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बदले से सरकार नज़र आते हैं, ये सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रचलित एक ऐसा वाक्य है जिसे ऊंचाई पर पहुंचे हर शख्स के लिए इस्तेमाल किया जाता है. फ़िल्मों में हो या फ़िर राजनीति में या किसी भी क्षेत्र में सफलता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद लोग बदल ही जाते हैं. लेकिन अपवाद हर जगह पर होते हैं. जो पीएम मोदी को जानते हैं वो इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. उनके लिए जरा भी नहीं बदले हैं पीएम मोदी. उनके जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने के साथ साथ मुझे बस इतना ही कहना है 1997 में पहली बार उनसे मिलने पर जैसा पाया था, आज 25 साल बाद भी आमना सामना हो जाए तो बस वही मुस्कुराहट और आत्मीयता ही पाता हूं.

कार्यकर्ताओं और आम लोगों से जुड़ाव

पीएम मोदी का यही अंदाज निराला है. जब बीजेपी मुख्यालय के एक छोटे कमरे में रहते थे तब भी ये एहसास नहीं होने देते थे कि वो इतनी बड़ी पार्टी के महासचिव हैं. शाम की चाय पर चर्चा बस इसी बात पर होती की देश के हित मे क्या है. किसी को गलत लिखने के लिए झिड़की भी मिलती थी तो काम की तारीफ भी किया करते थे. लेकिन शाम की उस चाय का जायका कुछ और ही हुआ करता था.

बीजेपी की साल में तीन बार होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मंच सजा होता था. अटल, अडवाणी, जसवंत, वेंकैया नायडू सरीखे नेता बैठे होते थे. फिर राजनाथ सिंह अध्यक्ष बने तो मंच पर अरुण जेटली, सुषमा स्वराज भी आ गए. लेकिन हर कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषदों की शान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही हुआ करते थे. मंच से दूर, आखिरी कतार में आ कर बैठ जाने वाले CM मोदी को भला कौन नजरअंदाज कर सकता था. सबसे पीछे धूनी रमाते, कार्यकर्ताओं से घुल मिल कर उनका हाल जानने की कोशिश करते, वहीं डेरा डाल बैठे हम पत्रकारों की चुटकी लेते की छुट्टी लो और गुजरात घूमने आओ. संदेश यही की बहुत उनके ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग कर ली अब गुजरात आओ और देखो की कितनी तरक्की हो रही है.

पार्टी के कार्यकर्ताओं से ये जुडाव इतना गहरा गया कि आज भी बीजेपी का आम कार्यकर्ता पीएम मोदी के लिए कुछ भी करने को तैयार है. सब किसी ना किसी हॉटलाइन से नरेंद्र मोदी से जुड़े होते थे और दूर दराज के इलाकों से सही फीडबैक भी उन्हें मिलता रहता है. सत्ता के शीर्ष पर हैं, लेकिन जमीनी राजनीति की हकीकत जानने के लिए उन्हें पुरी तरह सरकारी तंत्र पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. देश के हर कोने मे लाखो ऐसे कार्यकर्ता होंगे जिन्होंने पीएम मोदी के साथ सेल्फi ली है और गर्व से अपना डीपी बनाया हुआ होगा. चलो सुरक्षा और प्रोटोकोल के कारण अब पहले जैसा घुलना मिलना सम्भव नहीं हो पाता होगा लेकिन सुरक्षा घेरे से बाहर निकल लोगों के बीच घुस जाने की कला में पीएम मोदी माहिर है. और यही उन्हें लोगों के दिलों के और करीब लाता है.

