभिमान खो चुके हैं। आत्म गौरव के साथ दुनिया के साथ आंख में आंख मिला कर के हमारे सामर्थ्य का परिचय कराने की आदत गुलामी के काल खंड के कारण छूट गई है। और तब जा कर के इस चेतना को विश्व के सामने प्रस्तुत करना हर भारतवासी का सपना हो वो बहुत स्वाभाविक है और मैं भी एक हिन्दुस्तान के छोटे बच्चे के नाते उन महापुरूषों के शब्दों पर भरोसा करता हूँ। श्री अरविंद ने कहा था, जिसे मैं वेद वाक्य मानता हूँ, कि मुझे विश्वास है कि मेरी भारतमाता आजाद तो होगी ही, पर इतना ही नहीं, मेरी भारत माता विश्व कल्याणक बन कर रहेगी..! ये सपना देखा था। आज जब पूरा हिन्दुस्तान स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती मना रहा है तब, इस महापुरूष के सपनों को पूरा कौन करेगा..? क्या इस देश के एक-एक बच्चे का दायित्व नहीं है, हम सभी भारतवासियों का दायित्व नहीं है, हम सभी नौजवानों का दायित्व नहीं है कि जिस स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मैं अपनी आंखों के सामने देख रहा हूँ कि मेरी भारत माता जगतगुरू के स्थान पर विराजमान है..! मुझे उस महापुरूष के सपनो में विश्वास है और उन्होंने कहा था कि मेरी आशा देश के नौजवान हैं..! 150 साल हो गए उस महापुरुष के जन्म को, 125 साल पहले ये बात उन्होंने बताई थी और आज पूरे विश्व का सबसे युवा कोई देश है तो वो हिन्दुस्तान है..!

आज पूरे विश्व में चर्चा चल रही है कि 21 वीं सदी हिन्दुस्तान की सदी है। पूरा विश्व ये मानता है कि 21 वीं सदी ज्ञान की सदी है और इसलिए जब-जब मानव जात ने ज्ञान युग में प्रवेश किया है तो उस सभी समय हिन्दुस्तान ने मानव जात का नेतृत्व किया है..! 21 वीं सदी यदि ज्ञान की सदी है तो 21 वीं सदी का नेतृत्व भी ये ज्ञानवान देश के पास होगा, ये हम सबको भरोसा होना चाहिए और उस दिशा में हमें एक नागरिक के नाते, हम जहाँ भी हों, जैसे भी हों, उस कर्तव्य का पालन करने के लिए सवा सौ करोड़ देशवासियों का संकल्प इस आशा-आकांक्षा की परिपूर्ति कर सकता है..!

भाइयो और बहनों, अभी-अभी नवरात्र का पर्व पूरा हुआ है और ये मेरा सौभाग्य रहा कि कुछ कारणवश ऐसे कार्यक्रम बन गए, वैसे मीडिया के मित्र तो उसका ऐसा डिजाइन बना कर के दुनिया को समझा रहे हैं कि मोदी कैसे बड़ी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रहे हैं..! ऐसा बता रहे हैं..! तो ये मैं बताना चाहता हूँ कि कोई प्लानिंग-ब्लानिंग नहीं है..! ईश्वर की इच्छा होगी, मेरा मन करता था बड़े दिनों से कि माँ काली के पास चला जाऊँ, बैलूर मठ चला जाऊँ, जिन संतों के साथ बचपन बिताया था, एक बार फिर उनके पास चला जाऊँ..! और कुछ दिन पहले में बंगाल, कलकत्ता गया और माँ काली के पास गया, रामकृष्ण परमहंस की उस पवित्र भूमि पर गया, बैलूर मठ गया, संतों के बीच समय बिताया..! बाद में सूचना आई केरल से, नारायण गुरू की पवित्र परंपरा के पास दर्शन करने का अवसर आया। नारायण गुरू ने अपना पूरा जीवन वंचितों के लिए, पीड़ितों के लिए, दलितों के लिए, शोषितों के लिए, समाज के निम्न स्तर की भलाई के लिए लगाया था और सौ साल पहले शिक्षा की ऐसी अलख जगाई थी कि उस संत की तपस्या का परिणाम है कि आज पूरे हिन्दुस्तान में सर्वाधिक शिक्षा कहीं है तो उस प्रदेश का नाम केरला है। संत का प्रताप है..! और आज दक्षिण से निकल के मैं सीधा हिमालय की गोद में, गंगा की चरणों में बाबा रामदेव जी जिस गुरूकुल को शुरू कर रहे हैं, आचार्यकुल को शुरु कर रहे हैं, ऐसे एक पवित्र कार्य में जुड़ने का मुझे सौभाग्य मिला है।

मैं जानता हूँ आज के इस अवसर के बाद भांति-भांति की चर्चा हमें सुनने को मिलेगी..! मैं जब छोटा था, तो हमारे कान में एक सवाल पूछा जाता था, हमारे मनो को भ्रमित किया जाता था। कभी-कभी मुझे लगता है कि बाबा रामदेव जी सारे देश को कपालभाति की ओर खींच कर ले गए हैं और उसके कारण जिनके कपाल में भ्रांतियाँ पड़ी हैं, वो ज्यादा परेशान नजर आते हैं..! लेकिन मुझे भरोसा है कि ये कपालभाति कभी ना कभी एक कपाल की भ्रांतियों को भी समाप्त करने का सामर्थ्य दिखाएगी..! हम बचपन में क्या सुनते थे..? हर कोई बोलता था और मैं समझ नहीं पाता था कि ये लोग ऐसा क्यों बोलते हैं और ये अभी भी मेरे मन में है क्योंकि मैं बचपन से किसी संत को देखता था तो बड़ी जिज्ञासा होती थी। कभी उनसे मैं सवाल पूछने चला जाता था, कभी किसी मंदिर में रूके हैं तो खाने-वाने को पूछने चला जाता था, मेरी अपनी एक रुचि थी..! पता नहीं ये ईश्वर ने तय किया होगा मेरे लिए, लेकिन मुझे बड़ा आकर्षण था..! और मैं बहुत छोटे नगर में पैदा हुआ हूँ, मैंने तो गाड़ी भी बचपन में देखी नहीं थी कि कार क्या होती है..! लोग कहते थे कि अरे छोड़ो, ये साधुलोग खाते हैं और सोते हैं, बस। कुछ करते नहीं है, लड्डू खाना बस, और कुछ काम नहीं। और अब जब काम करते हैं तो लोग पूछते हैं कि अरे, आपका ये काम है क्या, क्यों करते हो..? मैं हैरान हूँ..! बाबा रामदेव जी को सबसे बड़ा सवाल ये है कि आप ये सब करते क्यों हो? पहले लोग पूछते थे क्यों नहीं करते हो, अब पूछते हैं कि क्यों करते हो..? क्या इन लोगों को जवाब देना जरूरी बनता है, भाई? इनके लिए समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बाबा रामदेव जिस काम को कर रहे हैं, मैं मानता हूँ राष्ट्र की सेवा है। और हमारी पूरी संत परंपरा को देखिए। हर संत ने अपना जीवन उपदेशों तक कभी सीमित नहीं रखा। उन्होंने आचरण पर बल दिया है और कर्त्तव्य भाव से समाज जीवन की पीड़ाओं को दूर करने के लिए उनसे जो कुछ भी उस युग में हो सका, उसे करते रहे। किसी की जेब में एक पैसा ना हो और साल भर हरिद्वार में रहना हो, कोई मुझे बताए, वो भूखा रहेगा..? कौन खिलाता है, ये खिलाने वाले कौन हैं..? ये ही छोटे-मोटे संत हैं, जो अपने यहाँ से किसी भूखे को जाने नहीं देते हैं। मैंने बाबा रामदेव जी से एक बार पूछा था कि मैं तो योग की परंपरा से जुड़ा हुआ इंसान हूँ और दिन-रात दौड़ पाता हूँ उसमें योग का बहुत बड़ा योगदान है। तो, मैंने उनको पूछा एक बार कि योग से ऊर्जा प्राप्त होती है, स्वस्थता प्राप्त होती है, उमंग रहता है, वो सब तो है, लेकिन चारों तरफ से जब इतनी यातनाएं आती हों तो उसको झेलने की ताकत कहाँ से आती है ये तो बताओ..! क्या नहीं बीती बाबा रामदेव पर और क्या गुनाह था उनका..? क्या भारत जैसे लोकतंत्र देश में आपके विचारों से विपरीत विचार कहना गुनाह है..? क्या आपको जो बात पंसद नहीं है वो बात अगर कोई कहे, तो उसके लिए कोई भी अनाप-शनाप शब्द बोलने का आपको अधिकार मिल जाता है..? मैं दिल्ली में बैठे हुए शंहशाहों से पूछना चाहता हूँ, और ये मोदी नहीं पूछ रहा है, देश की भलाई के लिए भक्ति पूर्वक जुल्म के सामने झूझने वाली और जुल्म के सामने ना झुकने वाली माता राजबाला चीख-चीख के पूछ रही है और दिल्ली के शंहशाहों का जवाब मांग रही है..! कुछ लोगों को लगता था कि दमन के दौर से दुनिया को दबोच दिया जाता है। वे लोग कान खोल कर सुन लें, अंग्रेजी सल्तनत भी कभी किसी को दबोच नहीं पाई, आप लोगों की ताकत क्या है..? आप लोग चीज क्या हैं..? एक बार निकलो तो सही, जनता को जवाब देना पड़ जाएगा..!

