2014 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर विदेश नीति में एक निर्णायक परिवर्तन करते हुए एक्ट ईस्ट नीति की घोषणा की।
यह घोषणा केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की दिशा में एक स्पष्ट संकेत थी।
यह इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि भारत को, दक्षिण-पूर्व एशिया की तेजी से बदलती राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा परिस्थितियों तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बढ़ते महत्व के साथ अधिक उद्देश्यपूर्ण ढंग से जुड़ना चाहिए।
तब से, एक्ट ईस्ट नीति एक बहुआयामी ढांचे के रूप में विकसित हो चुकी है, जो भारत के आसियान (ASEAN) सदस्य देशों के साथ रणनीतिक सहयोग, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझेदारी की गहराई, और प्रशांत महसागरीय द्वीप राष्ट्रों तक भारत की पहुंच को दिशा देती है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत ने खुद को आर्थिक विकास सहयोगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता, संपर्क और सामर्थ्य में एक जिम्मेदार भागीदार के रूप में स्थापित किया है।
2014 से इस नीति के लागू होने के बाद भारत और आसियान (ASEAN) देशों के संबंधों में गुणवत्ता के स्तर पर सुधार हुआ है। शीर्ष स्तर की बैठकें बार-बार और सार्थक रूप से हुई हैं। भारत ने लगातार हर साल ASEAN-India सम्मेलनों, ईस्ट एशिया सम्मेलनों और ASEAN रक्षा मंत्रियों की बैठक (ADMM+) में भाग लिया है, जो क्षेत्रीय बहुपक्षीय प्रक्रिया के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है।
2022 में, इन प्रयासों का परिणाम स्वरूप आज भारत-ASEAN संबंध "विस्तृत रणनीतिक साझेदारी" (Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर तक बढ़ चुके हैं, जो कि यह क्षेत्र में भारत की सकारात्मक विदेश नीति को मिली एक महत्वपूर्ण सफलता है।
भारत के ASEAN देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध विभिन्न क्षेत्रों में फैले हैं। वियतनाम और फिलीपींस के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग, सिंगापुर के साथ निवेश साझेदारी, मलेशिया के साथ तकनीकी सहयोग, और इंडोनेशिया के साथ डिजिटल और स्वास्थ्य कूटनीति — ये सभी इस विविधता को दर्शाते हैं।
भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना जैसे संपर्क पहल इस साझेदारी के अहम हिस्से हैं, जिनका उद्देश्य भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच आवागमन, व्यापार और कानेक्टिविटी को बेहतर बनाना है।
ASEAN, भारत का एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार है, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 11% हिस्सा रखता है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत और ASEAN के बीच द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य 121 अरब डॉलर रहा था।
ASEAN के साथ सहयोग के समानांतर, भारत ने विकसित हो रही इंडो-पैसिफिक कूटनीति को आकार देने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 में इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) की घोषणा के जरिए एक मुक्त, समावेशी, नियम-आधारित और सभी के लिए उन्मुक्त समुद्री क्षेत्र के प्रति भारत के विजन को स्पष्ट किया।
IPOI का फोकस पारंपरिक सैन्य या राजनीतिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर सहयोग के नए क्षेत्रों जैसे समुद्री सुरक्षा, समुद्री परिवेश की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, और संसाधनों के सस्टैनबल उपयोग आदि पर है।
ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे कई प्रमुख देशों ने भारत के साथ, इस पहल के विभिन्न स्तरों को लागू करने के लिए हाथ मिलाया है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की भागीदारी क्वाड (Quadrilateral Security Dialogue - Quad) में, जो अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ है, को ठोस गति मिली है। इसे 2017 में पुनर्जीवित किया गया और 2021 में इसे राष्ट्र-प्रमुखों के स्तर की बैठक के रूप में ऊँचा दर्जा मिला।
अब क्वाड केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महत्वपूर्ण तकनीकों, बुनियादी ढांचे, वैक्सीन वितरण और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में भी संयुक्त प्रयास कर रहा है।
भारत की समान सोच वाले देशों के साथ क्वाड सम्मेलनों में भागीदारी यह दिखाती है कि भारत एक बहुध्रुवीय और सहयोगात्मक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में विश्वास करता है — ऐसा क्षेत्र जो किसी एक देश या शक्ति समूह के प्रभुत्व में न हो, जहाँ किसी एक देश को कार्यनीति तय करने का एकाधिकार न रहे।
ऑस्ट्रेलिया (MLSA), जापान (JIDIP) और अमेरिका (LEMOA, COMCOSA, ISA) के साथ भारत के रक्षा सहयोग समझौते, जो लॉजिस्टिक्स सहायता और सूचना आदान-प्रदान से जुड़े हैं, बढ़ते रणनीतिक विश्वास और एक ऐसी इंडो-पैसिफिक सुरक्षा संरचना के विकास को दर्शाते हैं जो पहले कभी नहीं बन पाई थी।
भारत ने मल्टी-नेशनल नौसेना अभ्यास जैसे मालाबार और इंडो-पैसिफिक जलक्षेत्र में समन्वित गश्त (coordinated patrols) में भी भाग लिया है।
ये साझेदारियाँ इस बात को मज़बूत करती हैं कि भारत रणनीतिक स्वायत्तता में विश्वास रखता है, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सामूहिक जिम्मेदारी भी निभाता है।
