वर्ष 2014 तक, भारत में वित्तीय समावेशन का प्रदर्शन बहुत निराशाजनक था। आजादी के 60 साल बाद भी, लगभग 50% भारतीयों के पास बैंक खाता नहीं था। स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में वर्ष 2014 कई मायनों में एक निर्णायक मोड़ बना और नवनिर्वाचित नरेंद्र मोदी सरकार ने वित्तीय बहिष्कार की समस्या को गंभीरता से लेते हुए इसे हल करने के लिए कदम उठाए।
15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) की घोषणा की, जो वित्तीय समावेशन की दुनिया की सबसे बड़ी पहल थी। 28 अगस्त 2014 को PMJDY के शुरू होने से पहले, PM मोदी ने बैंक कर्मचारियों को ई-मेल भेजे, उन्हें लक्ष्य हासिल करने और गरीबों को वित्तीय-अलगाव से मुक्ति दिलाने में मदद करने के लिए प्रेरित किया।
योजना के शुरू होने पर, PM मोदी ने इसे गरीबी के चक्र से मुक्ति का उत्सव बताया। उन्होंने प्राचीन संस्कृत श्लोक का जिक्र किया: ‘सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्’—अर्थात सुख का आधार धर्म है, धर्म का आधार धन है, और धन का आधार राज्य है। इसका मतलब था कि लोगों को वित्तीय समावेशन में लाने की जिम्मेदारी सरकार की है और सरकार ने इस मोर्चे पर निराश नहीं किया। अगस्त के एक हफ्ते में ही लगभग 1.81 करोड़ खाते खोले गए।
जिन गरीबों के पास कोई कागज नहीं थे, जिन प्रवासियों का पता स्थायी नहीं था, और जिन वंचितों के पास कोई सिफारिश नहीं थी, वे भी पहली बार बैंक खाता खोल सके। अब उनके पास आधार के रूप में एक खास पहचान और वित्तीय पहचान भी थी।
आज देश में 55 करोड़ जन-धन खाताधारक हैं, जिनके खातों में 2.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना ग्रामीण इलाकों में भी सफलता से पैठ बनाई है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, भारत ने छह साल में ही इस योजना के कारण वित्तीय समावेशन के लक्ष्य हासिल कर लिए, अन्यथा जिसे पाने में उन्हें 47 साल लग जाते। आज देश में ज्यादातर PMJDY खाताधारक महिलाएं हैं, जिससे उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त होने में मदद मिली है। इस योजना ने खाताधारकों को कोविड-19 जैसे संकट में महत्वपूर्ण वित्तीय सुरक्षा प्रदान की, जिससे महिलाओं को सरकारी सहायता मिली और वो ऐसी विषम आपातस्थिति में भी परिवार को संभाल सकने में सक्षम हो पाईं।
जन-धन: वित्तीय समावेशन की शुरुआत
जन-धन योजना से वित्तीय समावेशन की महत्वपूर्ण यात्रा शुरू हुई। गरीबों को बुनियादी बचत खाता, जरूरत के हिसाब से ओवरड्राफ्ट के जरिए ऋण, बीमा और पेंशन जैसी वित्तीय सेवाएं मिलीं। जन-धन एकाउंट JAM ट्रिनिटी (जनधन–आधार–मोबाइल) का एक हिस्सा है, जिसे साथ-साथ मजबूत किया गया। जन-धन खातों को आधार कार्ड और मोबाइल से जोड़ा गया, जिससे सरकारी योजनाओं के अंतर्गत दी जाने वाली राशि का लीकेज या दुरूपयोग रुका और सरकार सीधे गरीबों के खातों में लाभ स्थानांतरित कर पाने में सफल हुई। अब तक 43 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए गरीबों के खाते में पहुंची है, और नकली व डुप्लीकेट लाभार्थियों को सिस्टम से हटाकर 3.4 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है। वर्षों पुराना सिद्धांत कि सरकार एक रुपये भेजती है तो गरीब तक 15 पैसे पहुंचते हैं, अतीत का एक किस्सा मात्र बनकर रह गया है। अब सरकार एक रुपये भेजती है, तो गरीब को पूरा एक रुपये मिलता है, और गरीब उसे कई गुना बढ़ाकर देश के निर्माण में योगदान देता है।
JAM ट्रिनिटी डिजिटल इंडिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई लोग डिजिटल इंडिया का मजाक उड़ाते थे, कुछ ने इसे असंभव भी बताया, और कुछ को यह बहुत कठिन लगा, लेकिन आज सभी मानते हैं कि डिजिटल इंडिया ने भारत को देखने का दुनिया का नजरिया बदल दिया है। आज दुनिया के लगभग 50% डिजिटल लेन-देन भारत में हो रहे हैं, जो वित्तीय समावेशन को लोकतांत्रिक बनाने का एक प्रभावशाली उदहारण है।