मित्रों, मैं साफ मानता हूँ कि बाबा रामदेव आज जो कुछ भी कर रहे हैं, मैं नहीं मानता हूँ कि कोई योजना से कर रहे हैं। वो निकले थे तो नागरिकों की स्वस्थता के लिए, वो निकले थे ताकि योग के माध्यम से गरीब से गरीब आदमी अपने आप को स्वस्थ्य रख सके, वो निकले थे क्योंकि महंगी दवा गरीब को बचा नहीं सकती है, योग बचा सकता है और सिर्फ इसलिए निकले थे..! लेकिन दस साल लगातार भ्रमण करते-करते उन्होंने देखा कि नागरिकों के स्वास्थ्य का जितना संकट है, उससे ज्यादा राष्ट्र के स्वास्थ्य का संकट है और तब जा कर के उन्होंने राष्ट्र के लिए आवाज उठाना शुरू किया। और भाइयो-बहनों, इसमें एक सच्चाई है और मुझे विश्वास है कि भले ही उन पर अनेक प्रकार के, भांति-भांति के आरोप लगाने की कोशिश हुई हो... वैसे बाबा रामदेव जी मुझे मिलते हैं तो मुझे कुछ दूसरा कहते हैं। वे मुझे कहते हैं कि मोदी जी, हम दोनों सगे भाई हैं..! मैंने कहा, क्यों..? बोले, जितने प्रकार के जुल्म मुझ पर हो रहे हैं, वो सभी प्रकार के आपके ऊपर भी हो रहे हैं..! तो मैं एक सूची बनाता हूँ कि आज उन पर एक जुल्म हुआ तो मेरी बारी कब आएगी..? क्या शासन का ये काम है..? क्या सद्प्रवृति को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए..? आप बीमारियों की दवाई कहीं और खोज रहे हैं, बीमारी की जड़ों को दूर करने का काम ये संत परंपरा कर रही है और उसी को आप नकार रहे हो तो बुराइयाँ बढ़ती ही जाएगी..! जो श्रेष्ठ है, उत्तम है, सही रास्ता है, इसको नकारने से काम नहीं चलता..!

भाइयो और बहनों, इस देश में ऐसा एक छोटा सा वर्ग है जो ये मानता है कि हिन्दुस्तान का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ है। और जो लोग ये मानते हैं कि हिन्दुस्तान 15 अगस्त को पैदा हुआ वो सारे गलत रास्ते पर जा रहे हैं..! ये सहस्त्र वर्ष पुराना, एक महान सांस्कृतिक धरोहर वाला, समय के हर पहलु को अनुभव करते हुए, कठिनाइयों से रास्ता खोजते हुए, विश्व कल्याण की कामना करते हुए आगे जा रहा एक समाज है और तभी तो विश्व की अनेक हस्तियाँ मिटने के बाद भी हमारी हस्ती मिटती नहीं है..! जिन चीजों से हम खत्म नहीं हुए हैं, जिसने हमें बचाए रखा है उनको बचाना ये हम लोगों का दायित्व बन जाता है। अगर हम उसको खो देंगे तो समाज कोई भी हो, अगर वो समाज इतिहास की जड़ों से अपने आप को काट डालता है, सांस्कृतिक छाँव से अपने आप को अलग कर देता है, तो उस समाज में इतिहास निर्माण करने की ताकत नहीं रहती है..! इतिहास वही समाज बना सकता है, जो समाज इतिहास में से प्राण शक्ति को प्राप्त करता है..! हम लोग हमारे अपने इतिहास के प्रति शर्मिंदा होते हैं, खुद को इतिहास से अलग रखने का प्रयास करते हैं, सांस्कृतिक विरासत को हम पुराण पंथी कह कर, गालियाँ दे कर के उसका इंकार कर देते हैं... और तब जा कर के स्वस्थ समाज के निर्माण में रुकावटें पैदा होती हैं..!

हमारी समाज व्यवस्था को बढ़िया बनाने का और बचाने का सबसे बड़ा काम परिवार संस्था ने किया है। हम धीरे-धीरे देख रहे हैं कि हमारी परिवार संस्था संकट में आ रही है। ज्वाइंट फैमिली से हट-हट के हम माइक्रो परिवार की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं..! बच्चे आया के भरोसे पल रहे हैं..! हमारा सामर्थ्य कितना था, हमारी समाज व्यवस्थाएं क्या थीं, उसमें से कौन सी चीज अच्छी है कौन सी चीज़ें कालबाह्य हैं, जो निकम्मी है उसको उखाड़ फैंकना, ये हमारे समाज की ताकत है..! और मित्रों, आज मैं ये गर्व से कहना चाहता हूँ कि हम ही लोग इतने भाग्यवान हैं, इस भारत भूमि में जन्में हुए हम लोग इतने भाग्यवान है कि हमारी धरती एक ऐसी बहुरत्न वंसुधरा है, हमारी समाज व्यवस्था इतनी जागृत है कि जिसके कारण जब-जब हमारे भीतर बुराइयाँ पैदा हुईं, हमारे अंदर कमियाँ आई तो उन कमियों को दूर करने के लिए, उन बुराइयों की मुक्ति के लिए हमारे ही समाज के भीतर से तेजस्वी, ओजस्वी, प्राणवान महापुरुषों का जन्म हुआ..! अस्पृश्यता को हमने जन्म दिया, तो कोई गांधी आया जिसने अस्पृश्ता के खिलाफ जंग छेड़ा..! हम ईश्वर भक्ति में लीन थे, तब कोई विवेकानंद आया और उसने कहा कि अरे, दरिद्रनारायण की सेवा करो..! हम मंदिर, माता, भगवान उसी में लगे हुए थे, तब कोई विवेकानंद आया और उसने कहा कि अरे छोड़ो सब, तुम्हारे सब भगवानों को डूबा दो, तुम सिर्फ भारत माता की सेवा करो, ये देश तेजस्वी बन कर के निकलेगा..! ये सामर्थ्य है इस समाज का..! विधवाओं के प्रति अन्याय करने वाले इस समाज के खिलाफ इसी कोख से एक महापुरूष पैदा हुए जिन्होंने विधवाओं के कल्याण के लिए अलख जगाई और समाज के खिलाफ लड़ाई लड़े..! ये संतों का, ऋषियों का, मुनियों का, आचार्यों का योगदान है और तब जा कर के हुआ है..! ये देश राजनेताओं ने नहीं बनाया है, ये देश किसी सरकार ने नहीं बनाया है, ये देश ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, शिक्षकों ने बनाया है, और तब जा कर के देश आगे बढ़ा है। सारी चीज़ें हमने राज के आस-पास, इर्द-गिर्द हमने इक्कठी कर दी हैं, और इन सारी शक्तियों को हमने नकार दिया है..! आवश्यकता है कि इन सभी शक्तियों को जोड़ें, सब शक्तियों का मिलन हो, सतसंकल्प के साथ सतशक्तियाँ सतपथ पर चलें, तो दुनिया की कोई ताकत ऐसी नहीं है कि इस भारत महामाता को जगदगुरू बनने से रोक सके..!