मानवीय संवेदना से भरे पीएम मोदी

बतौर मुख्यमंत्री जब भी मोदी किसी जिले के प्रवास पर होते थे तो देर रात भी शहर घूमने निकल पड़ते थे और वो भी बिना सुरक्षा के. बतौर प्रचारक हर इलाके के साथ उनकी सुहानी यादे जुडी थीं और उन्हें फिर से मुड कर देखना उन्हें खासा भाता था. एक बड़ी भावुक बात गुजरात में उनकी सुरक्षा से जुड़े अधिकारी ने बतायी थी. उनकी सुरक्षा में जो जवान उनके लिए शैडो कवर का काम करते थे उन्हें नम्बर के मुताबिक वन, टू, थ्री, फोर पुकारा जाता था. ये वो सुरक्षा में लगे जवान थे जो हर हमले को पहले अपने ऊपर लेते. एक बार उस अधिकारी ने मोदी को कहा कि इनका काम बहुत खतरे वाला है इस लिए अगर आप इन्हें नाम से बुलाएंगे तो और आत्मीयता झलकेगी. इस बात को हुए चंद हफ्ते ही हुए थे कि एक घटना ने मुख्यमंत्री मोदी के साथ चल रहे उस सुरक्षा अधिकारी को भी भावुक कर दिया. उसने देखा कि मोदी अपने सुरक्षा घेरे में लगे हर जवान को नाम से बुला रहे हैं और उसके परिवार का हाल पूछ रहे हैं. शायद अपने जवानों के बारे में इतनी जानकारी उस अधिकारी के पास भी नहीं थी. जाहिर है उसकी बात को मोदी ने आत्मसात कर लिया था. इस पुरानी याद का मैंने इस लिए जिक्र किया क्योंकि ये साबित करता है पीएम मोदी कितने संवेदनशील हैं.

मानवीय संवेदना की झलक पूरा देश भी उनके पीएम के कार्यकाल के दौरान देख ही रहा है. देश में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आए या फिर कोई दुर्घटना, पीएम मोदी कितने भी व्यस्त रहें वो सबसे पहले संदेश देने वाले होते है या फिर उस इलाके के लिए रवाना हो जाते हैं. हमने देखा है 90 ke दशक में कच्छ में आए तूफान, फिर गुजरात में भूकंप और देश भर मे आयी प्राकृतिक आपदाओं में पीएम मोदी ऐसे जुड़े कि हर जगह लोगों के घाव पर मरहम लगाते और उनका दर्द बांटते नजर आए. खिलाडियों ने देश का नाम रौशन किया तो पीएम सबसे पहले उनकी हौसलाअफजाई करते नजर आए.

वीआईपी संस्कृति नहीं भाती

पीएम बनते ही नरेंद्र मोदी ने लाल बत्ती की संस्कृति को बंद किया. अब लाल बत्ती कहीं ट्राफिक नहीं रोकती. पीएम मोदी खुद भी आम आदमी की तरह दिल्ली के ट्राफिक से गुज़रते हैं तो लोगों को अचरज भी होता है और खुशी भी. चाहे मंदिर जाना हो या गुरुद्वारे या फिर टीकाकरण के लिए एम्स उन्होंने आम लोगों की तरह ही सफर तय किया. सूत्र बताते हैं कि एक रक्षाबंधन के दिन पीएम को बीजेपी मुख्यालय जाना था. त्योहार का दिन था और लोगों को परेशानी नहीं हो इस लिए मोदी ने कह दिया कि वो ट्राफिक को बिना रोके अपनी कार में जाएंगे और उनकी टीम को उस मुताबिक ही मूवमेंट करनी पड़ी.

पीएम मोदी को बस एक ही धुन सवार है कि देश को बदलना है और इसके लिए जनभागीदारी भी उनकी मुख्य थीम होती है. उनके 71वे जन्मदिन पर ये सभी पुरानी यादें सिर्फ तारीफों के पुल बांधने के लिए नहीं हैं बल्कि ये बताने के लिए हैं कि CM के PM हैं यानि आम आदमी के पीएम. जिनकी लोकप्रियता का राज़ उन्की राजनीति में नहीं बल्कि उनकी शख्सियत में छुपा है.

जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं

Author Name : Amitabh Sinha

Disclaimer:

This article was first published in News 18.

