Shri Modi's speech at Dharma Meemamsa Parishad at Sivagiri Mutt, Kerala

Published By : Admin | April 24, 2013 | 16:53 IST
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ब्रह्म श्री प्रकाशानंदा स्वामीगल, श्रीमद ऋतंभरा नंदा स्वामीगल, श्री नारायण धर्मा संगम सन्यासिन्स, श्री मुरलीधरन, सहोदरी, सहोदर नवारे, नमस्काम्..! श्रीमान मुरलीधरन की मदद से मैं अपने दिल की बात आप सब तक पहुंचा पाऊंगा। मैं देख रहा हूँ कि यहाँ जो व्यवस्था बनी है वो व्यवस्था कम पड़ गई है और बहुत बड़ी मात्रा में लोग दूर-दूर बाहर खड़े हैं..! भाइयो-बहनों, इस शामियाने में जगह शायद कम होगी, लेकिन आप भरोसा रखिए कि मेरे दिल में आप लोगों के लिए बहुत जगह है..!

मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि बचपन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधि से जुड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधि में एक महत्वपूर्ण संस्कार कार्यक्रम होता है, प्रात:स्मरण काल। और जब हमें प्रात: स्मरण सिखाया गया था उसी समय से प्रतिदिन सुबह परम पूज्य ब्रह्मलीन नारायण गुरू स्वामी का स्मरण करने का सौभाग्य मिलता था। आज देश कि जिन समस्याओं की ओर हम देख रहे हैं, उन समस्याओं की ओर नजर करें और श्री नारायण गुरू स्वामी कि शिक्षा पर नजर करें, तो हमें ध्यान में आता है कि अगर ये देश श्री नारायण गुरू स्वामी की शिक्षा-दीक्षा पर चला होता तो आज हमारे देश का ये हाल ना हुआ होता..! श्री नारायण गुरू स्वामी ने समाजिक जीवन की शक्ति बढ़ाने के मूलभूत तत्वों पर सबसे अधिक बल दिया था। आज समाज में किसी ना किसी स्वरूप में अस्पृश्यता आज भी नजर आती है। हमारे संतों के प्रयत्नों के द्वारा समाज जीवन की छूआछूत कम होती गई, लेकिन राजनीतिक जीवन में छूआछूत और भी बढ़ती चली जा रही है..! यह देश स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती मना रहा है और हम जब स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयंती मना रहे हैं तब, इस बात का भी संयोग है कि श्री नारायण गुरू स्वामी के जीवन में भी इस कार्य को आगे बढ़ाने में स्वामी विवेकानंद जी का सीधा-सीधा संबंध आया था। हम पूरे आजादी के आंदोलन की ओर नजर करें तो हमारे ध्यान में आएगा कि अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध, उन्नीसवीं शताब्दी और बीसवीं शताब्दी में भारत की आजादी के आंदोलन की पिठीका तैयार करने में सबसे बड़ा योगदान किसी ने दिया है तो हमारे संतों ने दिया है, महापुरूषों ने दिया है, सन्यासियों ने दिया है, जिनके पुरुषार्थ के कारण एक समाज जागरण का काम, सामाजिक चेतना का काम, सामाजिक एकता का काम निरंन्तर चलता रहा और उसी का परिणाम हुआ कि देश की आजादी के आंदोलन के लिए एक मजबूत पीठिका का निर्माण हुआ। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज ये मान कर चलते थे कि अब हिन्दुस्तान को हजारों सालों तक गुलाम बनाए रखा जा सकता है, अब हिन्दुस्तान खड़ा नहीं हो सकता है। लेकिन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद पूरी तीन शताब्दी की ओर देखा जाए तो इस देश में इन महापुरूषों की एक श्रुंखला रही है और उस श्रुंखला के कारण निरंतर हिन्दुस्तान का कोई एक राज्य ऐसा नहीं होगा, हिन्दुस्तान का कोई समाज ऐसा नहीं होगा, हिन्दुस्तान का कोई क्षेत्र ऐसा नही होगा कि जहाँ पर पिछली तीन शताब्दी के अंदर कोई ना कोई ऐसे महापुरूष का जन्म ना हुआ हो जिस महापुरूष ने समाजिक संस्कारों के लिए, समाज सुधार के लिए सोशल रिफार्मर के नाते काम ना किया हो और समाज को जोड़ने का काम ना किया हो, ऐसा पिछली तीन शताब्दी में किसी भूभाग में नहीं मिलेगा..! चाहे स्वामी राम दास हो, चाहे स्वामी विवेकानंद हो, चाहे स्वामी दयानंद से लेकर के स्वामी श्रद्घानंद तक की परंपरा हो, चाहे बस्वेश्वर हो, चाहे चेतन्य महाप्रभु हो, चाहे गुजरात के नरसिंह मेहता हो, इस देश के अंदर ऐसी एक परंपरा रही और केरल में भी पूज्य नारायण स्वामी जी का हो या अयंकाली जी का हो, इन सबकी परंपरा के कारण हिन्दुस्तान के अंदर इस चेतना को जागृत रखने में सफलता मिली थी। इन महापुरुषों ने त्याग और तपश्चर्या के द्वारा देश में जागरण का काम किया, देशभक्ति जगाने का काम किया, हमारी संस्कृति, हमारे धर्म और हमारी परंपरा को जगाने का काम किया और उसके कारण भारत के आजादी के आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ी पीठीका तैयार हुई..!

लोगों को लगता है कि दुनिया की अनेक परंपराएं, अनेक संस्कृतियां, समाज जीवन की अनेक परंपराएं धवस्त हो गई, इतिहास के किनारे जा कर के उन्होंने अपनी जगह ले ली और आज उनका कहीं नामोनिशान नहीं रहा..! लोग पूछते हैं कि क्या कारण रहा कि हजारों साल के बाद भी ये समाज, ये संस्कृति, इस देश की परंपरा मिटती नहीं है, पूरे विश्व के अंदर ये सवाल उठाया जाता है..! समाज जीवन में अगर हम बारीकी से देंखें कि हजारों साल हुए, हमारी हस्ती मिटती क्यों नहीं है..? क्या हजारों साल में हमारे अंदर बुराइयाँ नहीं आई हैं? आई हैं..! हमारे में विकृतियाँ नहीं आई हैं? आई हैं..! हमारे समाज में बिखराव नहीं आया है? आया है..! अनेक बुराइयाँ आने के बावजूद भी इस समाज की ताकत ये रही है कि हिन्दु समाज ने हमेशा अपने ही भीतर संतो को जन्म दिया, समाज सुधारकों को जन्म दिया, एक नई चेतना, नया स्वस्थ जगत बनाने के लिए जो-जो लोगों ने जन्म लिया उन महापुरूषों के पीछे चलने का साहस दिखाया और अपनी ही बुराइयों पर वार करने की ताकत हमारे ही समाज में से पैदा होती थी, ऐसे महापुरूष हमारे समाज में से ही पैदा होते थे और उन महारुषों की पैकी एक बहुत बड़ा नाम केरल की धरती पर जन्मे हुए परमपूज्य श्री नारायण स्वामी का है..! श्री नारायण गुरू जी ने उस कालखंड में शिक्षा को सर्वाधिक महत्व दिया और आज अगर केरल गर्व से खड़ा है और शिक्षा के क्षेत्र में पूरे देश में केरल ने जो अपना एक रूतबा जमाया है, अगर उसके मूल में हम देखें तो सौ-सवा सौ साल पहले ऐसे महापुरूषों ने शिक्षा के लिए अपना जीवन खपा दिया था और उसके कारण शिक्षा का ये मजबूत फाउंडेशन आज केरल की धरती पर नजर आता है..!