भाइयो और बहनों, मैं बहुत आशावादी व्यक्ति हूँ। विश्वास मेरी रगों में दौड़ता है। मेरा पसीना विकास मंत्र से पुलकित होता है। और इसलिए मैं कहता हूँ और गुजरात के अनुभव से कहता हूँ कि निराश होने का कोई कारण नहीं है..! मुझे याद है कि 2001 में जब गुजरात में भंयकर भूंकप आया, तब सारा विश्व कहता था कि गुजरात मौत की चादर ओढ कर के सोया है, अब गुजरात खड़ा नहीं हो सकता..! अब गुजरात का कुछ होगा नहीं, अध्याय पूरा हो गया..! जो गुजरात के लिए अच्छा चाहते थे वो भी दु:खी थे, उनको भी लगता था कि परमात्मा ने इतना बड़ा कहर क्यों किया..? लेकिन वही गुजरात ने करके दिखाया..! सारा विश्व कहता है, वर्ल्ड बैंक कहती है कि भयानक भूंकप की आफत में से निकलने में समृद्घ देशों को भी सात साल लगते हैं। हम तो गरीब देशों में गिने जाते हैं, लेकिन गुजरात तीन साल के भीतर-भीतर दौड़ने लग गया था। मित्रों, मैं साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि आज जो विश्व भर में गुजरात के विकास की जो चर्चा हो रही है, आज विश्वभर में गुजरात के प्रति संतोष का एक भाव जो प्रकट हो रहा है, उसका कारण नरेन्द्र मोदी नहीं है, नहीं है, नहीं है..! अगर उसका यश भागी कोई है तो छह करेाड़ गुजरातियों का पुरषार्थ है। अगर छह करोड़ गुजरातियों का पुरूषार्थ विश्व के सामने एक आदर्श पैदा कर सकता है, तो सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों का पुरुषार्थ पूरे विश्व में एक नई चेतना पैदा कर सकता है, इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए..!

भाइयो और बहनों, हमने ना कभी जीवन में लेने, पाने, बनने के सपने देखें हैं, ना कभी ऐसे सपने संजोए हैं। हम तो फकीरी को लेकर चलने वाले इंसान हैं..! कल क्या था..? अगर कल कुछ नहीं था तो आने वाले कल में कुछ होना चाहिए इसकी कामना कभी जिंदगी में नहीं की..! और मित्रों, राजा रंतिदेव ने कहा था और ये देश की विशेषता देखिए कि जहाँ एक राजा किस प्रकार की ललकार करता है। राजा रंतिदेव ने कहा था ‘ना कामये राज्यम्, ना मोक्षम्, ना पुर्नभवम्, कामये दु:ख तप्तानाम्, प्राणीनाम् आर्त नाशनम्’... ना मुझे राज्य की कामना है, ना मुझे मोक्ष की कामना है, अगर कामना है तो पीड़ितों के, दुखियारों के, वंचितों के आंसू पोछने की कामना है, ये हमारी पंरपरा रही है..! ‘ना कामये राज्यम्, ना मोक्षम्, ना पुर्नभवम्’, हम उस परंपरा से निकले हैं, जिसने हमें सिखाया है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’... हम उस परंपरा से निकले हैं..! कुछ लोग हमारे इरादों पर शक करते हैं। अपने-पराए ऐसी दीवारें खड़ी करने की कोशिश करते हैं। मैं उन सबको कहना चाहता हूँ कि मैं जिस परंपरा में पला हूँ, मैं जिस संस्कारों में बड़ा हुआ हूँ और जिसने मुझे जो मंत्र सिखाया है, उस मंत्र को मैं मेरे राजनीतिक जीवन का मेनिफेस्टो मानता हूँ..! वो मंत्र कहता है, ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया’..! मुझे कभी ये नहीं कहा कि ‘हिन्दु सुखिन: संतु, हिन्दु निरामया’, ऐसा नहीं कहा..! मेरे पूर्वजों ने मुझे कहा है, ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणी पश्यन्तु, माँ कश्चित दु:ख भाग भवेत’... सबके कल्याण की बात, सबके स्वास्थ्य की बात, सबकी समृद्घि की बात, ये मैनिफैस्टो हमें हमारे पूर्वजों ने दिया है। शायद दुनिया में किसी समाज के पास, किसी धर्म के पास, किसी परंपरा के पास दो लाइन में मानव विकास का चित्र खींचा गया हो, सोशल वैलफेयर के कामों का खाका लिया गया हो, ऐसा शायद दुनिया में कहीं नहीं होगा, ये मेरा ज्ञान कहता है..! और इसलिए भाइयो और बहनों, हमारे पास अगर इतनी बड़ी विरासत है, तो भय किस चीज का..?

मुझे स्मरण है, 2002 में मैं चुनाव जीत कर आया था। कई लोगों के लिए बहुत बड़ा सदमा था, वो बेचारे अभी तक होश में नहीं आए हैं..! 12 साल हो गए..! उस दिन का मेरा एक भाषण है। मैं मीडिया के मित्रों को कहता हूँ कि आप में अगर ईमानदारी नाम की चीज है तो उस समय के यू-टयूब पर जा कर के मेरा वो भाषण देख लीजिए। चुनाव जीतने के बाद मैंने कहा था कि अब चुनाव समाप्त हो चुके हैं, राजनीतिक गहमागहमी समाप्त हो चुकी है, तू-तू, मैं-मैं का दौर खत्म हो चुका है, अब हम सबको मिल कर के गुजरात को आगे बढ़ाना है..! और मैंने कहा था कि जिन्होंने हमें वोट दिए हैं वो भी मेरे हैं, जिन्होंने हमें वोट नहीं दिया वो भी मेरे हैं, और जिन्होंने किसी को वोट नहीं दिया वो भी मेरे हैं..! मैंने ये भी कहा था, ‘अभयम्’, ये मेरा शब्द था उस दिन के भाषण में, 2002 के उस माहौल में..! ये संतो की कृपा रही है, इन्हीं की शिक्षा-दीक्षा रही है कि उस माहौल में भी, इतने विकट वातावरण में भी ईश्वर ने मेरे मुंह से एक शब्द निकाला था और मैंने कहा था कि अब सरकार बन चुकी है और मेरा एक ही मंत्र है, ‘अभयम्’..! भाइयों-बहनों, आज 12 साल हो चुके हैं। जिस गुजरात के अंदर आए दिन दंगे होते थे, निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया जाता था, आज 12 साल हो गए हैं, लेकिन दंगो का नामों-निशान वहां नहीं बचा है, मित्रों..! क्यों..? ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया’, ये मंत्र की साधना की है तब जा कर के ये हुआ है। और इसलिए भाइयों-बहनों, मैं कहना चाहता हूँ कि एक छोटी सी जमात इस राष्ट्र की मूल धारा को ललकारती रही है। हमने उसकी अनदेखी की है, उसके कारण हमें बहुत भुगतना पड़ा है। छोटी सी ही क्यों ना हो, लेकिन सात्विक शक्ति को हमें इतनी उभारनी होगी, ताकि इस प्रकार की विकृतियाँ अपने आप नष्ट हो जाएं।

आयुर्वेद तो यही कहता है..! और आज बहुत बड़ी सेवा की है आचार्य जी ने, इतने बड़े ग्रंथ दिए हैं। देखिए, हमारे यहाँ एक जमाना था, सारा विज्ञान ऋषियों के द्वारा ही आया हुआ है। हमारे ऋषि-मुनि जंगलों में तपस्या करते थे, उसी से तो हमारे सारे ग्रंथ बने थे..! उसी परंपरा की एक छोटी सी कड़ी के रूप में आज इस भूमि पर इतने समृद्घ ग्रंथों का लोकापर्ण किया है और मैंने आचार्य जी से प्रार्थना की है कि इसका डिजिटल फार्म हो ताकि दुनिया, नई पीढ़ी जरा इन्टरनेट पर जाकर देखें कि पेड़-पौधे क्या देते हैं, ये परमात्मा हमें क्या दे रहे हैं..! हमारे लिए सब चीजें मौजूद हैं, उसको जोड़ने का काम आचार्य जी ने इन ग्रंथों के माध्यम से किया है। आने वाली पीढ़ी के लिए सदियों तक काम आने वाला ये उत्तम काम इन्होंने किया है। मैं आपका अभिनंदन करता हूँ, मैं पतंजली योगपीठ का अभिनंदन करता हूँ कि उन्होंने हमारी जो मूलभूत शक्ति है उस पर अत्यन्त भरोसा करते हुए उसका पुनर्जागरण करने का एक अभियान उठाया है..!

