यह कहानी 2015 की है। मुंबई जैसे बड़े शहर में, जहाँ लोग अपने सपनों को पूरा करने आते हैं, वहाँ एक 15 साल का कमजोर सा लड़का लिफ्ट का बटन दबा रहा था। उस उम्र में उसे स्कूल जाना चाहिए था, दोस्तों के साथ खेलना चाहिए था। उसका नाम अक्षय था। विदर्भ के खुले मैदानों में खेलने की उसकी उम्र थी, लेकिन हालात ने उसे काम करने पर मजबूर कर दिया।

उसके बड़े भाई को कैंसर हो गया था और परिवार के पास इलाज के पैसे नहीं थे। बीमारी का दर्द एक तरफ था, और पैसे की कमी की तकलीफ दूसरी तरफ। सोचिए, कोई अपने परिवार को बचाने के लिए क्या-क्या नहीं करता, जब जेब में पैसा नहीं होता।

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। भारत अब उस रास्ते पर बढ़ रहा है, जहाँ इलाज सस्ता और आसान हो — ताकि अक्षय जैसे बच्चों का बचपन न छीने, और हर परिवार को जीने की एक नई उम्मीद मिल सके।

अक्षय की तरह ही देश में लाखों लोग कैंसर के इलाज का भारी बोझ उठाते हुए कई कठिनाइयों से गुजर रहे हैं। कई जिदगियाँ टूट गईं और उम्मीदें खत्म हो गईं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक अध्ययन के मुताबिक, 2025 तक भारत में कैंसर के मरीजों की संख्या 2020 की तुलना में 13% बढ़ जाएगी। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की सच्चाई है जो दर्द और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। यह एक मुश्किल लड़ाई है, जहां जीने की कीमत अक्सर ठीक होने की उम्मीद से भी ज्यादा होती है। बीमारी का आर्थिक नुकसान भी उतना ही तकलीफदेह होता है जितना कि मन का दुख।

यह समझना बहुत जरूरी है कि निजी अस्पतालों में कैंसर का इलाज औसतन 9.3 लाख रुपये तक आता है। वहीं, कई परिवार सरकारी अस्पतालों में इलाज के खर्च को भी झेलने में मुश्किल महसूस करते हैं क्योंकि वहां का औसत खर्च लगभग 2.2 लाख रुपये होता है।

फिर भी, इन बड़ी चुनौतियों के बीच सरकार ने उम्मीद की किरण दिखाई है। सरकार सिर्फ इलाज के खर्च में मदद नहीं कर रही, बल्कि भारत में कैंसर का जल्दी पता लगाने की योजना भी बना रही है।

इसका असर साफ दिखता है — एक हालिया लैंसेट अध्ययन के अनुसार, 2018 के बाद भारत में कैंसर मरीजों को समय पर इलाज मिलने की संभावना 36% बढ़ गई है। यह सरकार की इस बात को दर्शाता है कि वह स्वास्थ्य सेवा को हर किसी के लिए आसान और सुलभ बनाने के लिए पूरी तरह से काम कर रही है।

भारत में तेजी से बढ़ रहे कैंसर के बोझ को कम करने के लिए केंद्रीय बजट 2025-26 में कई अहम कदम उठाए गए हैं, जिनका मकसद कैंसर के इलाज को सस्ता और सबके लिए सुलभ बनाना है।

सरकार ने अगले तीन वर्षों में "डे केयर कैंसर सेंटर्स" स्थापित करने की योजना बनाई है। 2025-26 में ऐसे 200 सेंटर्स चालू करने का लक्ष्य रखा गया है। इन सेंटर्स का उद्देश्य समय पर कैंसर की जांच और इलाज प्रदान करना है, जिससे खासकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को बहुत लाभ होगा, जो अब तक विशेषज्ञ इलाज तक पहुँचने में कठिनाई महसूस करते थे।

इसके साथ ही, सरकार ने 36 जीवनरक्षक कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) पूरी तरह से माफ करने का प्रस्ताव भी रखा है। इस कदम से कैंसर का इलाज मरीजों के लिए और भी ज्यादा किफायती हो सकेगा।

