पिछले एक दशक से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने कृषि को विकसित भारत के अपने विजन के केंद्र में रखा है। आपस में जुड़ी हुई योजनाओं, अत्याधुनिक अनुसंधान और तकनीक आधारित पहलों के माध्यम से सरकार ने किसानों को सशक्त बनाया है, पैदावार बढ़ाई है और सतत आजीविका को बढ़ावा दिया है।
इन प्रयासों में फसल नवाचार, डेयरी विकास, कृषि यंत्रीकरण और कृषि उद्यमिता जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जो ग्रामीण भारत को बदल रहे हैं और किसानों के लिए अधिक आय, जलवायु अनुकूलन और बाज़ार तक पहुंच जैसे दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित कर रहे हैं।
यह लेख 2014 से शुरू हुई उन पहलों को उजागर करता है, जो कृषि क्षेत्र में समग्र विकास और समृद्धि का एक मजबूत ढांचा तैयार कर रही हैं।
इस बदलाव की एक मजबूत नींव है नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर मखाना (NRCM), जिसने इस पोषक तत्वों से भरपूर फसल की खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाया है।
उच्च उपज देने वाले मखाना बीजों के विकास, पानी की बचत करने वाली खेती प्रणाली और मखाना-सह-मत्स्य पालन मॉडल के जरिए NRCM ने मखाना की खेती को 2012 के 13,000 हेक्टेयर से बढ़ाकर 2023 में 35,000 हेक्टेयर तक पहुंचा दिया है, जो 169% की बढ़ोतरी है।
अब तक 15,824 किलोग्राम से अधिक उच्च उपज वाले बीज किसानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और नाबार्ड जैसी संस्थाओं को वितरित किए गए हैं, जिससे उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले पांच वर्षों में कुल ₹340 लाख का निवेश किया गया है, जिसमें केवल 2023-24 में ₹265 लाख शामिल हैं। NRCM ने 3,000 से अधिक किसानों को उन्नत खेती, प्रसंस्करण और विपणन तकनीकों में प्रशिक्षण भी दिया है।
किसानों के लिए इसका मतलब है—अधिक उत्पादन, कम पानी की खपत और वैल्यू एडेड बाजारों तक सीधी पहुंच, जिससे उनकी आय स्थिर और जीवनशैली टिकाऊ बन सके।
मखाना बोर्ड की स्थापना इस दिशा में एक और बड़ा कदम है, जो न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन को बढ़ावा देगा।
फसल नवाचार( इनोवेशन) पर यह फोकस भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (NARS) तक फैला हुआ है। 2014 से 2024 के बीच, NARS ने 2,900 उन्नत फसल किस्में विकसित कीं, जिनमें 1,380 अनाज, 412 तिलहन, 437 दालें और 819 बागवानी फसलें शामिल हैं।
इनमें से 2,661 किस्में जैविक और अजैविक तनावों के प्रति सहनशील हैं, जबकि 537 किस्में अत्यधिक जलवायु परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से विकसित की गई हैं, जिनमें प्रिसिशन फेनोटाइपिंग तकनीक का उपयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त, 152 बायोफोर्टिफाइड किस्में—जैसे चावल, गेहूं और मोटे अनाज—पोषण सुरक्षा को मजबूती देती हैं।
इन उच्च उपज वाली, जलवायु-अनुकूल किस्मों को नेशनल फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन मिशन के अंतर्गत चलाए जा रहे 'सीड विलेज प्रोग्राम' के माध्यम से किसानों को रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जा रहा है—अनाज के लिए 50% और तिलहन के लिए 60% सब्सिडी पर।
इसके साथ-साथ, ₹10,103 करोड़ के बजट वाली 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयलसीड्स (NMEO-OS)' घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा दे रही है, जिसमें बीज हब, भंडारण इकाइयाँ और किसानों को प्रशिक्षण देने जैसे कदम शामिल हैं।
इन प्रयासों से किसानों की लागत कम होती है, उपज बढ़ती है और जलवायु जोखिमों से सुरक्षा मिलती है, जबकि बायोफोर्टिफाइड फसलें प्रीमियम बाजारों का रास्ता खोलती हैं, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक और पोषण से जुड़े लाभ सुनिश्चित होते हैं।