भाइयो और बहनों, आज मुझे एक सम्मान पत्र दिया गया। मैं अपने आप से पूछता हूँ कि क्या मैं इसके योग्य हूँ..? मेरी आत्मा कहती है कि नहीं, मैं इसके लिए कत्तई योग्य नहीं हूँ..! लेकिन संत तो मन से माँ के रूप होते हैं, संतों के भीतर माँ का एक विराट रूप का अस्तित्व होता है। और जो संतों के निकट जाता है, उसको संतों की भीतर का जो मातृत्व होता है उसकी अनुभूति होती है। और माँ अपने बच्चे को जब वो चल नहीं पाता है, तो उंगली पकड़ कर चलो-चलो, दौड़ो-दौड़ो, अब बहुत पास में है, ऐसे खींच कर ले जाती है। माँ को मालूम होता है कि बच्चा दौड़ नहीं पाएगा, फिर भी माँ पुचकारती है कि अरे दौड़ो-दौड़ो, आ जाओ-आ जाओ... ऐसा करके दौड़ाती है..! मुझे लगता है कि मेरी दौड़ कुछ कम पड़ रही है, मुझे लगता है कि अभी भी मुझमें कुछ कमियाँ हैं और संतो ने आज मुझे एक अलग ढंग से इंगित किया है कि बेटे, ये सब तुम्हे अभी पूरा करना बाकी है..! ये सम्मान पत्र नहीं है, ये आदेश पत्र है और मेरे लिए ये प्रेरणा पुष्प है..! ये प्रेरणा पुष्प मुझे हर पल कमियों से मुक्ति पाने की ताकत दे..! और मैं संतों से खुले आम कहता हूँ, बुरा मत मानना संतों, मुझे संतों से वो आशीर्वाद नहीं चाहिए जो किसी पद के लिए होते हैं, नहीं चाहिए..! हम उसके लिए पैदा नहीं हुए हैं। मुझे संतो से आशीर्वाद चाहिए और इसलिए चाहिए कि मैं कभी कुछ गलत ना करूँ, मेरे हाथों से कुछ गलत ना हो जाए, मेरे हाथों से किसी का बुरा ना हो जाए..! संत मुझे वो आशीर्वाद दें, गंगा मैया मुझे वो सामर्थ्य दे, राजाधिराज हिमालय मुझे वो प्रेरणा दे और आप सब जनता जर्नादन ईश्वर का रूप होती है, मैं उसके चरणों में नतमस्तक होता हूँ और मैं ईश्चर के चरणों में नमन करता हूँ ताकि 125 करोड़ नागरिकों की तरह एक नागरिक के नाते हम भी कभी भी किसी का बुरा ना करें, किसी के लिए बुरा ना सोचें और जो महान कार्य के लिए यज्ञ चल रहे हैं... आप देखिए, कितनी बड़ी शिक्षा संस्था चला रहे हैं..! मैं तो यहाँ हरिद्वार की धरती पर इस शुभ अवसर पर बाबा रामदेव जी से प्रार्थना करता हूँ कि हिन्दुस्तान में संतों के द्वारा शिक्षा के जो काम हो रहे हैं, एक बार यहीं पर उनका सबसे बड़ा मेला लगना चाहिए और लोग देखें कि कोई पाँच लाख बच्चों को पढ़ा रहा है, कोई दो लाख बच्चों को पढ़ा रहा है और सब संस्कार और शिक्षण दोनों की चिंता कर रहे हैं..! ये छोटे काम नहीं है मित्रों, ये राष्ट्र निर्माण की अमूल्य सेवा है, जो इन महापुरूषों के द्वारा हो रही है..! हम कम से कम देखें तो सही, समझें तो सही, उनका गौरवगान तो करें..! लेकिन नहीं, अगर उनकी राजनीतिक उठापटक में इसका कोई मेल नहीं बैठता है, तो पता नहीं क्या कुछ कह देते हैं..! मैं हैरान हूँ, बाबा रामदेव के लिए क्या-क्या शब्द प्रयोग किए हैं इन लोगों ने, क्या-क्या शब्द बोले हैं, मैं सोच नहीं सकता हूँ, मित्रों..! मन में बड़ी पीड़ा होती है। ईश्वर से हम प्रार्थना करें कि हम सत्संकल्प लिए आगे बढ़ें और स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जंयति के निमित्त उनके सपनों को पूर्ण करने के लिए ऐसा भारत बनाने के लिए पूरी शक्ति और सामर्थ्य का अनुभव करें, इसी एक प्रार्थना के साथ फिर एक बार इस अवसर पर मुझे आने का अवसर मिला, जीवन की धन्यता के साथ उस ऋण को स्वीकार करते हुए, मैं सभी के चरणों में वंदन करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ..!

भारत माता की जय..!

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀଙ୍କ 'ମନ କି ବାତ' ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ବିଚାର ଏବଂ ଅନ୍ତର୍ଦୃଷ୍ଟି ପଠାନ୍ତୁ !
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ଗୋଆରେ କୋଭିଡ ଟିକାକରଣ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ହିତାଧିକାରୀ ଓ ସ୍ବସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ସହ ମତ ବିନିମୟ ଅବସରରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉଦବୋଧନ
September 18, 2021
ସେୟାର
 
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ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ୧୦୦% ପ୍ରଥମ ଡୋଜ୍ ପ୍ରଦାନ ପୂରଣ ଲାଗି ଗୋଆକୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ
ଏହି ଉପଲକ୍ଷେ ଶ୍ରୀ ମନୋହର ପାରିକରଙ୍କ ସେବାଗୁଡ଼ିକୁ ସ୍ମରଣ କଲେ
‘ସବକା ସାଥ, ସବକା ବିକାଶ, ସବକା ବିଶ୍ୱାସ ଓ ସବକା ପ୍ରୟାସ’ର ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଫଳାଫଳ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି ଗୋଆ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ମୁଁ ଅନେକ ଜନ୍ମଦିନ ଦେଖିସାରିଲିଣି ଏବଂ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସର୍ବଦା ସାଧାରଣ ବିବେଚନା କରିଥାଏ କିନ୍ତୁ, ମୋର ସମସ୍ତ ବର୍ଷଗୁଡ଼ିକରେ, ଗତକାଲି ଏଭଳି ଏକ ଦିନ ଥିଲା ଯାହା ମୋତେ ଆବେଗିକ ଭାବେ ପ୍ରଭାବିତ କରିଥିଲା, କାରଣ ୨.୫ କୋଟି ଲୋକଙ୍କ ଟିକାକରଣ ହୋଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ ୧୫ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ପରିଚାଳନା କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ ୨୬ ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଏବଂ ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ୪୨୫ରୁ ଅଧିକ ଟିକା ଡୋଜ ଦିଆଯାଇଥିଲା: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି ଯାହା କି ‘ଏକ ଭାରତ- ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’କୁ ପ୍ରତିପାଦିତ କରୁଛି, ମୋ ମନରେ ଅନେକ ଆନନ୍ଦ ଭରିଦେଇଛି: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ
ଗୋଆ କେବଳ ଦେଶର ଏକ ରାଜ୍ୟ ନୁହେଁ, ବରଂ ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ଏକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଚିହ୍ନ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ

ଗୋଆର ଉର୍ଜାବାନ ତଥା ଲୋକପ୍ରିୟ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ମନ୍ତ୍ରିମଣ୍ଡଳରେ ମୋର ସାଥୀ, ଗୋଆର ସୁପୁତ୍ର ଶ୍ରୀପଦ ନାୟକ ମହାଶୟ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀ ପରିଷଦରେ ମୋର ସହକର୍ମୀ ଡକ୍ଟର ଭାରତୀ ପାୱାର ମହାଶୟା, ଗୋଆର ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀଗଣ, ସାଂସଦ ଏବଂ ବିଧାୟକ, ଅନ୍ୟ ଜନ ପ୍ରତିନିଧି, ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ !

ଗୌୟଚ୍ୟା ମ୍ହଜା ମୋଗାଲ ଭାବା ବହିଣିନୋ, ତୁମଚେ ଅଭିନନ୍ଦନ।

ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଶ୍ରୀ ଗଣେଶ ପର୍ବର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭକାବନା । ଆସନ୍ତାକାଲି ଅନନ୍ତ ଚତର୍ଦ୍ଦଶୀର ପବିତ୍ର  ଅବସରରେ ଆମେ ସମସ୍ତେ ବାପ୍ପାଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେବା, ଆମେ ମଧ୍ୟ ଆମ ହାତରେ ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ବାନ୍ଧିବା। ଅନନ୍ତ ସୂତ୍ର ଅର୍ଥାତ ଜୀବନରେ ସୁଖ-ସମୃଦ୍ଧି, ଦୀର୍ଘ ଜୀବନର ଆଶୀର୍ବାଦ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ ଏହି ପବିତ୍ର ଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ନିଜ ହାତରେ, ବାହୁରେ ଜୀବନ ରକ୍ଷା ସୂତ୍ର,  ଅର୍ଥାତ୍ ଟିକା ନେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଶେଷ କରିଛନ୍ତି । ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ୟକ୍ତି ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଟିକା ନେଇ ସାରିଛନ୍ତି । କରୋନା ବିରୋଧରେ ଲଢେଇରେ ଏହା ହେଉଛି ଏକ ବଡ କାର୍ଯ୍ୟ। ଏଥିପାଇଁ ଗୋଆର ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ଏପରି ଏକ ରାଜ୍ୟ, ଯେଉଁଠାରେ ଭାରତର ବିବିଧତାର ଶକ୍ତି ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ। ପୂର୍ବ ଏବଂ ପଶ୍ଚିମର ସଂସ୍କୃତି, ଚାଲିଚଳନୀ, ଖାଦ୍ୟପେୟ ଏଠାରେ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଥାଏ । ଏଠାରେ ଗଣେଶୋତ୍ସବ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରାଯାଏ, ଦୀପାବଳୀ ମଧ୍ୟ ଧୂମଧାମରେ  ପାଳନ କରାଯାଏ ଏବଂ ଖ୍ରୀଷ୍ଟମାସ ସମୟରେ ଗୋଆର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଆହୁରି ବୃଦ୍ଧି ପାଇଥାଏ । ଏହାସବୁ କରିବା ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆ ନିଜର ପରମ୍ପରା ନିର୍ବାହ କରିଥାଏ। ଏକ ଭାରତ-ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତର ଭାବନାକୁ ନିରନ୍ତର ସୁଦୃଢ କରୁଥିବା ଗୋଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଉପଲବ୍ଧି, କେବଳ ମୋତେ ନୁହେଁ, ବରଂ ସମଗ୍ର ଦେଶକୁ ଖୁସି ଦେଇଥାଏ ଏବଂ ଗର୍ବରେ ଭରି ଦେଇଥାଏ।

ଏହି ଗୁରୁତ୍ବପୂର୍ଣ୍ଣ ଅବସରରେ, ମୋର ବନ୍ଧୁ, ସଚ୍ଚୋଟ କର୍ମାଯାଗୀ, ସ୍ବର୍ଗତ ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ମନେ ପଡିବା ସ୍ୱାଭାବିକ କଥା । 100 ବର୍ଷର ସବୁଠାରୁ ବଡ ସଙ୍କଟ ସହିତ ଗୋଆ ଯେଉଁଭଳି ଭାବରେ ମୁକାବିଲା କରିଛି, ପାରିକର ମହାଶୟ ଆଜି ଆମ ଗହଣରେ ଥାଆନ୍ତେ, ତେବେ ସେମ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସିଦ୍ଧି ପାଇଁ, ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ଉପଲବ୍ଧି ପାଇଁ ବହୁତ ଗର୍ବି କରିଥାନ୍ତେ।

ଗୋଆ ବିଶ୍ୱର ସର୍ବବୃହତ ଏବଂ ଦ୍ରୁତ ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ- ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଟିକା, ମାଗଣା ଟିକାର ସଫଳତାରେ ପ୍ରମୁଖ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କରିଛି । ଗତ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆରେ ପ୍ରବଳ ବର୍ଷା, ଘୂର୍ଣ୍ଣିଝଡ, ବନ୍ୟା ପରି ପ୍ରାକୃତିକ ବିପର୍ଯ୍ୟୟ ସହିତ ଖୁବ ସାହସର ସହିତ ଲଢେଇ କରିଛି। ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରମୋଦ ସାୱନ୍ତ ମହାଶୟଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ବଡ଼ ସାହସର ସହିତ ଲଢିଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରାକୃତିକ ଆହ୍ବାନ ମଧ୍ୟରେ କରୋନା ଟିକାକରଣର ଗତି ବଜାୟ ରଖିଥିବାରୁ ସମସ୍ତ କରୋନା ଯୋଦ୍ଧାଙ୍କୁ, ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀଙ୍କ ଦଳ, ଗୋଆର ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି।

ଏଠାରେ ଅନେକ ସାଥୀ ଯେଉଁମାନେ ସେମାନଙ୍କର ଅନୁଭୂତି ସଂପର୍କରେ ଆମ ସହିତ ମତ ବିନିମୟ କରିଛନ୍ତି, ତାହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଏହି ଅଭିଯାନ କେତେ କଷ୍ଟକର ଥିଲା। ଭରା  ନଦୀ ପାର ହୋଇ, ଟିକାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖି ଦୂର ଦୂରାନ୍ତରେ ପହଞ୍ଚିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଭାବନା ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ, ସମାଜ ପ୍ରତି ଭକ୍ତି ଦରକାର ଏବଂ ଅପ୍ରତିମ ସାହସର ଆବଶ୍ୟକ ପଡିଥାଏ। ଆପଣ ସମସ୍ତେ ଅଟକି ନ ଯାଇ, ଥକି ନ ପଡି ମାନବିକତାର ସେବା କରୁଛନ୍ତି। ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ସେବା ସଦା- ସର୍ବଦା ସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ରହିବ।

ସାଥୀଗଣ,

ସାବକା ସାଥ, ସାବକା ବିକାଶ, ସାବକା ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ ସାବକା ପ୍ରୟାସ (ସମସ୍ତଙ୍କର ସହିତ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିକାଶ, ସମସ୍ତଙ୍କର ବିଶ୍ୱାସ ଏବଂ  ସମସ୍ତଙ୍କର ପ୍ରୟାସ)- ଏହି ସମସ୍ତ କଥା କିଭଳି ଚମତ୍କାର ଫଳାଫଳ ଆଣିଥାଏ, ଏହା ଗୋଆ, ଗୋଆର ସରକାର, ଗୋଆର ନାଗରିକ, ଗୋଆର କରୋନା ଯୋଦ୍ଧା, ଆଗଧାଡିର କର୍ମଚାରୀ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି । ସାମାଜିକ ଏବଂ ଭୌଗୋଳିକ ଆହ୍ବାନର ମୁକାବିଲା ପାଇଁ ଗୋଆ ଯେଉଁ ପ୍ରକାରର ସମନ୍ୱୟ ଦେଖାଇଛି, ତାହା ବାସ୍ତବରେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ପ୍ରମୋଦ ମହାଶୟ ଆପଣଙ୍କୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଟିମକୁ ବହୁତ- ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା । ରାଜ୍ୟର ଦୂର- ଦୂରାନ୍ତରେ ବସବାସ କରୁଥିବା, କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ସମସ୍ତ ସବ୍-ଡିଭିଜନରେ ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟ ଭଳି ଦ୍ରୁତଗତିରେ ଟିକାକରଣ କରାଯିବା ହେଉଛି ଏହାର ଏକ ବଡ଼ ପ୍ରମାଣ।