विश्व के कई समाज ऐसे हैं कि जो 20 वीं शताब्दी तक नारी को बराबर का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं थे। विश्व के प्रगतिशील माने जाने वाले देश भी, लोकतंत्र में विश्वास रखने के बावजूद भी महिला को मताधिकार देने के लिए सदियों तक तैयार नहीं थे। उस युग में भी हिन्दुस्तान में ऐसे संत महात्माओं की परंपरा पैदा हुई जिन्होंने नारी कल्याण के लिए, नारी उत्थान के लिए, नारी शिक्षा के लिए, नारी समानता के लिए अपने आप को खपा दिया था और समाज के अंदर परिवर्तन लाने का प्रयास किया था। समाज के दलित, पीडित, शोषित, उपेक्षित, वंचित ऐसे समाज की भलाई के लिए अनेक प्रकार के समाज सुधार के काम सदियों से चलते आए हैं, लेकिन जिन समाज सुधार के कामों में राजनीति जुड़ती है वहाँ पर हैट्रेड का माहौल भी जन्म लेता है। एकता सुधार करने के लिए, एक को अधिकार देने के लिए दूसरे को नीचे दिखाना, दूसरे को हेट करना, दूसरे को दूर करना, दूसरे के खिलाफ बगावत का माहौल बनाना ये परंपरा रहती है। लेकिन जब समाज सुधार के अंदर आध्यात्म जुड़ता है तब समाज सुधार भी हो, लेकिन समाज टूटे भी नहीं, नफरत की आग पैदा ना हो, जिनके कारण समाज में बुराई आई हैं उनके प्रति रोष का भाव पैदा ना हो, उनको भी जोड़ना, इनको भी जोड़ना, सबको जोड़कर के चलने का काम होता है। जब समाज सुधार के साथ आध्यात्मिक चेतना का मिलन होता है तब इस प्रकार का परिवर्तन आता है। श्री नारायण गुरू के माध्यम से समाज सुधार और आध्यात्म का ऐसा अद्भुत मिलन था कि समाज में कहीं पर भी उन्होंने नफरत को जन्म देने का अधिकार किसी को भी नहीं दिया..!

हमारे देश में उस काल खंड की ओर अगर हम नजर करें..! समाज के अंदर बुराइयों ने जब पूरी तरह समाज पर कब्जा जमाया हो, स्थापित हितों का जमावड़ा इसको बरकरार रखने के लिए भरपूर कोशिश करता हो, ऐसे समय में ऐसे संत खड़े हुए जिनके पास कुछ नहीं था, लेकिन बुराइयों के खिलाफ लड़ने का संकल्प था और वो बुराइयों के खिलाफ खड़े हुए, समाज स्वीकार करे या ना करे, वे बुराइयों के खिलाफ लड़ने से पीछे नहीं हटे और पूरी जिन्दगी समाज सुधार के लिए घिस दी। जिस समाज के अंदर ईश्वर भक्ति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हो, परमात्मा सबकुछ है ऐसा माना जाता हो, उस कालखंड में भी इस देश में ऐसे सन्यासी हुए जो कहते थे कि ईश्वर भक्ति बाद में करो, पहले दरिद्र नारायण की सेवा करो, दरिद्र नारायण ही भगवान का रूप होता है और उन गरीबों की भलाई करोगे तो ईश्वर प्राप्त हो जाएगा, ये संदेश देने की ताकत इस भूमि में थी..! समाज सुधारको ने अपने जीवन को बलि चढ़ा करके भी समाज की बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और उसको प्राप्त किया। श्री नारायण गुरू की तरफ हम नजर करें तो ध्यान में आता है कि उस समय जब अंग्रेजों का राज चलता था और गुलामी की जो मानसिकता थी, उस मानसिकता को बढ़ावा देने के लिए वो अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ाना चाहते थे और अंग्रेजी के माध्यम से इस देश को दबाने के लिए रास्ता खोजते थे, ऐसे समय में नारायण गुरू की दृष्टि देखिए... उन्होंने समाज को कहा कि अंग्रेजी सीख कर के उनको उन्हीं की भाषा में जवाब देने की ताकत पैदा करनी चाहिए, अंग्रेजों से लड़ना होगा तो अंग्रेजों को अंग्रेजी की भाषा में समझाना पड़ेगा, ये हिम्मत देने का काम नारायण गुरू ने उस समय किया था..!

21 वीं सदी हिन्दुस्तान की सदी है ऐसा कहते हैं, 21 वीं सदी ज्ञान की सदी है ऐसा भी कहते हैं और ये हमारा सौभाग्य है कि आज हिन्दुस्तान दुनिया का सबसे युवा देश है। इस देश की 65% जनसंख्या 35 साल से कम आयु की है और इसलिए ये युवा देश हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड है और ये अपने आप में एक बड़ी शक्ति है..! लेकिन जो लोग प्रगति करना चाहते हैं वो सारे देश इन दिनों एक विषय पर बड़े आग्रह से बात करते हैं। अभी-अभी अमेरिका में चुनाव समाप्त हुए, श्रीमान ओबामा ने दोबारा अपनी प्रेसिडेंटशिप को धारण किया, और दोबारा प्रेसिडेंट बनने के बाद उन्होंने जो पहला भाषण किया उस पहले भाषण में उन्होंने एक बात पर बल दिया और कहा कि लोगों को स्किल डेवलपमेंट, हुनर सिखाओ। जब तक हम व्यक्ति के हाथ में हुनर नहीं देते, जब तक उसको रोजगार की संभावनाएं नहीं देते, वो दुनिया में कुछ कर नहीं सकता..! अमेरिका जैसे समृद्घ देश की अर्थनीति के बीज में भी स्किल डेवलपमेंट की बात होती है। हिन्दुस्तान के अंदर डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस की सरकार भी स्किल डेवलपमेंट की बात करती है और मुझे गर्व से कहना है कि अभी 21 अप्रैल को भारत के प्रधानमंत्री ने स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ट कार्य करने के लिए गुजरात सरकार को विशेष रूप से सम्मानित किया। गुजरात देश में पहला राज्य है जिसने अलग स्किल यूनिवर्सिटी बनाने का निर्णय किया है और दुनिया का सबसे समृद्घ देश भी स्किल डेवलपमेंट की बात करता है, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र देश भी स्किल डेवलपमेंट की बात करता है। दुनिया भर में स्किल डेवलपमेंट की चर्चा हो रही है, लेकिन मजा देखिए, सौ साल पहले केरल की धरती पर एक नारायण गुरू का जन्म हुआ जिन्होंने सौ साल पहले स्किल डेवलपमेंट पर बल देने के लिए बातचीत नहीं, प्रयास किये थे..!

आज पूरा विश्व दो समस्याओं से झूझ रहा है..! एक, ग्लोबल वार्मिंग और दूसरा, टेररिज़म, आंतकवाद..! पूरा विश्व इन दोनों चीजों से परेशान है, लेकिन आज अगर हम हमारे पूर्वजों की बातों को ध्यान में लें, हमारे संतों की बातों को ध्यान में लें, हमारे शास्त्रों की बातों को ध्यान में लें और अगर उसके आधार पर जीवनचर्या को काम में लें तो मैं विश्वास से कहता हूँ कि ग्लोबल वार्मिंग से मानवजात को बचाई जा सकती है, टेररिज़म के रास्ते से लोगों को वापस ला कर के सदभावना और प्रेम के रास्ते पर लाया जा सकता है, ये संदेश पूज्य नारायण गुरू स्वामी ने उस जमाने में दिए थे, जब वो कहते थे एक जन, एक देश, एक देवता..! ये बात उस समय की है, और आज तो इतने बिखराव के माहौल कि चर्चा हो रही है। एक राज्य दूसरे राज्य को पानी देने को तैयार नहीं है, ऐसे माहौल में उस महापुरूष ने दूर का देखा था और कहा था कि यह देश एक, जन एक और परमात्मा एक... ये संदेश देने का काम श्री नारायण गुरू ने किया था। श्री नारायण गुरू स्वामी ने जैसे कहा था उस प्रकार से कश्मीर से कन्याकुमारी, अटक से कटक तक का पूरा हिन्दुस्तान करूणा और प्रेम से बंधा हुआ रहता, हमारे अंदर कोई बिखराव ना होता तो आज हमारे भीतर से कोई भी आंतकवाद को साथ देने का पाप ना करता, नारायण गुरू के रास्ते पर चलते तो यहाँ आंतकवाद को कभी जगह नहीं मिलती..!