साथ ही, सरकार ने आम लोगों के लिए कैंसर का इलाज और सस्ता व सुलभ बनाने के लिए 6 और कैंसर दवाओं को रियायती 5% कस्टम ड्यूटी की सूची में शामिल किया है।

फार्मास्युटिकल सहायता का दायरा बढ़ाने के लिए बजट में 37 और दवाओं को कस्टम ड्यूटी से छूट देने का प्रस्ताव है, साथ ही 13 नए ‘पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम’ भी शुरू किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ज़रूरतमंद मरीजों को जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध कराना है।

ये हालिया फैसले स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक निर्णायक कदम हैं ताकि कैंसर का इलाज किसी विशेष वर्ग की सुविधा न रह जाए, बल्कि हर जरूरतमंद तक पहुंचे। ये योजनाएं इस बात का हिस्सा हैं कि वर्तमान सरकार लगातार सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।

प्रारंभिक जांच और रोकथाम की ज़रूरत को समझते हुए, सरकार ने आयुष्मान भारत–आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM) पहल के अंतर्गत कैंसर स्क्रीनिंग के प्रयासों को व्यापक रूप से बढ़ाया है। यह पहल व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा (Comprehensive Primary Healthcare) में शामिल की गई है।

फरवरी 2025 तक देशभर में 1.7 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर चालू हो चुके हैं। इन केंद्रों पर भारत में सबसे आम पाए जाने वाले तीन कैंसर — मुँह, स्तन और सर्वाइकल (गर्भाशय ग्रीवा) कैंसर — की जनसंख्या आधारित स्क्रीनिंग की जा रही है।

अब तक 17 करोड़ से ज़्यादा मुँह के कैंसर की, 8 करोड़ स्तन कैंसर की और 5 करोड़ से अधिक सर्वाइकल कैंसर की जांचें की जा चुकी हैं। 30 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को समय पर जांच मिल रही है जिससे बीमारी की समय पर पहचान और इलाज की संभावना बढ़ जाती है।

इसके अलावा सरकार ने एक कुशल स्वास्थ्यकर्मी दल तैयार करने पर भी ध्यान दिया है। देशभर में 140 करोड़ से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं — जैसे मेडिकल ऑफिसर, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर, स्टाफ नर्स, मल्टी-पर्पस वर्कर और आशा कार्यकर्ता — को ट्रेनिंग दी गई है ताकि वे स्क्रीनिंग कर सकें, जागरूकता फैला सकें, लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करें और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें आगे रेफर कर सकें।

इसके साथ ही सरकार ने तृतीयक( तीसरे स्टेज) कैंसर उपचार को बेहतर बनाने के लिए "टेर्शियरी केयर कैंसर फैसिलिटी स्कीम" को मंज़ूरी दी है। इस योजना के अंतर्गत 20 राज्य कैंसर संस्थान (State Cancer Institutes - SCIs) और 50 टेर्शियरी केयर कैंसर सेंटर (TCCCs) की स्थापना या उन्नयन किया जाना है। अब तक 19 SCIs और 20 TCCCs को मंज़ूरी दी जा चुकी है।

इसके अलावा, असम अब दक्षिण एशिया के सबसे बड़े कैंसर देखभाल नेटवर्क का केंद्र बन चुका है, जहाँ 14 कैंसर अस्पतालों की स्थापना की गई है। यह पहल देश के कोने-कोने में सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

मरीज़ों पर आर्थिक बोझ कम करने के उद्देश्य से सरकार ने 42 कैंसर रोधी दवाओं पर "ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन" लागू किया, जिससे 500 से ज्यादा ब्रांड्स की कीमतों में 90% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। इससे इलाज सस्ता और सुलभ हुआ है।

इसके साथ ही, एम्स (AIIMS), झज्जर स्थित नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट और कोलकाता के चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट के दूसरे परिसर जैसे प्रमुख संस्थानों को प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PM-SSY) के अंतर्गत मजबूत किया गया है।

इसी तरह, आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) के जरिए गरीब और ज़रूरतमंद परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जा रही है। लैंसेट के एक अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों ने PM-JAY के अंतर्गत पंजीकरण कराया, उनके समय पर इलाज शुरू होने की संभावना 90% तक बढ़ गई, जबकि गैर-पंजीकृत मरीजों के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 33% था।