ମୁଁ ଖୁସି ଯେ, ଗୋଆ ଏହାର ଗତିକୁ ହ୍ରାସ କରିବାକୁ ଦେଇ ନାହିଁ । ଏହି ସମୟରେ ଏପରିକି ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଆଲୋଚନା କରୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ରାଜ୍ୟରେ ଦ୍ୱିତୀୟ ଡୋଜ ପାଇଁ ଟିକା ଉତ୍ସବ ଚାଲିଛି। ଏହିଭଳି ଆନ୍ତରିକ, ଏକନିଷ୍ଠ ଉଦ୍ୟମ ସହିତ ଗୋଆ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟିକାକରଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଦେଶର ଏକ ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟ ହେବା ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି। ଆଉ ଏହା ମଧ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ କଥା ଯେ ଗୋଆ ନା କେବଳ ଏହାର ଜନସଂଖ୍ୟା ନୁହେଁ ଏଠାକୁ ଆସୁଥିବା ପର୍ଯ୍ୟଟକ, ବାହାରୁ ଆସୁଥିବା ଶ୍ରମିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଟିକାଦାନ କରୁଛି ।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜିର ଏହି ଅବସରରେ ମୁଁ ଦେଶର ସମସ୍ତ ଡାକ୍ତର, ସ୍ବାସ୍ଥ୍ୟସେବା କର୍ମଚାରୀ, ପ୍ରଶାସନ ସହ ଜଡିତ ଲୋକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶଂସା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ ଯୋଗୁଁ ଗତକାଲି ଭାରତ ଗୋଟିଏ ଦିନରେ ଅଢେଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦେବାର ରେକର୍ଡ କରିଛି। ବିଶ୍ବର ବଡ଼ ବଡ଼ ସମୃଦ୍ଧ ଏବଂ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଥିବା ଦେଶ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରି ନାହାଁନ୍ତି । ଗତକାଲି ଆମେ ଦେଖୁଥିଲୁ କିଭଳି ଦେଶ ଆଲାରାମ ଲଗାଇ କୋୱିନ ଡ୍ୟାସବୋର୍ଡକୁ ଦେଖୁଥିଲା। ବୃଦ୍ଧି ପାଉଥିବା ସଂଖ୍ୟାକୁ କେଇ ଉତ୍ସାହିତ ହୋଇ ପଡୁଥିଲେ।

ଗତକାଲି ପ୍ରତି ଘଣ୍ଟାରେ 15 ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ମିନିଟରେ 26 ହଜାରରୁ ଅଧିକ ଟୀକାକରଣ କରାଯାଇଥିଲା, ପ୍ରତି ସେକେଣ୍ଡରେ ଚାରି ଶହ ପଚିଶରୁ ଅଧିକ ଲୋକ ଏହି ଟିକା ନେଇଥିଲେ। ଦେଶର ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଣ ଅନୁକୋଣରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରାଯାଇଥିବା ଏକ ଲକ୍ଷରୁ ଅଧିକ ଟିକାକରଣ କେନ୍ଦ୍ରରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆଯାଇଛି । ଭାରତର ନିଜସ୍ୱ ଟିକା, ଟିକାକରଣ ପାଇଁ ଏତେ ବଡ଼ ନେଟୱାର୍କ, କୁଶଳୀ ମାନବ ସମ୍ବଳ, ଏହା ଭାରତର ସାମର୍ଥ୍ୟକୁ ଦର୍ଶାଉଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଗତକାଲି ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଯେଉଁ ଉପଲବ୍ଧି ମିଳିଛି ନା, ତାହା କେବଳ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱରେ ଟୀକାକରଣର ପରିସଂଖ୍ୟାନ ଆଧାରରେ ନୁହେଁ, ଭାରତ ପାଖରେ କେତେ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଅଛି ତାହାର ପରିଚୟ ବିଶ୍ବକୁ ମିଳିବାକୁ ଯାଉଛି। ଆଉ ସେଥିପାଇଁ ଏହାର ଗୌରବଗାନ କରିବା ହେଉଛି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଏହା ମଧ୍ୟ ସ୍ବଭାବ ହେବା ଉଚିତ୍।

ସାଥୀଗଣ,

ମୁଁ ଆଜି ମୋର ମନର କଥା ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ବହୁତ ଜନ୍ମଦିନ ତ ଆସିଛି ଆଉ ଯାଇଛି କିନ୍ତୁ ମୁଁ ମନର ସହିତ ସବୁବେଳେ ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ଅଲିପ୍ତ ହୋଇ ରହିଛି, ଏହି ସବୁ ଜିନିଷଗୁଡ଼ିକ ଠାରୁ ମୁଁ ଦୂରେଇ ରହିଛି । କିନ୍ତୁ ମୋର ଏତିକି ଆୟୂଷରେ କାଲିର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ମୋତେ ବହୁତ ଭାବୁକ କରିବା ଭଳି ଥିଲା। ଜନ୍ମଦିନ ପାଳନ କରିବାର ବହୁତ ଗୁଡ଼ିଏ ଉପାୟ ରହିଛି। ଲୋକମାନେ ଭିନ୍ନ- ଭିନ୍ନ ଉପାୟରେ ମଧ୍ୟ ପାଳନ କରିଥାଆନ୍ତି। ଆଉ ଯଦି ପାଳନ କରନ୍ତି ତେବେ କିଛି ଯେ ଭୁଲ କରନ୍ତି ଏଭଳି ଭାବୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ମୁଁ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କ ପ୍ରୟାସ କାରଣରୁ, କାଲିକାର ଦିନ ମୋ ପାଇଁ ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥିଲା।

ମେଡିକାଲ କ୍ଷେତ୍ରର ଲୋକମାନେ, ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ବିଗତ ଦେଢ଼- ଦୁଇ ବର୍ଷ ଧରି ଦିନ-ରାତି ଲାଗି ପଡ଼ିଛନ୍ତି, ନିଜ ଜୀବନର ଚିନ୍ତା ନ କରି କରୋନା ସହିତ ଲଢ଼ିବାରେ ଦେଶବାସୀମାନଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି, ସେମାନେ କାଲି ଟିକାକରଣର ଯେଉଁ ରେକର୍ଡ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି, ତାହା ହେଉଛି ବହୁତ ବଡ଼ କଥା। ସମସ୍ତେ ଏଥିରେ ବହୁତ ସହଯୋଗ କରିଛନ୍ତି। ଲୋକମାନେ ଏହାକୁ ସେବା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଲେ। ଏହା ହେଉଛି ତାଙ୍କର କରୁଣା ଭାବ, କର୍ତବ୍ୟ ଭାବ, ଯେଉଁଥିପାଇଁ ଅଢ଼େଇ କୋଟି ଟିକାର ଡୋଜ ଦିଆ ଯାଇ ପାରିଲା । ଆଉ ମୁଁ ମାନୁଛି ଯେ, ଟିକାର ପ୍ରତ୍ୟେକଟି ଡୋଜ, ଗୋଟିଏ ଜୀବନକୁ ବଂଚାଇବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାଏ। ଅଢ଼େଇ କୋଟିରୁ ଅଧିକ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଏତେ କମ୍ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ, ଏତେ ବଡ଼ ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳିବା, ବହୁତ ସନ୍ତୋଷ ପ୍ରଦାନ କରିଥାଏ। ଜନ୍ମଦିନମାନ ଆସିବ, ଯିବ, କିନ୍ତୁ କାଲିର ଏହି ଦିନ ମୋ ମନକୁ ଛୁଇଁ ଯାଇଛି, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ଯାଇଛି। ମୁଁ ଯେତିକି ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବି ତାହା କମ୍ ହେବ। ମୁଁ ହୃଦୟର ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି, ସମସ୍ତଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜ୍ଞାପନ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଭାରତର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନ, କେବଳ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ହିଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ଗୋଟିଏ ପ୍ରକାରରେ ଅଜୀବିକାରର ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ସୁରକ୍ଷା କବଚ। ଏବେ ଆମେ ଦେଖିବା ତ ହିମାଚଳ, ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ମାମଲାରେ 100ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଗୋଆ 100 ପ୍ରତିଶତ ହୋଇ ଯାଇଛି, ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ଏବଂ ଲାକ୍ଷାଦ୍ୱୀପରେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତ ପ୍ରାପ୍ତ ବୟସ୍କ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଡୋଜ ଦିଆଯାଇ ସାରିଛି। ସିକ୍କିମ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଶୀଘ୍ର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଆଣ୍ଡାମାନ ନିକୋବାର, କେରଳ, ଲଦ୍ଦାଖ, ଉତରାଖଣ୍ଡ, ଦାଦରା ଏବଂ ନଗର ହାବେଳୀ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଦୂରରେ ନାହିଁ।