एक समय था जब बड़े-बड़े भव्य मंदिरों से प्रभाव पैदा होता था, मंदिरों के निर्माण में भी एक स्पर्धा का माहौल चलता था, प्रकृति का जितना भी शोषण करके जो कुछ भी किया जा सकता था वो सब होता था। ऐेसे समय में आप दक्षिण के मंदिर देखिए, कितने विशाल मंदिर होते हैं..! ऐसे समय में नारायण गुरू ने समाज के उस प्रवास को काट कर के उल्टी दिशा में चल कर के दिखाया कि जरूरत नहीं है बड़े-बड़े विशाल मंदिरों की..! छोटे-छोटे मंदिरों की रचना करने की एक नई परंपरा शुरू की। सामान्य संसाधनों से बनने वाले मंदिरों की एक परंपरा शुरू की। ईश्वर कहीं पर भी विराजमान रहता है इस प्रकार से उन्होंने चिंता की और एक प्रकार से पर्यावरण की रक्षा के लिए, प्रकृति का कम से कम उपभोग करने का संदेश देने का काम श्री नारायण गुरू ने किया था, अगर उस परंपरा को हम जीवित रखते तो आज ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पैदा नहीं होती..!

दुनिया के कर्इ देश ऐसे हैं जो आज भी नारी के नेतृत्व को स्वीकार करने का समार्थ्य नहीं रखते हैं। पश्चिम के आधुनिक कहे जाने वाले राष्ट्र भी नारी शक्ति के सामर्थ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। लेकिन यह देश ऐसा है कि सदियों पहले अगर हमारे देश में नारी के सम्मान को चोट पहुंचे ऐसी कोई भी चीज पनपती थी, तो हमारे संत बहुत जागरूक हो जाते थे और वूमन एम्पावरमेंट के लिए अपने युग में हमेशा वो प्रयास करते रहे हैं। समाज की बुराइयों से समाज को बाहर ला करके मातृ-शक्ति के सामर्थ्य की चिंता करने का काम हमारे देश में होता रहा है और श्री नारायण गुरू ने हमेशा वुमन एम्पावरमेंट को हमेशा बल दिया, उनको शिक्षित करने की बात पर बल दिया, उनको विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाने के विचार को बल दिया, उन्होंने माताओं-बहनों को परिवार के अंदर कोई ना कोई रोजगार खड़ा करने की स्वतंत्रता पर बल दिया और समाज के विकास की यात्रा में नारी को भी भागीदार बनाने के लिए श्री नारायण गुरू ने प्रयास किए..! श्री नारायण गुरू ने प्रेम की, करूणा की, समाज की एकता की बातों के साथ-साथ सादगी का भी बहुत आग्रह रखा था, सिम्पलीसिटी का बहुत आग्रह रखा था..! मैं आज भी इस परंपरा से जुड़े हुए इन सभी महान संतों को प्रणाम करते हुए उनका अभिनंदन करना चाहता हूँ, क्योंकि नारायण गुरू ने जिस परंपरा में सादगी का आग्रह रखा था, आज भी उस सादगी को निभाने का प्रयास इस परंपरा को निभाने वाले सभी लोगों के द्वारा हो रहा है, ये अपने आप में बड़े गर्व की बात है..! ये मेरा सौभाग्य है कि इस महान परंपरा के साथ आज निकट से जुड़ने का मुझे सौभाग्य मिला है और इसलिए मैं इन सभी संतों का बहुत ही आभारी हूँ..!

यहाँ पर अभी पूज्य ऋतंभरानंद जी ने अपने भाषण में कुछ अपेक्षाएं व्यक्त की थी कि गुजरात की धरती पर भी ये संदेश कैसे पहुंचे..! ये मेरे लिए गर्व की बात होगी कि इतनी अच्छी बात, समाज के गरीब, दुखियारों की सेवा की बात मेरे गुजरात के अंदर अगर केरल की धरती से पहुंचती है तो मैं उसका स्वागत करता हूँ, सम्मान करता हूँ..! केरल का कोई जिला ऐसा नहीं होगा, कोई तालुका या ब्लॉक ऐसा नहीं होगा, जहाँ के लोग मेरे गुजरात में ना रहते हों..! आज गुजरात की प्रगति की जो चर्चा हो रही है, उस प्रगति में मेरे केरल के भाईयों के पसीने की भी महक है और इसलिए मैं आज केरल के मेरे सभी भाइयों-बहनों का आभार भी व्यक्त करना चाहूँगा, अभिनंदन भी करना चाहूँगा..! और मुझे विश्वास है कि आने वाले दिनों में केरल के मेरे भाई जो गुजरात में रहते हैं, उनको जब पता चलेगा कि यहाँ नारायण गुरू की प्रेरणा से कुछ ना कुछ गतिविधि चल रही है, तो गुजरात में रहने वाले केरल के भाइयों के लिए भी एक अच्छा स्थान बन जाएगा। मैं नारायण गुरु की इस परंपरा को निभाने वाले, इस सदविचार को घर-घर गाँव-गाँव पहुंचाने वाले, समाज के पिछड़े, दलित, पीड़ित, शोषितों का भला करने के लिए जीवन आहूत करने वाले सभी महानुभावों से प्रार्थना करूँगा कि गुजरात आपका ही है, आप जब मर्जी पड़े आइए, गुजरात की भी सेवा कीजिए..!

इस पवित्र धरती पर आने का मुझे सौभाग्य मिला, मुझे निमंत्रण मिला, मैं इसके लिए फिर एक बार आप सबका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ, सभी संतों को वंदन करता हूँ और पूज्य स्वामी नारायण गुरू के चरणों में प्रार्थना करके उनसे आशीर्वाद लेता हूँ कि ईश्वर ने मुझे जो काम दिया है, मैं गरीब, पीड़ित, शोषित, दलित, सबकी भलाई के लिए अपने जीवन में कुछ ना कुछ अच्छा करता रहूँ, ऐसे आशीर्वाद मुझे आज इस तपोभूमि से मिले..! मैं केरल के सभी भाइयों-बहनों का भी आभार व्यक्त करता हूँ कि आज मैं शाम को त्रिवेन्द्रम एयरपोर्ट पर उतरा और वहाँ से यहाँ तक आया, चारों ओर जिस प्रकार से आप लोगों ने मेरा स्वागत किया, सम्मान किया, मुझे प्रेम दिया, इसके लिए मैं केरल के सभी भाईयों-बहनों का भी बहुत हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ..! फिर एक बार सहोदरी-सहोदर हमारे, नमस्कारम्..!

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February 08, 2023
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“There is positivity and hope towards India at a global level”
“Today reforms are not carried out of compulsion but by conviction”
India under UPA was called the ‘Lost Decade’ while today people are calling the present decade as ‘India’s Decade’”
“India is the mother of democracy, constructive criticism is vital for a strong democracy and criticism is like a ‘shuddhi yagya’”
“Instead of constructive criticism, some people indulge in compulsive criticism
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“Our government has addressed the aspirations of the middle class. We have honoured them for their honesty.”
“Indian society has the capability to deal with negativity but it never accepts this negativity”

आदरणीय अध्यक्ष जी,

सबसे पहले मैं राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद करता हूं और ये मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे पहले भी कई बार राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद करने का अवसर मिला है। लेकिन इस बार मैं धन्यवाद के साथ-साथ राष्ट्रपति महोदया जी का अभिनंदन भी करना चाहता हूं। अपनी विजनरी भाषण में राष्ट्रपति जी ने हम सबका और करोड़ो देशवासियों का मार्गदर्शन किया है। गणतंत्र के मुखिया रूप में उनकी उपस्थिति ऐतिहासिक भी है और देश की कोटि-कोटि बहन-बेटियों के लिए बहुत बड़ा प्रेरणा का अवसर भी है।