It is part of an endeavour to collect stories which narrate or recount people’s anecdotes/opinion/analysis on Prime Minister Shri Narendra Modi & his impact on lives of people.

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जनसंघ और उसके बाद बनी भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे लक्ष्मीनारायण गुप्ता 'नन्ना' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली से अत्यधिक प्रभावित हैं। नन्ना ने बताया कि वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा कश्मीर में दो निशान, दो विधान के खिलाफ शुरू किए गए आंदोलन में शामिल होकर जेल गए थे। आज कश्मीर से धारा-370 और 35-ए हटाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित करोड़ों देशवासियों का जो सपना पूरा किया है। उससे वह मोदी से बेहद प्रभावित हैं और उनकी लंबी आयु के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। हरिभूमि के साथ इंटरव्यू में नन्ना ने विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।

सवाल : मोदी की कार्यशैली से आप कितने प्रभावित हैं, उनके योगदान को किस रूप में देखते हैं।

जवाब : मैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली से बहुत प्रभावित हूं। मैंने जिस कश्मीर में दो निशान, दो विधान का विरोध करते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन में सहभागिता की और जेल गया। आज वर्षो बाद कश्मीर में धारा-370 और 35-ए हटने के बाद वह सपना पूरा हुआ। मेरे साथ करोड़ों भारतीयों का सपना पूरा हुआ। मोदी की कार्यशैली सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास है, जो देशवासियों को बिना भेदभाव के साथ एकजुटता और समानता का संदेश देती है। उनके नेतृत्व में देश का सम्मान दुनियाभर में बढ़ा है, आज भारत मजबूत राष्ट्रों में गिना जाता है।

सवाल : आप जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे, आपके सामने भाजपा का गठन हुआ, उस दौरान पार्टी के लिए क्या चुनौतियां थीं।

जवाब : उस दौरान पार्टी के पास संसाधनों का बेहद अभाव था। तब हम साइकिल से गांव-गांव जाकर लोगों के बीच भाजपा का प्रचार करते थे। ग्रामीणों के बीच पहुंचकर मीटिंग करके उन्हें पार्टी की नीतियों के बारे में समझाते थे। पैसों का अभाव था तो वकालत करने से जो राशि प्राप्त हो जाती थी, उसी में से खर्च चलाते थे। तब गांवों में जाकर कैंप लगाकर फॉर्म भरवाए। पार्टी से हजारों कार्यकर्ताओं को जोड़ा, जिससे पार्टी मजबूत हुई।

सवाल: उस समय की भाजपा और आज की भाजपा में संगठन स्तर पर क्या परिवर्तन देखते हैं।

जवाब : उस दौरान कार्यकर्ताओं ने साधनों के अभाव के बीच पार्टी के लिए पूरी मेहनत व निष्ठा के साथ काम किया। आज भी कर रहे हैं, लेकिन आज संसाधन बेहतर है। उस वक्त की गई मेहनत से जो प्लेटफॉर्म तैयार हुआ, उससे संगठन शक्ति बढ़ती गई और आज संगठन का स्वरूप देश में सबसे मजबूत है।

सवाल : आज भाजपा में दूसरे दलों से बाहरी नेता बड़ी संख्या में आ रहे हैं, उन्हें सत्ता व संगठन में महत्वपूर्ण पद मिल रहे हैं। इससे भाजपा के पुराने नेता अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, आप क्या मानते हैं।

जवाब : मैं ऐसा नहीं मानता हूं, भाजपा परिवार की राष्ट्रवादी विचारधारा से अगर लोग जुड़ रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से नए लोगों को स्थान दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि पुराने कार्यकर्ता की उपेक्षा हो रही है। पुराने लोगों को अब पद की जरूरत नहीं हैं। वे संरक्षक के रूप में नई भूमिका को स्वीकार कर रहे हैं।

 

 

Author Name: HariBhoomi News - Bhopal

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This article was first published in HariBhoomi News - Bhopal.

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