ସାଥୀଗଣ,

ଏହା ବହୁତ ଚର୍ଚ୍ଚାକୁ ଆସିନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଭାରତ ନିଜର ଟିକାକରଣ ଅଭିଯାନରେ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ର ସହିତ ଜଡ଼ିତ ରାଜ୍ୟଗୁଡ଼ିକୁ ବହୁତ ପ୍ରାଥମିକତା ଦେଇଛି। ପ୍ରାରମ୍ଭରେ ଆମେ କହିଲୁ ନାହିଁ କାରଣ ଏହା ଉପରେ ମଧ୍ୟ ରାଜନୀତି ହେବାକୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ଯାଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଏହା ବହୁତ ଜରୁରୀ ଥିଲା ଯେ ଆମର ପର୍ଯ୍ୟଟନସ୍ଥଳ ଶୀଘ୍ରରୁ ଅତି ଶୀଘ୍ର ଖୋଲୁ । ଏବେ ଉତରାଖଣ୍ଡରେ ମଧ୍ୟ ଚାର-ଧାମ ଯାତ୍ରା ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ। ଆଉ ଏହି ସବୁ ପ୍ରୟାସ ଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ, ଗୋଆର 100 ପ୍ରତିଶତ ହେବା, ବହୁତ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ହୋଇ ଯାଇଥାଏ।

ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରର ପୁନଃରୁଦ୍ଧାର କରିବାରେ ଗାଁର ଭୂମିକା ହେଉଛି ବହୁତ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ । ଆପଣ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ, ହୋଟେଲ ଶିଳ୍ପର ଲୋକ ହୁଅନ୍ତୁ, ଟ୍ୟାକ୍ସି ଡ୍ରାଇଭର ହୁଅନ୍ତୁ, ଫେରିବାଲା ହୁଅନ୍ତୁ, ଦୋକାନୀ ହୁଅନ୍ତୁ, ଯେତେବେଳେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଟିକା ଦିଆ ଯାଇଥିବ ତେବେ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନେ ମଧ୍ୟ ସୁରକ୍ଷାର ଏକ ଭାବନା ନେଇ ଏଠାକୁ ଆସିବେ। ଏବେ ଗୋଆ ଦୁନିଆର ସେହି ହାତଗଣତି ଅନ୍ତର୍ଜାତୀୟ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସ୍ଥଳୀରେ ସାମିଲ ହୋଇ ଚାଲିଛି, ଯେଉଁଠାରେ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଟିକାର ସୁରକ୍ଷା କବଚ ମିଳି ସାରିଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଗାମୀ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ଋତୁରେ ଏଠାରେ ପୂର୍ବଭଳି ହିଁ ପର୍ଯ୍ୟଟନ କାର୍ଯ୍ୟକଳାପ ହେଉ, ଦେଶ –ବିଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଏଠାରେ ଆନନ୍ଦ ନେଇ ପାରିବେ, ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର କାମନା । ଏହା ସେତେବେଳେ ସମ୍ଭବ ହୋଇ ପାରିବ ଯେତେବେଳେ ଆମେ କରୋନା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସାବଧାନତା ଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ସେତିକି ଧ୍ୟାନ ଦେବା, ଯେତିକି ଟିକାକରଣ ଉପରେ ଦେଉଛେ । ସଂକ୍ରମଣ କମ୍ ହୋଇଛି କିନ୍ତୁ ଏବେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଭୂତାଣୁକୁ ଆମକୁ ହାଲୁକା ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିବା ନାହିଁ। ସୁରକ୍ଷା ଏବଂ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ଉପରେ ଯେତିକି ଗୁରୁତ୍ୱ ରହିବ, ପର୍ଯ୍ୟଟକ ସେତେ ଅଧିକ ସଂଖ୍ୟାରେ ଏଠାକୁ ଆସିବେ।

ସାଥୀଗଣ,

କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମଧ୍ୟ ଏବେ ନିକଟରେ ବିଦେଶୀ ପର୍ଯ୍ୟଟକମାନଙ୍କୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରିବା ପାଇଁ ଅନେକ ପଦକ୍ଷେପ ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ଭାରତ ଆସିବାକୁ 5 ଲକ୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟଟକଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ଭିସା ପ୍ରଦାନ କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତି ନିଆଯାଇଛି। ଯାତ୍ରାଏବଂ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ହିତଧାରକ ମାନଙ୍କୁ 10 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ଶତ- ପ୍ରତିଶତ ସରକାରୀ ଗ୍ୟାରେଂଟି ସହିତ ଦିଆ ଯାଉଛି। ପଞ୍ଜୀକୃତ ପର୍ଯ୍ୟଟକ ଗାଇଡ଼୍ ମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ 1 ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଋଣ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି। କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଆଗକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସେହି ପଦକ୍ଷେପ ଉଠାଇବା ପାଇଁ ପ୍ରତିବଦ୍ଧ, ଯାହା ଦେଶର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇବାରେ ସହାୟକ ହେବ।

ସାଥୀଗଣ,

ଗୋଆର ପର୍ଯ୍ୟଟନ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ଆକର୍ଷକ କରିବା ପାଇଁ, ସେଠାକାର କୃଷକ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କର ସୁବିଧା ପାଇଁ, ଭିତିଭୂମିକୁ ଡବଲ ଇଂଜିନ ସରକାରଙ୍କର ଦୁଇଗୁଣ ଶକ୍ତି ମିଳୁଛି। ବିଶେଷ କରି ଯୋଗାଯୋଗ ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଭିତିଭୂମି ଉପରେ ଗୋଆରେ ଅଦ୍ଭୂତପୂର୍ବ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ‘ମୋପା’ରେ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଥିବା ଗ୍ରୀନଫିଲ୍ଡ ଏୟାରପୋର୍ଟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ନିର୍ମାଣ ହୋଇ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଏହି ବିମାନବନ୍ଦରକୁ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ସହ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ପ୍ରାୟ 12 ହଜାର କୋଟି ଟଙ୍କା ବ୍ୟୟରେ 6 ଲେନର ଆଧୁନିକ ସଂଯୋଗକାରୀ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି। କେବଳ ଜାତୀୟ ରାଜପଥ ନିର୍ମାଣରେ ହିଁ ବିଗତ ବର୍ଷମାନଙ୍କରେ ହଜାର ହଜାର କୋଟି କୋଟି ଟଙ୍କାର ନିବେଶ ମଧ୍ୟ ଗାଁ ମାନଙ୍କରେ ହୋଇଛି।

ଏହା ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ବହୁତ ଖୁସିର କଥା ଯେ ଉତରର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକୁ ଦକ୍ଷିଣର ଗାଁ ଗୁଡ଼ିକ ସହିତ ଯୋଡ଼ିବା ପାଇଁ ‘ଝୁରୀ ବ୍ରିଜ’ର ଲୋକାର୍ପଣ ମଧ୍ୟ ଆଗାମୀ କିଛି ମାସ ମଧ୍ୟରେ ହେବାକୁ ଯାଉଛି। ଯେମିତିକି ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି, ଏହି ବ୍ରିଜ ପଣଜୀକୁ ‘ମାର୍ଗୋ’ ସହିତ ଯୋଡ଼ୁଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଗୋଆ ମୁକ୍ତି ସଂଗ୍ରାମର ଅନନ୍ୟ ସଂଗ୍ରାମର ସାକ୍ଷୀ ‘ଅଗୌଡ଼ା’ ଦୁର୍ଗ ମଧ୍ୟ ଖୁବ ଶୀଘ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଖୋଲି ଦିଆଯିବ।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆର ବିକାଶର ଯେଉଁ ପରମ୍ପରା ମନୋହର ପାରିକର ମହାଶୟ ଛାଡ଼ିଥିଲେ, ତାହାକୁ ମୋର ମିତ୍ର ଡ. ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ଟିମ୍ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ମନୋନିବେଶର ସହିତ ଆଗକୁ ବଢାଉଛନ୍ତି। ସ୍ୱାଧୀନତାର ଅମୃତକାଳରେ ଯେତେବେଳେ ଦେଶ ଆତ୍ମନିର୍ଭରତାର ନୂତନ ସଂକଳ୍ପ ସହିତ ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଛି ତେବେ ଗୋଆ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ସଂକଳ୍ପ ନେଇଛି। ମୋତେ ଅବଗତ କରାଯାଇଛି ଯେ ଆତ୍ମନିର୍ଭର ଭାରତ, ସ୍ୱୟଂପୂର୍ଣ୍ଣା ଗୋଆର ଏହି ସଂକଳ୍ପ ମାଧ୍ୟମରେ ଗୋଆରେ 50 ରୁ ଅଧିକ ଏହିଭଳି ଉପାଦାନ ନିର୍ମାଣ ଉପରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ ସାରିଛି। ଏହା ଦର୍ଶାଉଛି ଯେ ଗୋଆ ରାଷ୍ଟ୍ରୀୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତି ପାଇଁ, ଯୁବକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ରୋଜଗାରର ନୂତନ ଅବସର ସୃଷ୍ଟି କରିବା ପାଇଁ କେତେ ଗମ୍ଭୀରତାର ସହିତ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛି।