आदरणीय राष्ट्रपति महोदया ने आदिवासी समाज का गौरव तो बढ़ाया ही है लेकिन आज आजादी के इतने सालों के बाद आदिवासी समाज में जो गौरव की अनुभूति हो रही है, उनका जो आत्मविश्वास बढ़ा है और इसके लिए ये सदन भी और देश भी उनका आभारी होगा। राष्ट्रपति जी के भाषण में ‘संकल्प से सिद्धि तक यात्रा का बहुत बढ़िया तरीके से एक खाका खींचा गया एक प्रकार से देश को अकाउंट भी दिया गया, इंस्पिरेशन भी दिया गया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी यहां पर सभी माननीय सदस्यों ने इस चर्चा में हिस्सा लिया, हर किसी ने अपने-अपने आंकड़े दिए, अपने-अपने तर्क दिए और अपनी रुचि, प्रवृत्ति के अनुसार सबने अपनी बातें रखी और जब इन बातों को गौर से सुनते हैं, उसे समझने का जब प्रयास करते हैं तो ये भी ध्यान में आता है कि किसकी कितनी क्षमता है, किसकी कितनी योग्यता है, किसकी कितनी समझ है और किसका क्या इरादा है। ये सारी बातें प्रकट होती ही हैं। और देश भली-भांति तरीके से उसका मूल्यांकन भी करता है। मैं चर्चा में शामिल सभी माननीय सदस्यों का ह्दय से आभार व्यक्त करता हूं। लेकिन मैं देख रहा था कल कुछ लोगों के भाषण के बाद पूरा Ecosystem, समर्थक उछल रहा था और कुछ लोग तो खुश होकर के कह रहे थे, ये हुई न बात। बड़ा शायद नींद भी अच्छी आई होगी, शायद आज उठ भी नहीं पाए होंगे। और ऐसे लोगों के लिए कहा गया है, बहुत अच्छे ढंग से कहा गया है-

ये कह-कहकर हम दिल को बहला रहे हैं,

ये कह-कहकर के हम दिल को बहला रहे हैं, वो अब चल चुके हैं,

वो अब चल चुके हैं, वो अब आ रहे हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

जब राष्ट्रपति जी का भाषण हो रहा था, कुछ लोग कन्नी भी काट गए और एक बड़े नेता महामहिम राष्ट्रपति जी का अपमान भी कर चुके हैं। जनजातीय समुदाय के प्रति नफरत भी दिखाई दी है और हमारे जनजातीय समाज के प्रति उनकी सोच क्या है। लेकिन जब इस प्रकार की बातें टीवी के सामने कही गई तो भीतर पड़ा हुआ जो नफरत का भाव था जो सच वो बाहर आकर ही रहा गया। ये खुशी है, ठीक है बाद में चिट्ठी लिखकर के बचने की कोशिश तो की गई है।

माननीय अध्यक्ष जी।

जब राष्ट्रपति जी के भाषण पर चर्चा मैं सुन रहा था, तो मुझे लगा कि बहुत सी बातों को मौन रहकर भी स्वीकार किया गया है। यानी एक प्रकार से सबके भाषण में सुनता था, तब लगा कि राष्ट्रपति जी के भाषण के प्रति किसी को एतराज नहीं है, किसी ने उसकी आलोचना नहीं की। भाषण की हर बात, अब देखिए क्या कहा है राष्ट्रपति जी ने मैं उन्हीं के शब्द को क्वोट करता हूं। राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में कहा था, जो भारत कभी अपनी अधिकांश समस्याओं के समाधान के लिए दूसरों पर निर्भर था, वही आज दुनिया की समस्याओं के समाधान का माध्यम बन रहा है। राष्ट्रपति जी ने यह भी कहा था, जिन मूल सुविधाओं के लिए देश की एक बड़ी आबादी ने दशकों तक इंतजार किया, वे इन वर्षों में उसे मिली है। बड़े-बड़े घोटालों, सरकारी योजनाओं में भ्रष्ट्राचार की जिन समस्याओं से देश मुक्ति चाहता था, वह मुक्ति अब देश को मिल रही है। पॉलिसी-पैरालिसिस की चर्चा से बाहर आकर आज देश और देश की पहचान, तेज विकास और दूरगामी दृष्टि से लिए गए फैसलों के लिए हो रही है। ये पैराग्राफ जो मैं पढ़ रहा हूं वो राष्ट्रपति जी भाषण के पैराग्राफ को मैं क्वोट कर रहा हूं। और मुझे आशंका था कि ऐसी-ऐसी बातों पर यहां जरूर एतराज करने वाले तो कुछ लोग निकलेंगे, वो विरोध करेंगे कि ऐसा कैसे बोल सकते हैं राष्ट्रपति जी। लेकिन मुझे खुशी है किसी ने विरोध नहीं किया सबने स्वीकार किया, सबने स्वीकार किया। और माननीय अध्यक्ष जी मैं 140 करोड़ देशवासियों का आभारी हूं कि सबके प्रयास के परिणाम आज इन सारी बातों को पूरे सदन में स्वीकृति मिली है। इससे बड़ा गौरव का विषय क्या होगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी। सदन में हंसी-मजाक, टीका-टिप्पणी, नोक-झोंक ये तो होता रहता है। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि आज राष्ट्र के रूप में गौरवपूर्ण अवसर हमारे सामने खड़े हैं, गौरव के क्षण हम जी रहे हैं। राष्ट्रपति जी के पूरे भाषण में जो बातें हैं वो 140 करोड़ देशवासियों के सेलिब्रेशन का अवसर है, देश ने सेलिब्रेट किया है।

माननीय अध्यक्ष जी। 100 साल में आई हुई ये भयंकर बीमारी, महामारी दूसरी तरफ युद्ध की स्थिति, बंटा हुआ विश्व इस स्थिति में भी, इस संकट के माहौल में भी देश को जिस प्रकार से संभाला गया है, देश जिस प्रकार से संभला है इससे पूरा देश आत्मविश्वास से भर रहा है, गौरव से भर रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी। चुनौतियों के बिना जीवन नहीं होता है, चुनौतियां तो आती हैं। लेकिन चुनौतियों से ज्यादा सामर्थ्यवान है 140 करोड़ देशवासियों का जज्बा। 140 करोड़ देशवासियों का सामर्थ्य चुनौतियों से भी ज्यादा मजबूत है, बड़ा है और सामर्थ्य से भरा हुआ है। इतनी बड़ी भयंकर महामारी, बंटा हुआ विश्व युद्ध के कारण हो रहे विनाश, अनेकों देशों में अस्थिरता का माहौल है। कई देशों में भीषण महंगाई है, बेरोजगारी, खाने-पीने का संकट और हमारे अड़ोस-पड़ोस में भी जिस प्रकार से हालत बनी हुई है, ऐसी स्थिति में माननीय अध्यक्ष जी कौन हिन्दुस्तानी इस बात पर गर्व नहीं करेगा कि ऐसे समय में भी देश दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना है। आज पूरे विश्व में भारत को लेकर के पॉजिटिविटी है, एक आशा है, भरोसा है। और माननीय अध्यक्ष जी ये भी खुशी की बात है कि आज भारत को विश्व के समृद्ध देश ऐसे जी-20 समूह की अध्यक्षता का अवसर भी मिला है।

ये देश के लिए गर्व की बात है। 140 करोड़ देशवासियों के लिए गौरव की बात है। लेकिन मुझे लगता है, पहले मुझे नहीं लगता था, लेकिन अभी लग रहा है शायद इससे भी कुछ लोगों को दुख हो रहा है। 140 करोड़ देशवासियों में किसी को दुख नहीं हो सकता है। वो आत्मनिरीक्षण करें वो कौन लोग हैं जिसको इसका भी दु:ख हो रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

आज दुनिया की हर विश्वसनीय संस्था, सारे एक्सपर्ट्स जो वैश्विक प्रभावों को बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं। जो भविष्य का अच्छे से अनुमान भी लगा सकते हैं। उन सबको आज भारत के प्रति बहुत आशा है, विश्वास है और बहुत एक मात्रा में उमंग भी है। और आखिर ये सब क्यों? ऐसे ही तो नहीं है। आज पूरी दुनिया भारत की तरफ इस प्रकार से बड़ी आशा की नजरों से क्यों देख रही है। इसके पीछे कारण है। इसका उत्तर छिपा है भारत में आई स्थिरता में, भारत की वैश्विक साख में, भारत के बढ़ते सामर्थ्य में और भारत में बन रही नई संभावनाओं में है।

