वर्ष 2014 से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत ने अपने जंगल, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को बचाने में अभूतपूर्व काम किया है। सही नीतियों, जन भागीदारी और बेहतर पर्यावरण प्रबंधन की बदौलत देश में जंगल बढ़े हैं, वेट्लैन्डस् की सुरक्षा हुई है और वन्यजीवों का संरक्षण मजबूत हुआ है।

भारत में जंगल और पेड़ों से आच्छादित क्षेत्र बढ़ रहे हैं। वर्ष 2023 की भारत वन स्थिति रिपोर्ट (India State of Forest Report) के मुताबिक, देश में अब 8.27 लाख वर्ग किमी जंगल और पेड़ हैं, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें 7.15 लाख वर्ग किमी जंगल और 1.12 लाख वर्ग किमी पेड़ों से आच्छादित हैं। शहरों और कस्बों में 'नगर वन योजना' से हरे-भरे पार्क बन रहे हैं, और 546 से ज्यादा शहरी जंगल परियोजनाओं को हरी झंडी मिल चुकी है। वर्ष 2024 में पीएम मोदी ने 'एक पेड़ माँ के नाम' मुहिम की शुरुआत की, जिसके तहत 142 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए गए हैं। इन प्रयासों से वर्ष 2023 में भारत का कुल वन कार्बन स्टॉक 7,285.5 मिलियन टन हो गया, जो 2021 से 81.5 मिलियन टन ज्यादा है।

वेटलैंड्स की जैव विविधता को बढ़ावा देने और पर्यावरण को संतुलित रखने में अहम भूमिका है। भारत में वर्ष 2014 में 26 रामसर वेटलैंड्स साइट्स थीं, जो अब बढ़कर 89 हो गई हैं। ये एशिया में सबसे ज्यादा और दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं। अमृत धरोहर, मिशन सहभागिता और सेव वेटलैंड्स जैसे अभियानों ने 20 लाख से ज्यादा लोगों को जोड़ा है और वेट्लैन्डस् की सीमाएँ तय करने, उनकी हालत का ब्यौरा लेने और मॉनिटरिंग के लिए स्थानीय स्वयंसेवकों का नेटवर्क बनाया है। इंदौर और उदयपुर रामसर कन्वेंशन के तहत भारत के पहले मान्यता प्राप्त वेट्लैन्डस् शहर बन गए हैं।

भारत कई दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों का घर है, और पिछले 11 वर्षों में इन्हें संरक्षित करने के लिए दृढ़ प्रयास किए गए हैं। इन प्रयासों ने जैव विविधता को संरक्षित किया है और देश में पर्यावरण संरक्षण की योजना और कार्यान्वयन को मजबूती दी है।

भारत में बाघ संरक्षण की स्थिति अपनी उपलब्धियों के लिए सबसे ज्यादा चर्चित है, जो मोदी सरकार की दीर्घकालिक योजना, सुचारु प्राकृतिक आवास प्रबंधन और निरंतर निगरानी का परिणाम है। वर्ष 2014 में भारत में 2,226 बाघ थे, जो 2022 तक बढ़कर 3,682 हो गए। वैश्विक जंगली बाघ आबादी का कुल 70% हिस्सा आज भारत में है। संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क का भी विकास हुआ है, जिसमें 58 बाघ अभयारण्य अब 84,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को कवर करते हैं।

वर्ष 2022 में चीतों को फिर से भारत में लाया जाना संरक्षण प्रयासों में एक और मील का पत्थर है। देश में इस प्रजाति के 70 साल पहले विलुप्त होने के बाद, पीएम मोदी की पहल पर नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को स्थानांतरित कर कुनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया। भारत की कुल चीता आबादी अब 31 है। कुनो नेशनल पार्क 29 चीतों का घर है, जिसमें 19 शावक और 10 वयस्क शामिल हैं। शावकों का जन्म चीतों के अनुकूलन का संकेत है जिससे भविष्य में चीतों की जनसंख्या में सुधार की आशा बढ़ी है।