ସାଥୀଗଣ,

ଆଜି ଗୋଆ କେବଳ କୋଭିଡ଼ ଟିକାକରଣରେ ଅଗ୍ରଣୀ ନୁହେଁ, ବରଂ ବିକାଶର ଅନେକ ସ୍ତରରେ ଦେଶର ଅଗ୍ରଣୀ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ହେଉଛି ଗୋଟିଏ। ଗୋଆର ଯେଉଁ ଗ୍ରାମୀଣ ଏବଂ ସହରୀ କ୍ଷେତ୍ର ରହିଛି, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ଖୋଲା ମଳମୁକ୍ତ ହେବାରେ ଲାଗିଛି। ବିଜୁଳି ଏବଂ ପାଣି ଭଳି ମୌଳିକ ସୁବିଧାଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଆରେ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଉଛି। ଗୋଆ ହେଉଛି ଦେଶର ଏଭଳି ରାଜ୍ୟ ଯେଉଁଠାରେ ଶତ ପ୍ରତିଶତ ବିଜୁଳିକରଣ ହୋଇ ସାରିଛି। ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ମାମଲାରେ ତ ଗୋଆ ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଛି। ଗୋଆର ଗ୍ରାମୀଣ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରତି ଘରକୁ ପାଇପ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ପହଂଚାଇବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉଛି ପ୍ରଶଂସନୀୟ। ଜଳ ଜୀବନ ମିଶନ ମାଧ୍ୟମରେ ବିଗତ 2 ବର୍ଷରେ ଦେଶରେ ଏ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରାୟ 5 କୋଟି ପରିବାରଙ୍କୁ ପାଇପ୍ ମାଧ୍ୟମରେ ଜଳ ସୁବିଧା ସହିତ ଯୋଡ଼ିଛନ୍ତି। ଯେଉଁଭଳି ଭାବେ ଗୋଆ ଏହି ଅଭିଯାନକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ାଇଛି ତାହା ‘ଗୁଡ଼୍ ଗଭର୍ଣ୍ଣାନ୍ସ’(ସୁ-ଶାସନ) ଏବଂ ‘ଇଜ୍ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ’କୁ ନେଇ ଗୋଆ ସରକାରଙ୍କର ପ୍ରାଥମିକତାକୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରୁଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ସୁଶାସନକୁ ନେଇ ଏହି ପ୍ରତିବଦ୍ଧତା କରୋନା କାଳରେ ଗୋଆ ସରକାର ଦେଖାଇଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ପ୍ରକାରର ଆହ୍ୱାନ ଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୱେ, କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ଯେଉଁ ସାହାଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଗୋଆ ପାଇଁ ପଠାଇଲେ, ତାହାକୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ, ବିନା କୌଣସି ଭେଦଭାବରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ହିତାଧିକାରୀଙ୍କ ପାଖରେ ପହଂଚାଇବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଗୋଆର ଟିମ୍ କରିଛନ୍ତି। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗରିବ, ପ୍ରତ୍ୟେକ କୃଷକ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀ ସାଥୀଙ୍କ ପାଖରେ ସାହାଯ୍ୟ ପହଂଚାଇବାରେ କୌଣସି ଅଭାବ ରଖା ଯାଇ ନାହିଁ । ମାସ- ମାସ ଧରି ଗୋଆର ଗରିବ ପରିବାରଙ୍କୁ ମାଗଣାରେ ରାସନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଚ୍ଚୋଟତାର ସହିତ ପହଂଚାଯାଉଛି। ମାଗଣ ଗ୍ୟାସ ସିଲିଣ୍ଡର ମିଳିବା ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଅନେକ ଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଅସୁବିଧା ସମୟରେ ସାହାରା ମିଳିଛି।

ଗୋଆର କୃଷକ ପରିବାରକୁ ପିଏମ କିଷାନ ସମ୍ମାନ ନିଧି ଦ୍ୱାରା କୋଟି- କୋଟି ଟଙ୍କା ସିଧାସଳଖ ସେମାନଙ୍କର ବ୍ୟାଙ୍କ ଖାତାରେ ମିଳିଛି। କରୋନା କାଳରେ ହିଁ ଏଠାକାର ଛୋଟ- ଛୋଟ କୃଷକମାନଙ୍କୁ ମିଶନ ମୋଡରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡ ମିଳିଛି। କେବଳ ଏତିକି ନୁହେଁ, ଗୋଆର ପଶୁପାଳକଙ୍କୁ ଏବଂ ମତ୍ସ୍ୟଜୀବୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଥମ ଥର ବଡ଼ ସଂଖ୍ୟାରେ କିଷାନ କ୍ରେଡିଟ କାର୍ଡର ସୁବିଧା ମିଳିଛି । ପିଏମ ସ୍ୱନିଧି ଯୋଜନା ମାଧ୍ୟମରେ ମଧ୍ୟ ଗାଁରେ ବୁଲାବିକାଳୀ ଏବଂ ଠେଲାଗାଡ଼ି ମାଧ୍ୟମରେ ବ୍ୟବସାୟ କରୁଥିବା ସାଥୀଙ୍କୁ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଋଣ ଦେବାର କାର୍ଯ୍ୟ ଚାଲୁ ରହିଛି। ଏହି ସମସ୍ତ ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକ ଦ୍ୱାରା ଗୋଆର ଲୋକମାନଙ୍କୁ, ବନ୍ୟା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ କିଛି ସାହାଯ୍ୟ ମିଳିପାରିଛି।

ଭାଇ ଓ ଭଉଣୀମାନେ,

ଗୋଆ ହେଉଛି ଅସୀମ ସମ୍ଭାବନାଗୁଡ଼ିକର ପ୍ରଦେଶ। ଗୋଆ ଦେଶର କେବଳ ମାତ୍ର ଗୋଟିଏ ଦେଶ ନୁହେଁ, ବରଂ ହେଉଛି ବ୍ରାଣ୍ଡ ଇଣ୍ଡିଆର ମଧ୍ୟ ଏକ ସଶକ୍ତ ପରିଚୟ। ଏହା ହେଉଛି ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦାୟିତ୍ୱ ଯେ ଗୋଆର ଏହି ଭୂମିକାକୁ ଆମେ ସଂପ୍ରସାରଣ କରିବା। ଗୋଆରେ ଆଜି ଯେଉଁ ଭଲ କାର୍ଯ୍ୟମାନ ହେଉଛି, ସେଥିରେ ନିରନ୍ତରତା ହେଉଛି ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ। ଦୀର୍ଘ ସମୟ ପରେ ଗୋଆକୁ ରାଜନୈତିକ ସ୍ଥିରତାର, ସୁଶାସନର ଲାଭ ମିଳୁଛି।

ଏହି ନିରନ୍ତରତାକୁ ଗୋଆର ଲୋକମାନେ ଏହିଭଳି ଭାବେ ବଜାୟ ରଖିବେ, ଏହି କାମନାର ସହିତ ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପୁଣିଥରେ ବହୁତ-ବହୁତ ଶୁଭେଚ୍ଛା। ପ୍ରମୋଦ ଜୀ ଆଉ ତାଙ୍କର ସମଗ୍ର ଟିମକୁ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ସଗଲ୍ୟାଙ୍କ ଦେୱ ବରେଁ କରୁଁ

ଧନ୍ୟବାଦ!