डेयरी और पशुपालन क्षेत्र इस समग्र दृष्टिकोण के अहम हिस्से हैं। 2021 से 2026 के लिए 2,790 करोड़ के बजट के साथ संशोधित राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) दूध की खरीद, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को बेहतर बना रहा है, जिसका लक्ष्य 10,000 नई डेयरी सहकारी समितियों की स्थापना करना है।
ये योजनाएं 8.5 करोड़ किसानों को लाभ पहुंचा रही हैं और भारत की स्थिति को दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश के रूप में और भी मजबूत बना रही हैं।
किसानों के लिए इसका मतलब है—दूध की बेहतर उपज, बाजार से मजबूत जुड़ाव और सहकारी समितियों के जरिए आय के विविध स्रोत, जो उन्हें समय के साथ आर्थिक स्थिरता प्रदान करते हैं।
मशीनरीकरण इस पूरे कृषि तंत्र का एक अहम हिस्सा है। 2014-15 में शुरू किए गए सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मेकेनाइजेशन (SMAM) के अंतर्गत अब तक 19.5 लाख से अधिक मशीनें वितरित की जा चुकी हैं और 52,000 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर और फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए गए हैं, जिनमें 7,500 करोड़ से अधिक का जमा पूंजी है।
ये केंद्र किसानों को आधुनिक उपकरण सस्ते दामों पर उपलब्ध कराते हैं, जिससे मजदूरी की लागत कम होती है और काम की गुणवत्ता और गति बढ़ती है।
2023 में शुरू हुई NAMO ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को 15,000 ड्रोन दिए गए हैं, जिससे नई आजीविका के अवसर पैदा हो रहे हैं।
NRCM और NPDD जैसी योजनाओं के साथ मशीनरीकरण को जोड़कर, किसान ऐसे उपकरणों तक पहुँच पा रहे हैं जो उनकी उत्पादकता बढ़ाते हैं और शारीरिक श्रम को कम करते हैं, जिससे सटीक खेती संभव होती है और दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित होता है।
उद्यमिता इन सभी प्रयासों को जोड़ती है, जो राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत इनोवेशन और कृषि-उद्यमिता विकास कार्यक्रम के माध्यम से संचालित होती है। 2018-19 से अब तक 125 करोड़ की सहायता से 1,749 स्टार्टअप्स को समर्थन मिला है, जिनमें 448 महिला नेतृत्व वाली कंपनियां भी शामिल हैं, जिससे कृषि में नवाचार को बढ़ावा मिला है।
2023-24 में शुरू हुए 300 करोड़ के कृषि एक्सेलेरेटर फंड के अंतर्गत उन स्टार्टअप्स का विस्तार किया जा रहा है जो खेती को आधुनिक बनाने वाली तकनीकों को विकसित कर रहे हैं।
इसके साथ ही VISTAAR प्लेटफॉर्म डिजिटल संसाधनों को जोड़ता है, जो किसानों को वास्तविक समय में डेटा और बाजार की जानकारी उपलब्ध कराता है।
ये पहल किसानों को नवीनतम समाधानों को अपनाने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने और मजबूत व्यवसाय विकसित करने में सशक्त बनाती हैं।
केंद्र सरकार का बजट 2025-26 इस जुड़े हुए कृषि ढांचे को और मजबूत करता है, जैसे प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना, जो कम उत्पादकता वाले जिलों के 1.7 करोड़ किसानों को लक्षित करती है, और दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, जो जलवायु- अनिश्चितताओं बीजों पर केंद्रित है। ये योजनाएं किसानों को वित्तीय सुरक्षा, गुणवत्ता वाले इनपुट और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों तक पहुंच सुनिश्चित करती हैं, ताकि वे बाजार और जलवायु की अनिश्चितताओं से सुरक्षित रह सकें।
आगे देखते हुए, सरकार का ध्यान तकनीक और अनुसंधान पर रहेगा, जो एक विकसित भारत की दिशा में मार्गदर्शक होगा। प्रीसिशन फीनोटाइपिंग, बायोफोर्टिफाइड फसलें, और VISTAAR जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म स्मार्ट खेती को संभव बनाएंगे। अनुसंधान, मशीनरीकरण और उद्यमिता को जोड़कर ये पहल किसानों को अधिक आय, जलवायु सहनशीलता और वैश्विक बाजार तक पहुंच देंगी, जिससे 2047 तक भारतीय किसान एक स्थायी और समृद्ध भविष्य को सुरक्षित करेंगे।