इसे 'कंटेनमेंट' (रोकथाम) के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक संदेश के रूप में समझा जाना चाहिए कि भारत किसी भी दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा। भारत यह सुनिश्चित करेगा कि उसके हितों का सम्मान हो और उसके निर्णय पूरी तरह संप्रभु रहें।
‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत भारत का संपर्क दक्षिण-पूर्व एशिया से आगे बढ़कर अब प्रशांत महसागरीय द्वीप देशों तक पहुंच गया है — जो अक्सर वैश्विक कूटनीति में नजरअंदाज किए जाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में 2014 में FIPIC (Forum for India–Pacific Islands Cooperation) की शुरुआत हुई, ताकि फिजी, पापुआ न्यू गिनी, समोआ और टोंगा जैसे देशों के साथ भारत के रिश्ते मजबूत और नियमित हो सकें।
भारत ने इस क्षेत्र में विकास के लिए सौर ऊर्जा से बिजली पहुंचाना, चिकित्सा सहायता देना, इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए अनुदान और मानव संसाधन विकास जैसे कई सहयोग किए हैं।
यह विजन परस्पर सम्मान पर आधारित रहा है, और भारत का सहयोग हमेशा ज़रूरतों के अनुसार और समय अनुकूल माना गया है। इसी को मान्यता देते हुए, वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री मोदी को पापुआ न्यू गिनी द्वारा वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान "कम्पैनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू" और फिजी द्वारा "कम्पैनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी" से सम्मानित किया गया — यह दर्शाता है कि आज भारत को प्रशांत महसागरीय द्वीप देशों के बीच कितनी अच्छी छवि और सद्भावना प्राप्त है। ये संपर्क भारत की समावेशी इंडो-पैसिफिक नीति को फिर से मजबूत करते हैं, जिसमें छोटे द्वीपीय देशों को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है जितनी बड़े क्षेत्रीय देशों को।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में मानवीय सहायता और आपदा राहत के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है। मिशन सागर (भारत की कोविड राहत सहायता), समुद्र मैत्री (2018 में इंडोनेशिया में भूकंप और सुनामी प्रभावित क्षेत्रों में भारत की सहायता), और वैक्सीन मैत्री जैसी कार्रवाइयों ने यह साबित किया है कि भारत समय पर और प्रभावी सहायता देने में सक्षम है।
इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF) (2022 में) और इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) जैसी पहलों में भारत की भागीदारी यह दिखाती है कि एक्ट ईस्ट पॉलिसी में आर्थिक सहयोग और साझेदारी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इन मंचों के ज़रिए भारत ने व्यापार में आसानी, मजबूत सप्लाई चेन, और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर साझेदार देशों के साथ मिलकर काम किया है।
इन प्रयासों के ज़रिए भारत ने न केवल क्षेत्रीय उपस्थिति को मजबूत किया है, बल्कि उन मुद्दों पर चर्चा को भी दिशा दी है जो आर्थिक विकास और सतत विकास से सीधे जुड़े हैं। इसके साथ ही जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय सहयोग तंत्र ने भारत के क्षेत्रीय प्रयासों को और मजबूती दी है।
इस निरंतर कूटनीति के पीछे एक ऐसा दृष्टिकोण है जो भारत के उदय को क्षेत्रीय समृद्धि और स्थिरता से जोड़ने की कोशिश करता है। प्रधानमंत्री मोदी का "सागर"(SAGAR) यानी "क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास" (2015 में शुरू किया गया) पर ज़ोर देना, भारत की समुद्री और रणनीतिक नीति का एक मार्गदर्शक सिद्धांत है।
SAGAR के माध्यम से भारत ने लगातार साझा जिम्मेदारी, खुले समुद्री मार्गों और शांतिपूर्ण तरीके से विवादों के समाधान के महत्व को उजागर किया है।
"लुक ईस्ट" से "एक्ट ईस्ट" की नीति में परिवर्तन ने भारत की वैश्विक स्थिति को ऊँचा किया है और पूरे क्षेत्र को आर्थिक, रणनीतिक और विकास से जुड़ी नई संभावनाएँ दी हैं — खासकर तब जब भारत के आर्थिक कॉरिडोर पश्चिम में बाज़ारों के विस्तार और पूर्व में ऊर्जा आयात के लिए एक पूर्व-पश्चिम परिवहन मार्ग प्रदान करते हैं।
पिछले ग्यारह वर्षों में, भारत की एक्ट ईस्ट नीति ने एक स्थिर और बहुध्रुवीय इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की नींव रखी है।
यह नीति अब एक स्थिरता के उपकरण के रूप में विकसित हो चुकी है, जिसने यह दिखाया है कि आपसी सम्मान, पारस्परिक हित और दृढ़ संकल्प पर आधारित जुड़ाव क्षेत्रीय परिस्थितियों को बदल सकता है।
आज, भूराजनैतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत एक इंडो-पैसिफिक शक्ति के रूप में उभरा है, जो एक्ट ईस्ट नीति के एक दशक के अनुभव से आकार ले चुका है — और जो दूसरों की तरह प्रभुत्व नहीं चाहता, बल्कि नियमों पर आधारित व्यवस्था की रक्षा और क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान में विश्वास पैदा करता है।
एक्ट ईस्ट नीति ने भारत की साझेदारी को ASEAN देशों के साथ गहरा किया है, भारत को एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित किया है, समान सोच वाली लोकतांत्रिक देशों के साथ सहयोग को मज़बूत किया है, और छोटे द्वीपीय देशों की चिंताओं को वैश्विक मंच पर आवाज़ दी है।