ये पहलें दर्शाती हैं कि सरकार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने में हर नागरिक को बराबर मौका और मदद देने के लिए प्रतिबद्ध है।

कैंसर के इलाज को और अधिक किफायती बनाने के लिए सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) और AMRIT फार्मेसी स्टोर्स के माध्यम से अच्छी गुणवत्ता वाली जेनेरिक कैंसर की दवाएं बहुत ही कम कीमतों पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे आम लोगों को बड़ी राहत मिली है।

इसके अलावा, राष्ट्रीय आरोग्य निधि (RAN) योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले परिवारों को सरकारी अस्पतालों में कैंसर के इलाज के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।

साथ ही, कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPCDCS) के अंतर्गत कई क्लीनिक और डे-केयर सेंटर्स की स्थापना की गई है, जहाँ शुरुआती जांच और इलाज की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

इन सभी पहलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण इलाज और दवाएं उचित दाम पर मिल सकें, चाहे वह किसी भी आर्थिक पृष्ठभूमि से आता हो।

साल 2024 के केंद्रीय बजट में सरकार ने कैंसर के इलाज को और अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए कई विशेष प्रोत्साहन (Incentives) की घोषणा की। इनमें तीन जरूरी कैंसर की दवाओं को बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) से छूट दी गई — Trastuzumab Deruxtecan (ब्रेस्ट कैंसर के लिए), Osimertinib (फेफड़ों के कैंसर के लिए), और Durvalumab (फेफड़ों और बाइल डक्ट कैंसर के लिए)। यह फैसला स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के अनुरोध पर लिया गया।

इसके अलावा, X-ray ट्यूब और फ्लैट पैनल डिटेक्टर पर कस्टम ड्यूटी में बदलाव किए गए ताकि देश में ही एडवांस मेडिकल इमेजिंग उपकरणों का उत्पादन बढ़े। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और जांच से जुड़ी सेवाएं सस्ती होंगी।

सरकार ने महंगी और जरूरी दवाओं की कीमतों पर निगरानी और नियंत्रण भी बढ़ाया है, ताकि आम लोगों को इन जीवन रक्षक दवाओं तक आसानी से और सस्ती दरों पर पहुंच मिल सके। यह सब कदम देशभर में कैंसर इलाज को और बेहतर और सुलभ बनाने की दिशा में अहम माने जा रहे हैं।

लैंसेट की एक अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन मरीजों की कैंसर की पहचान 2018 के बाद हुई, उन्हें समय पर इलाज शुरू होने की संभावना 36% ज़्यादा थी, उनकी तुलना में जिनकी पहचान 1995 से 2017 के बीच हुई थी।

साथ ही, देश के कुल स्वास्थ्य व्यय (Total Health Expenditure - THE) में भी 2014-15 से 2021-22 के बीच बड़ा बदलाव देखा गया है। इस दौरान, सरकार द्वारा किए गए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय (Gross Health Expenditure - GHE) की हिस्सेदारी 29% से बढ़कर 48% हो गई है।

वहीं, दूसरी ओर, आम लोगों द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले खर्च यानी आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) की हिस्सेदारी घटकर 62.6% से 39.4% हो गई है।

इस तरह, भारत सरकार ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने के लिए जो रास्ता चुना है, वह व्यवहारिक भी है और प्रभावशाली भी। यह नीति सस्ता इलाज, आसान पहुँच और समय पर पहचान को प्राथमिकता देती है।

इन उपायों से यह संदेश मिलता है कि गुणवत्तापूर्ण कैंसर इलाज किसी विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का हक़ होना चाहिए। सरकार ने भावनात्मक बातें करके सहानुभूति जुटाने के बजाय व्यवहारिक कदम उठाना चुना है — ताकि अक्षय जैसे किसी बच्चे को अपना बचपन छोड़कर उम्मीद की लौ जलाए रखने के लिए नौकरी न करनी पड़े।

यह बदलाव आशा का प्रतीक है — एक ऐसे भारत की ओर जहाँ हर जिंदगी की कद्र हो, और इलाज कभी किसी का सपना न बने।