भारत में हाथियों की आबादी में भी सकारात्मक प्रगति दिखाई दी है। वर्ष 2018 में हाथियों की संख्या 26,786 से बढ़कर 2022 में 29,964 हो गई है, और वैश्विक एशियाई हाथी आबादी का 60% से अधिक हिस्सा आज भारत में है। देश में 14 राज्यों में 33 हाथी अभयारण्य हैं, जो 80,777 वर्ग किमी में फैले हैं, जो हाथियों के लिए संरक्षित आवास और आवाजाही के लिए सुरक्षित कॉरिडर प्रदान करते हैं। लॉन्ग-रेंज कॉरिडर मैपिंग और पड़ोसी देशों के साथ सहयोग ने हाथियों के लिए सुरक्षित प्रवास मार्ग सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मोदी सरकार ने हाथियों से होने वाले नुकसान को कम करने वाली नीतियों को लागू करने के लिए 15 राज्यों में 150 हाथी गलियारों और देश भर में मौजूदा रेलवे लाइनों के 1,800 किलोमीटर के हिस्से के साथ 110 महत्वपूर्ण स्थलों की पहचान की है।

असम में, एक सींग वाले गैंडे की संरक्षण योजनाओं ने उनकी संख्या को स्थिर रखने में मदद की है। काजीरंगा नेशनल पार्क, जहां 2,613 गैंडे हैं, में वर्ष 2022 में अवैध शिकार की कोई घटना दर्ज नहीं हुई। यह उपलब्धि नियम-कानूनों को बेहतर तरीके से लागू करने, उन्नत निगरानी और स्थानीय समुदायों के मजबूत समर्थन का परिणाम है, जो वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में प्रमुख भागीदार हैं।

गुजरात में, एशियाई शेरों की आबादी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2010 में गिर वन में 411 शेर थे, जो 2020 तक बढ़कर 674 हो गए। यह प्रगति शेरों के प्राकृतिक आवास संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के माध्यम से संभव हुई, जो इन जानवरों के साथ लंबे समय से प्राकृतिक परिवेश में निवास कर रहे हैं।

मोदी सरकार का पर्यावरण के प्रति समग्र दृष्टिकोण अक्वैटिक (जलचर) इकोसिस्टम पर भी विशेष ध्यान देता है। प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत, भारत ने वर्ष 2024 में गंगा नदी में डॉल्फिन्स की पहली सैटेलाइट टैगिंग की। वर्ष 2025 में एक राष्ट्रीय जनगणना ने 28 नदियों में 6,327 डॉल्फिनों की आबादी का अनुमान लगाया। यह पहल डॉल्फिन्स के लिए चिह्नित पर्यावास के उपयोग को बेहतर ढंग से समझने और नदी संरक्षण में नीतिगत हस्तक्षेप के मजबूत आधार की एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है।
पिछले ग्यारह वर्षों में भारत की, वनों, वन्यजीवों और वेट्लैन्डस् के संरक्षण में हुई प्रगति दिखाती है कि स्पष्ट योजना और जन भागीदारी के साथ बड़े परिणाम भी हासिल किए जा सकते हैं। ग्रीन कवर बढ़ाने से लेकर बाघों को बचाने, चीतों को वापस लाने और नदियों के पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण का कार्य लगातार हो रहा है, जिसके प्रभावी परिणाम सामने आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, पर्यावरण संरक्षण एक राष्ट्रीय प्रयास बन के उभरा है, जो विज्ञान और लोगों द्वारा समर्थित, और स्पष्ट जलवायु संरक्षण के लक्ष्यों के साथ एकीकृत है। यह दृष्टिकोण प्रकृति की सुरक्षा के लिए सदैव भारत के प्रयासों का मार्गदर्शन करता रहेगा।