माननीय अध्यक्ष जी,

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में जो बातें हो रही हैं। उसी को मैं अगर शब्दबद्ध करूं और कुछ बातें उदाहरण से समझाने की कोशिश करुं। अब आप देखिए भारत में एक दो तीन दशक अस्थिरता के रहे हैं। आज स्थिरता है, political stability है, Stable Government भी है और Decisive Government है, और उसका भरोसा स्वाभाविक होता है। एक निर्णायक सरकार, एक पूर्ण बहुमत से चलने वाली सरकार वो राष्ट्र हित में फैसले लेने का सामर्थ्य रखती है। और ये वो सरकार है Reform out of compulsion नहीं Reform out of conviction हो रही है। और हम इस मार्ग पर हटने वाले नहीं है चलते रहेंगे। देश को समय की मांग के अनुसार जो चाहिए वो देते रहेंगे।

माननीय अध्यक्ष जी,

एक और उदाहरण की तरफ मैं जाना चाहूंगा। इस कोरोना काल में मेड इन इंडिया वैक्सीन तैयार हुई। भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चलाया और इतना ही नहीं अपने करोड़ों नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन के टीके लगाए। इतना ही नहीं 150 से ज्यादा देशों को इस संकट के समय हमने जहां जरूरत थी, वहां दवाई पहुंचाई, जहां जरूरत थी, वहां वैक्सीन पहुंचाई। और आज विश्व के कई देश हैं, जो भारत के विषय में इस बात पर बड़े गौरव से विश्व के मंच पर धन्यवाद करते हैं, भारत का गौरव गान करते हैं। उसी प्रकार से तीसरे एक पहलू की तरफ ध्यान दें। इसी संकट काल में आज भारत का digital infrastructure जिस तेजी से digital infrastructure ने अपनी ताकत दिखाई है। एक आधुनिकता की तरफ बदलाव किया है। पूरा विश्व इसका अध्ययन कर रहा है। मैं पिछले दिनों जी-20 समिट में बाली में था। Digital India की चारों तरफ वाहवाही हो रही थी। और बहुत curiosity थी कि देश कैसे कर रहा है? कोरोना काल में दुनिया के बड़े-बड़े देश, समृद्ध देश अपने नागरिकों को आर्थिक मदद पहुंचाना चाहते थे। नोटें छापते थे, बांटते थे, लेकिन बांट नहीं पाते थे। ये देश है जो एक फ्रिक्शन ऑफ सेकंड में लाखों करोड़ों रुपये देशवासियों के खाते में जमा करवा देता है। हजारों करोड़ रुपये ट्रांसफर हो जाते हैं। एक समय था, छोटी-छोटी टेक्नोलॉजी के लिए देश तरसता था। आज देश में बहुत बड़ा फर्क महसूस हो रहा है। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में देश बड़ी ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। CoWin दुनिया के लोग अपने वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट भी दे नहीं पाते थे जी। आज वैक्सीन का हमारे मोबाइल फोन पर हमारा सर्टिफिकेट दूसरी सेकंड पर अवेलेबल है। ये ताकत हमनें दिखाई है।

माननीय अध्यक्ष जी,

भारत में नई संभावनाएं हैं। दुनिया को सशक्त value और supply chain उसमें आज पूरी दुनिया ने इस कोरोना कालखंड ने supply chain के मुद्दे पर दुनिया को हिला कर रख दिया है। आज भारत उस कमी को पूरा करने की ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। कईयों को ये बात समझने में बहुत देर लग जाएगी, अध्यक्ष जी। भारत आज इसी दिशा में एक manufacturing hub के रूप में उभर रहा है और दुनिया भारत की इस समृद्धि में अपनी समृद्धि देख रही है।

माननीय अध्यक्ष जी,

निराशा में डूबे हुए कुछ लोग इस देश की प्रगति को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें भारत के लोगों की उपलब्धियां नहीं दिखती है। अरे 140 करोड़ देशवासियों के पुरुषार्थों पर आस्था का परिणाम है, जिसके कारण आज दुनिया में डंका बजना शुरू हुआ है। उन्हें भारत के लोगों के पुरुषार्थ परिश्रम से प्राप्त उपलब्धियां उनको नजर नहीं आ रही है।

माननीय अध्यक्ष जी,

पिछले 9 वर्ष में भारत में 90 हजार स्टार्टअप्स और आज स्टार्टअप्स की दुनिया में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच चुके हैं। एक बहुत बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम आज देश के Tier 2, Tier 3 cities में भी पहुंच चुका है। हिन्दुस्तान के हर कोने में पहुंचा है। भारत के युवा सामर्थ्य की पहचान बनता जा रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

इतने कम समय में और कोरोना के विकट कालखंड में 108 यूनिकॉर्न बने हैं। और एक यूनिकॉर्न का मतलब होता है, उसकी वैल्यू 6-7 हजार करोड़ से ज्यादा होती है। ये इस देश के नौजवानों ने करके दिखाया है।

माननीय अध्यक्ष जी,

आज भारत दुनिया में mobile manufacturing में दुनिया में दूसरे बड़ा देश बन गया है। घरेलू विमान यात्री domestic Air Traffic पर हैं। आज विश्व में हम तीसरे नंबर पर पहुंच चुके हैं। Energy Consumption को प्रगति का एक मानदंड माना जाता है। आज भारत Energy consumption में दुनिया में consumer के रूप में तीसरे नंबर पर हम पहुंच चुके हैं। Renewable Energy की capacity में हम दुनिया में चौथे नंबर पर पहुंच चुके हैं। स्पोर्ट्स कभी हमारी कोई पूछ नहीं होती थी, कोई पूछता नहीं था। आज स्पोर्ट्स की दुनिया में हर स्तर पर भारत की खिलाड़ी अपना रुतबा दिखा रहे हैं। अपना सामर्थ्य दिखा रहे हैं।

Education समेत हर क्षेत्र में आज भारत आगे बढ़ रहा है। पहली बार माननीय अध्यक्ष जी, गर्व होगा, पहली बार higher education में enrolment वालों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा हो गई है। इतना ही नहीं, बेटियों की भी भागीदारी बराबर होती जा रही है। देश में इंजीनियरिंग हो, मेडिकल कॉलेज हो, professional colleges हों उसकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। स्पोर्ट्स के अंदर भारत का परचम ओलंपिक हो, कॉमनवेल्थ हो, हर जगह पर हमारे बेटे, हमारी बेटियों ने शानदार प्रदर्शन किया है।

माननीय अध्यक्ष जी,

किसी भी भारतीय को ऐसी अनेक बातें मैं गिना सकता हूँ। राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में कई बातें कही हैं। देश में हर स्तर पर, हर क्षेत्र में, हर सोच में, आशा ही आशा नजर आ रही है। एक विश्वास से भरा हुआ देश है। सपने और संकल्प लेकर के चलने वाला देश है। लेकिन यहाँ कुछ लोग ऐसे निराशा में डूबे हैं, काका हाथरसी ने एक बड़ी मजेदार बात कही थी। काका हाथरसी ने कहा था-

'आगा-पीछा देखकर क्यों होते गमगीन, जैसी जिसकी भावना वैसा दीखे सीन'।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आखिर ये निराशा भी ऐसी नहीं आई है, इसके पीछे एक कारण है। एक तो जनता का हुकुम, बार-बार हुकुम, लेकिन साथ-साथ इस निराशा के पीछे जो अंतर्मन में पड़ी हुई चीज़ है, जो चैन से सोने नहीं देती है, वो क्या है, पिछले 10 साल में, 2014 के पहले 2004 से 2014, भारत की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो गई। निराशा नहीं होगी तो क्या होगा? 10 साल में महंगाई डबल डिजिट रही, और इसलिए कुछ अगर अच्छा होता है तो निराशा और उभर करके आती है और जिन्होंने बेरोजगारी दूर करने के वादे किए थे।