मुद्रा योजना के माध्यम से ऋण की सुलभता
जहां, जन-धन योजना के माध्यम से वंचितों को वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, वहीं वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) के अंतर्गत छोटे व्यवसायियों के लिए ऋण की समस्या का समाधान हुआ। सूक्ष्म (Micro) और छोटे (Small) उद्यमों को अपने व्यवसाय के लिए ऋण लेने में बहुत दिक्कत होती थी। जरूरत पड़ने पर उन्हें निजी साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन वह ऋण बहुत महंगा होता था। बैंक जाने की हिम्मत भी उनके पास नहीं थी। मोदी सरकार की मुद्रा योजना ने इस स्थिति को हमेशा के लिए बदल दिया। PMMY ने MSME उधारकर्ताओं को 10 लाख रुपये तक का ऋण बिना सिक्योरिटी के दिया। वर्ष 2024 के बजट में यह सीमा बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई। सरकार ने इस योजना के माध्यम से MSMEs को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने की दिशा में बड़े कदम उठाए। योजना के अंतर्गत अब तक 52 करोड़ से ज्यादा ऋण मंजूर किए गए, जिससे 11 करोड़ नए उद्यमी बने, और भारत को दुनिया के इंफ्रास्ट्रक्चर हब के रूप में पहचान मिली है।
पिछले 10 सालों में, मुद्रा ऋण के एक लोन एकाउंट का औसत आकार लगभग तीन गुना बढ़ा है—FY16 में 38,000 रुपये से FY23 में 72,000 रुपये, और FY25 में 1.02 लाख रुपये तक—जो MSME सेक्टर की बढ़ती इकॉनमी और इसके मार्केट की गहराई व व्यापकता को दर्शाता है। मोदी सरकार ऐसे छोटे व्यवसायों की बैलेंस शीट में हिस्सेदार बनी और उन्हें लाभप्रद इकाई बनने में सहयोग किया। कई आलोचकों ने दावा किया था कि PMMY नाकाम होगी और इसको लागू करने के खिलाफ चेतावनी भी दी, लेकिन परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सुखद रहे। आज मुद्रा ऋण का NPA दर 3% से भी कम है, जो ऐसे क्षेत्र में दुनिया में सबसे कम डिफॉल्ट दर है।
PM SVANidhi: गलियों के उद्यमियों के साथ सरकार
मुद्रा योजना ने सूक्ष्म-उद्यमियों और खासकर स्ट्रीट-वेंडर्स (रेहड़ी-पटरी वालों) पर सरकार का भरोसा सुदृढ़ किया, जिससे वर्ष 2020 में PM SVANidhi योजना की शुरुआत हुई। इस कार्यक्रम ने कोविड-19 संकट से उबरने के लिए बेहद किफायती दर पर कैपिटल लोन दिए और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। महामारी के बाद भी यह योजना चलती रही, और स्ट्रीट-वेंडर्स का इसपर गहरा विश्वास कायम रहा। योजना के अंतर्गत अब तक लगभग 13,700 करोड़ रुपये वैल्यू के 96 लाख ऋण बांटे गए हैं। यह योजना Street-Preneurs यानि ‘गलियों के उद्यमियों’ के लिए एक मजबूत सहारा बनी है। ISB के सेंटर फॉर एनालिटिकल फाइनेंस (CAF) के अध्ययन से पता चला है कि शुरुआती 10,000 रुपये के ऋण से लाभार्थियों की सालाना आय 23,460 रुपये बढ़ी है। गलियों में देखे गए सपने अब सुखद स्वप्न बन रहे हैं, और वे सपने अब हकीकत बन रहे हैं।
अपने ग्यारह वर्षों के शासन में, मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन को भारत की प्रगति का आधार बनाते हुए, आमजन की वित्तीय व्यवस्था से दूरी की बाधाओं को दृढ़ता से हटाया है। 'सबका साथ, सबका विकास' के सिद्धांत से प्रेरित, इस अटल प्रतिबद्धता ने बैंकिंग, ऋण और बीमा तक सभी की पहुंच सुनिश्चित किया, जिससे लाखों लोगों को सशक्त किया गया, तथा गरीबी की जड़ों पर भी दृढ़निश्चय के साथ प्रहार किया गया। समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर, इन प्रयासों ने न केवल वित्तीय परिदृश्य को नया रूप दिया, बल्कि एक अधिक समावेशी और समृद्ध भारत की मजबूत नींव भी रखी।