माननीय अध्यक्ष जी,

एक बार जंगल में दो नौजवान शिकार करने के लिए गए और वो गाड़ी में अपनी बंदूक-वंदूक नीचे उतार करके थोड़ा टहलने लगे। उन्होंने सोचा कि थोड़ा अभी आगे चलना है तो थोड़ा हाथ-पैर ठीक कर लें। लेकिन गए थे तो बाघ का शिकार करने के लिए और उन्होंने देखा कि आगे जाएंगे तो बाघ मिलेगा। लेकिन हुआ ये कि वहीं पर बाघ दिखाई दिया, अभी नीचे उतरे थे। अपनी गाड़ी में बंदूक-वंदूक वहीं पड़ी थी। बाघ दिखा, अब करें क्या? तो उन्होंने licence दिखाया कि मेरे पास बंदूक का licence है। इन्होंने भी बेरोजगारी दूर करने के नाम पर कानून दिखाया कि कानून बना दिया है जी। अरे देखो, कानून बना दिया है। यही इनके तरीके हैं, पल्ला झाड़ दिया। 2004 से 2014, आजादी के इतिहास में सबसे घोटालों का दशक रहा, सबसे घोटालों का। वही 10 साल, UPA के वो 10 साल, कश्मीर से कन्याकुमारी, भारत के हर कोने में आतंकवादी हमलों का सिलसिला चलता रहा, 10 साल। हर नागरिक असुरक्षित था, चारों तरफ यही सूचना रहती थी कि कोई अंजानी चीज़ को हाथ मत लगाना। अंजानी चीज़ से दूर रहना, वहीं खबरें रहती थी। 10 साल में जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक हिंसा ही हिंसा देश उनका शिकार हो गया था। उन 10 साल में, भारत की आवाज ग्लोबल प्लैटफॉर्म पर इतनी कमजोर थी कि दुनिया सुनने तक तैयार नहीं थी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इनकी निराशा का कारण ये भी है आज जब देश की क्षमता का परिचय हो रहा है, 140 करोड़ देशवासियों का सामर्थ्य खिल रहा है, खुलकर के सामने आ रहा है। लेकिन देश का सामर्थ्य तो पहले भी था। लेकिन 2004 से लेकर के 2014 तक इन्होंने वो अवसर गंवा दिया। और UPA की पहचान बन गई हर मौके को मुसीबत में पलट दिया। जब technology information का युग बड़ी तेजी से बढ़ रहा था, उछल रहा था, उसी समय ये 2जी में फंसे रहे, मौका मुसीबत में। सिविल न्यूक्लियर डील हुआ, जब सिविल न्यूक्लियर डील की चर्चा थी, तब ये कैश फॉर वोट में फंसे रहे। ये खेल चले।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

2010 में, कॉमनवेल्थ गेम्स हुए, भारत को दुनिया के सामने, भारत के युवा सामर्थ्य को प्रस्तुत करना एक बहुत बड़ा अवसर था। लेकिन फिर मौका मुसीबत में और CWG घोटाले में पूरा देश दुनिया में बदनाम हो गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

ऊर्जा का किसी भी देश के विकास में अपना एक महात्म्य होता है। और जब दुनिया में भारत की ऊर्जा शक्ति के उभार की दिशा में चर्चा की जरूरत थी, इस सदी के दूसरे दशक में हिन्‍दुस्‍तान की चर्चा ब्लैकआउट के नाते हुई। पूरे विश्व में ब्लैकआउट के वो दिन चर्चा के केंद्र में आ गए। कोयला घोटाला चर्चा में आ गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

देश पर इतने आतंकी हमले हुए। 2008 के हमलों को कोई भूल नहीं सकता है। लेकिन आतंकवाद पर सीना तानकर आंख में आंख मिलाकर के हमले करने का सामर्थ्य नहीं था, उसकी चुनौती को चुनौती देने की ताकत नहीं थी और उसके कारण आतंकवादियों के हौसले बुलंद होते गए, और पूरे देश में दस साल तक खून बहता रहा, मेरे देश के निर्दोष लोगों का, वो दिन रहे थे।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब एलओसी, एलएसी भारत के सामर्थ्य की ताकत का अवसर रहता था, उस समय डिफेंस डील को ले करके हेलिकॉप्टर घोटाले, और सत्ता को कंट्रोल करने वाले लोगों के नाम उसमें चिह्नित हो गए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब देश के लिए जरूरत थी और निराशा के मूल में ये चीजें पड़ी हुई हैं, सब उभर करके आ रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस बात को हिंदुस्तान हर पल याद रखेगा कि 2014 के पहले का जो दशक था, The Lost Decade के रूप में जाना जाएगा और इस बात को इंकार नहीं कर सकते कि 2030 का जो दशक है, ये India's Decade है पूरे विश्व के लिए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

लोकतंत्र में आलोचना का बहुत महत्व मैं मानता हूं। और मैं हमेशा मानता हूं कि भारत जो कि Mother of democracy है, सदियों से हमारे यहां लोकतंत्र हमारी रंगों में पनपा हुआ है। और इसलिए मैं हमेशा मानता हूं कि आलोचना एक प्रकार से लोकतंत्र की मजबूती के लिए, लोकतंत्र के संवर्धन के लिए, लोकतंत्र के स्पिरिट के लिए, आलोचना एक शुद्धि यग्न है। उस रूप में हम आलोचना को देखने वाले हैं। लेकिन दुर्भाग्य से बहुत दिनों से मैं इंतजार कर रहा हूं कोई तो मेहनत करके आएगा, कोई तो एनालिसिस करे तो कोई आलोचना करेगा ताकि देश को कुछ लाभ हो। लेकिन 9 साल आलोचना ने आरोपों में गंवा दिए इन्होंने। सिवाय आरोप, गाली-गलौच, कुछ भी बोल दो, इसके सिवाय कुछ नहीं किया। गलत आरोप और हाल ये चुनाव हार जाओ-ईवीएम खराब, दे दो गाली, चुनाव हार जाओ-चुनाव आयोग को गाली दे दो, क्या तरीका है। अगर कोर्ट में फैसला पक्ष में नहीं आया तो सुप्रीम कोर्ट को गाली दे दो, उसकी आलोचना कर दो।

माननीय अध्यक्ष जी,

अगर भ्रष्टाचार की जांच हो रही है तो जांच एजेंसियों को गाली दो। अगर सेना पराक्रम करे, सेना अपना शौर्य दिखाए और वो narrative देश के जन-जन के अंदर एक नया विश्वास पैदा करें तो सेना की आलोचना करो, सेना को गाली दो, सेना पर आरोप करो।

कभी आर्थिक, देश की प्रगति की खबरें आएं, आर्थिक प्रगति की चर्चा हो, विश्व के सारे संस्थान भारत का आर्थिक गौरवगान करें तो यहां से निकलो, आरबीआई को गाली दो, भारत के आर्थिक संस्‍थानों को गाली दो।

माननीय अध्यक्ष जी,

पिछले नौ साल हमने देखा है कुछ लोगों की bankruptcy को देखा है। एक constructive criticism की जगह compulsive critics ने ले ली है और compulsive critics इसी में डूबे हुए हैं, खोए हुए हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

सदन में भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों के बारे में बहुत कुछ कहा गया और मैंने देखा कि बहुत सारे विपक्ष के लोग इस विषय में सुर में सुर मिला रहे थे। मिले मेरा-तेरा सुर।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मुझे लगता था देश की जनता देश के चुनाव के नतीजें ऐसे लोगों को जरूर एक मंच पर लाएंगे। लेकिन वो तो हुआ नहीं, लेकिन इन लोगों को ईडी का धन्यवाद करना चाहिए कि ईडी के कारण ये लोग एक मंच पर आए हैं। ईडी ने इन लोगों को एक मंच पर ला दिया है और इसलिए जो काम देश के मतदाता नहीं कर पाए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं कई बार सुन रहा हूँ, यहां कुछ लोगों को Harvard Study का बड़ा क्रेज है। कोरोना काल में ऐसा ही कहा गया था और कांग्रेस ने कहा था कि भारत की बर्बादी पर Harvard में Case Study होगी, ऐसा कहा था और कल फिर सदन में Harvard University में Study की बात कल फिर हुई, लेकिन माननीय अध्यक्ष जी बीते वर्षों में Harvard में एक बहुत बढ़िया Study हुई है, बहुत important study हुई है। और वो स्‍टडी है, उसका टॉपिक क्‍या था मैं जरूर सदन को बताना चाहूंगा और ये स्‍टडी हो चुकी है। स्‍टडी है The Rise and Decline of India’s Congress Party, ये स्‍टडी हो चुका है और मुझे विश्वास है अध्यक्ष जी, मुझे विश्वास है भविष्य में कांग्रेस की बर्बादी पर सिर्फ Harvard नहीं, बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में अध्ययन होना ही होना है और डूबाने वाले लोगों पर भी होने वाला है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस प्रकार के लोगों के लिए दुष्यंत कुमार ने बहुत बढ़िया बात कही है और दुष्यंत कुमार ने जो कहा है बहुत फिट बैठता है उन्होंने कहा है:-

‘तुम्हारे पाँव के नीचे, कोई जमीन नहीं,

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं’।

आदरणीय अध्यक्ष जी

ये लोग बिना सिर-पैर की बात करने के आदी होने के कारण उनको ये भी याद नहीं रहता है वो खुद का कितना contradiction करते हैं। कभी एक बात-कभी दूसरी बात, कभी एक तरफ, कभी दूसरी तरफ हो सकता है वो आत्मचिंतन करके खुद के अंदर जो विरोधाभास है उसको भी तो ठीक करेंगे। अब 2014 से ये लगातार कोस रहे हैं हर मौके पर कोस रहे हैं भारत कमजोर हो रहा है, भारत की कोई सुनने को तैयार नहीं है, भारत का दुनिया में कोई वजूद ही नहीं रहा न जाने क्या- क्या कहा और अब क्या कह रहे हैं। अब कह रहे हैं कि भारत इतना मजबूत हो गया है कि दूसरे देशों को धमकाकर फैसले करवा रहा है। अरे पहले यह तो तय करो भई कि भारत कमजोर हुआ है कि मजबूत हुआ है।

माननीय अध्यक्ष जी

कोई भी जीवंत संगठन होता है, अगर जीवंत व्यवस्था होती है जो जमीन से जुड़ी हुई व्यवस्था होती है वे जनता-जनार्दन में क्या चलता है लोगों के अंदर उसका चिंतन करता है, उससे कुछ सीखने की कोशिश करता है और अपनी राह भी समय रहते हुए बदलता रहता है। लेकिन जो अहंकार में डूबे होते है, जो बस सब कुछ हम ही को ज्ञान है सब कुछ हमारा ही सही है ऐसी जो सोच में जीते हैं, उनको लगता है कि मोदी को गाली देकर ही हमारा रास्ता निकलेगा। मोदी पर झूठे अनाप-शनाप कीचड़ निकालकर ही रास्ता निकलेगा। अब 22 साल बीत गए वो गलतफहमी पालकर के बैठे हुए है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

मोदी पे भरोसा अखबार की सुर्खियों से पैदा नहीं हुआ है। मोदी पे ये भरोसा टीवी पर चमकते चेहरों से नहीं हुआ है। जीवन खपा दिया है पल-पल खपा दिए है। देश के लोगों के लिए खपा दिए हैं, देश के उज्जवल भविष्य के लिए खपा दिए है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जो देशवासियों का मोदी पर भरोसा है, ये इनकी समझ के दायरे से बाहर है और समझ के दायरे से भी काफी ऊपर है। क्या ये झूठे आरोप लगाने वालों पर मुफ्त राशन प्राप्त करने वाले मेरे देश के 80 करोड़ देशवासी क्या कभी उन पर भरोसा करेंगे क्या।

आदरणीय अध्यक्ष जी

वन नेशन वन राशन कार्ड देशभर में कहीं पर भी गरीब से गरीब को भी अब राशन मिल जाता है। वो आपकी झूठी बातों पर, आपके गलत गलीच आरोपों पर कैसे भरोसा करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जिस किसान के खाते में साल में 3 बार पीएम किसान सम्मान निधि के 11 करोड़ किसानों के खाते में पैसे जमा होते हैं, वो आपकी गालियां, आपके झूठे आरोपों पर विश्वास कैसे करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जो कल फुटपाथ पर जिंदगी जीने के लिए मजबूर थे, जो झुग्गी-झोपड़ी में जिंदगी बसर करते थे, ऐसे 3 करोड़ से ज्यादा लोगों को पक्के घर मिले हैं उनको तुम्हारी ये गालियां, ये तुम्हारी झूठी बातें क्यों वो भरोसा करेगा अध्यक्ष जी।

आदरणीय अध्यक्ष जी

9 करोड़ लोगों को मुफ्त गैस के कनेक्शन मिला है वो आपके झूठ को कैसे स्वीकार करेगा। 11 करोड़ बहनों को इज्जत घर मिला है, शौचालय मिला है वो आपके झूठ को कैसे स्वीकार करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

आजादी के 75 साल बीत गए 8 करोड़ परिवारों को आज नल से जल मिला है, वो माताएं तुम्हारे झूठ को कैसे स्वीकार करेगी, तुम्हारी गलतियों को, गालियों को कैसे स्वीकार करेगी। आयुष्मान भारत योजना से 2 करोड़ परिवारों को मदद पहुंची है जिंदगी बच गई है उनकी मुसीबत के समय मोदी काम आया है, तुम्हारी गालियों को वो कैसे स्वीकार करेगा, कैसे स्वीकार करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

आपकी गालियां, आपके आरोपों को इन कोटि-कोटि भारतीयों से होकर के गुजरना पड़ेगा, जिनको दशकों तक मुसीबतों में जिंदगी जीने के लिए तुमने मजबूर किया था।

आदरणीय अध्यक्ष जी

कुछ लोग अपने लिए, अपने परिवार के लिए बहुत कुछ तबाह करने पर लगे हुए हैं। अपने लिए, अपने परिवार के लिए जी रहे हैं मोदी तो 25 करोड़ देशवासियों के परिवार का सदस्य है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

140 करोड़ देशवासियों के आशीर्वाद ये मेरा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। और गालियों के शस्त्र से, झूठ के शस्त्र-अस्त्रों से इस सुरक्षा कवच को तुम कभी भेद नहीं सकते हो। वो विश्वास का सुरक्षा कवच है और इन शस्त्रों से तुम कभी भेद नहीं सकते हो।

आदरणीय अध्यक्ष जी

हमारी सरकार कुछ बातों के लिए प्रतिबद्ध है। समाज के वंचित वर्ग को वरीयता उस संकल्प को लेकर के हम जी रहे हैं, उस संकल्प को लेकर के चल रहे हैं। दशकों तक दलित, पिछड़े, आदिवासी जिस हालत में उनको छोड़ दिया गया था। वो सुधार नहीं आया जो संविधान निर्माताओं ने सोचा था। जो संविधान निर्माताओं ने निर्दिष्ट किया था। 2014 के बाद गरीब कल्याण योजनाओं का सर्वाधिक लाभ मेरे इन्ही परिवारों को मिला है। दलित, पिछड़ों, आदिवासी की बस्तियों में पहली बार माननीय अध्यक्ष जी पहली बार बिजली पहुंची है। मीलों तक पानी के लिए जाना पड़ता था। पहली बार नल से जल पहुंच रहा है। इन परिवारों में पहुंच रहा है माननीय अध्यक्ष जी। अनेक परिवार, कोटि-कोटि परिवार पहली बार पक्के घर में आज जा पाए हैं। वहां रह पाए हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जो बस्तियां आपने छोड़ दी थी। आपके लिए चुनाव के समय ही जिसकी याद आती थी। आज सड़क हो, बिजली हो, पानी हो, इतना ही नहीं 4जी कनेक्टिविटी भी वहां पहुंच रही है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

पूरा देश गौरव कर रहा है। आज एक आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में जब देखते हैं। पूरा देश गौरवगान कर रहा है। आज देश में आधी जाति समूह के नर-नारी जिन्होंने मातृभूमि के लिए जीवन तर्पण कर दिए। आजादी के जंग का नेतृत्व किया उनका पुण्य स्मरण आज हो रहा है और हमारे आदिवासियों का गौरव दिवस मनाया जा रहा है। और हमें गर्व है कि ऐसी महान हमारी आदिवासी परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में एक महिला देश का नेतृत्व कर रही है, राष्ट्रपति के रूप में काम कर रही है। हमने उनका हक दिया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हम पहली बार देख रहे हैं। एक बात ये भी सही है। हम सबका समान अनुभव है सिर्फ मेरी ही है ऐसा नहीं है आपका भी है। हम सब जानते हैं कि जब मां सशक्त होती है, तो पूरा परिवार सशक्त होता है। परिवार सशक्त होता है तो समाज सशक्त होता है और तभी जाकर के देश सशक्त होता है। और मुझे संतोष है कि माताएं, बहनों, बेटियों की सबसे ज्यादा सेवा करने का सौभाग्य हमारी सरकार को मिला है। हर छोटी मुसीबत को दूर करने का प्रामाणिक पूर्वक प्रयास किया है। बड़ी संवेदनशीलता के साथ उस पर हमने ध्यान केंद्रित किया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

कभी-कभी मजाक उड़ाया जा रहा है। ऐसा कैसा प्रधानमंत्री है। लाल किले पर से टॉयलेट की बात करता है। बड़ा मजाक उड़ाया गया। आदरणीय अध्यक्ष जी, ये टॉयलेट, ये इज्जत घर, ये मेरी इन माताओं-बहनों की क्षमता, उनकी सुविधा, उनका सुरक्षा का सम्मान करने वाली बात है। इतना ही नहीं माननीय अध्यक्ष जी, जब मैं सेनेटरी पैड की बात करता हूं तो लोगों को लगता है अरे प्रधानमंत्री ऐसे विषयों में क्यों जाते हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

सेनेटरी पैड के अभाव में गरीब बहन-बेटियां क्या अपमान सहती थीं, बीमारियों का शिकार हो जाती थीं। माताओं-बहनों को धुएं में दिन के कई घंटे बिताने पड़ते थे। उनका जीवन धुएं में फंसा रहता था, उससे मुक्ति दिलाने का काम उन गरीब माताओं-बहनों के लिए यह सौभाग्य हमें मिला है। जिंदगी खप जाती थी। आधा समय पानी के लिए, आधा समय केरोसिन की लाइन के अंदर खपे रहते थे। आज उससे माताओं-बहनों को मुक्ति दिलाने का संतोष हमें मिला है।

माननीय अध्यक्ष जी,

जो पहले चलता था, अगर वैसा ही हम चलने देते शायद कोई हमें सवाल भी नहीं पूछता कि मोदी जी ये क्यों नहीं किया, वो क्यों नहीं किया क्योंकि देश को आपने ऐसी स्थिति में ला दिया था कि इससे बाहर निकल ही नहीं सकता था। वैसी निराशा में देश को झोंक कर रखा हुआ था। हमने उज्ज्वला योजना से धुएं से मुक्ति दिलाई, जल-जीवन से पानी दिया, बहनों के सशक्तिकरण के लिए काम किया। 9 करोड़ बहनों को सेल्फ हेल्प ग्रुप स्वयं सहायता समूह से जोड़ना। माइनिंग से लेकर के डिफेंस तक आज माताओं-बहनों को, बेटियों के लिए अवसर खोल दिए हैं। ये अवसर खोलने का काम हमारी सरकार ने किया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस बात को हम याद करें, वोट बैंक की राजनीति ने देश के सामर्थ्य को कभी-कभी बहुत बड़ा गहरा धक्का पहुंचाया है। और उसी का परिणाम है कि देश में जो होना चाहिए, जो समय पर होना चाहिए था उसमें काफी देर हो गई। आप देखिए मध्यम वर्ग, लंबे समय तक मध्यम वर्ग को पूरी तरह नकार दिया गया। उसकी तरफ देखा तक नहीं गया। एक प्रकार से वो मान के चला कि हमारा कोई नहीं, अपने ही बलबूते पर जो हो सकता है करते चलो। वो अपनी पूरी शक्ति बेचारा खपा देता था। लेकिन हमारी सरकार, एनडीए सरकार ने मध्यम वर्ग की ईमानदारी को पहचाना है। उन्हें सुरक्षा प्रदान की है और आज हमारा परिश्रमी मध्यम वर्ग देश को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। सरकारी की विभिन्न योजनाओं से मध्यम वर्ग को कितना लाभ हुआ है माननीय अध्यक्ष जी, मैं उदाहरण देता हूं 2014 से पहले जीबी डेटा क्योंकि आज युग बदल चुका है। ऑनलाइन दुनिया चल रही है। हरेक के हाथ में मोबाइल पड़ा हुआ है। कुछ लोगों के जेब फटे हुए हो तो भी मोबाइल तो होता ही है।

आदरणीय अध्यक्ष जी, 2014 के पहले जीबी डेटा की कीमत 250 रुपया थी। आज सिर्फ 10 रुपया है। आदरणीय अध्यक्ष जी, Average हमारे देश में एक नागरिक Average 20 जीबी का उपयोग करता है। अगर उस हिसाब को मैं लगाऊँ तो Average एक व्यक्ति का 5 हजार रुपया बचता है आदरणीय अध्यक्ष जी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जन औषधि स्‍टोर आज पूरे देश में आकर्षण का कारण बने हैं, क्योंकि मध्‍यम वर्ग का परिवार उसको अगर परिवार में सीनियर सिटीजन है, डायबिटीज जैसी बीमारी है, तो हजार, दो हजार, ढाई हजार, तीन हजार की दवाई हर बार महीने लेनी पड़ती है। जन औषधि केंद्र में जो दवाई बाजार में 100 रुपये में मिलती है, जन औषधि में 10 रुपये, 20 रुपये मिलती है। आज 20 हजार करोड़ रुपया मध्‍यम वर्ग का जन औषधि के कारण बचा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

हर मध्यम वर्गीय परिवार का एक सपना होता है खुद का एक घर बने और urban इलाके में होम लोन के लिए की बड़ी व्यवस्था करने का काम हमने किया और रेरा का कानून बनाने के कारण जो कभी इस प्रकार का तत्व मध्‍यम वर्ग की मेहनत की कमाई को सालों तक डूबों कर रखते थे, उसमें से मुक्ति दिलाकर के उसको एक नया विश्वास देने का काम हमने किया और उसके कारण खुद का घर बनाने की उसकी सहूलियत बढ़ गई है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हर मध्यम वर्गीय परिवार को अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए उसकी उच्च शिक्षा के लिए उसके मन में एक मंसूबा रहता है। वो चाहता है आज जितनी मात्रा में मेडिकल कॉलेजेस हों, इंजीनियरिंग कॉलेजेस हों, प्रोफेशनल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई गई है। सीटें बढ़ाई गई हैं। उसने मध्यम वर्ग के एस्‍पीरेशन को बहुत उत्तम तरीके से एड्रेस क्या है। उसको विश्वास होने लगा है कि उनके बच्‍चों का उज्‍जवल भविष्‍य निर्धारित है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

देश को आगे बढ़ाना है, तो भारत को आधुनिकता की तरफ ले जाए बिना कोई चारा नहीं है। और समय की मांग है कि अब समय नहीं गंवा सकते और इसलिए हमने इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ बहुत बड़ा ध्यान दिया है और ये भी मानें, स्वीकारियेगा भारत की एक जमाने में पहचान थी गुलामी के कालखंड के पहले, ये देश architecture के लिए infrastructure के लिए दुनिया में उसकी एक ताकत थी, पहचान थी। गुलामी के कालखंड में सारा नष्ट हो गया। देश आजाद होने के बाद वो दिन दोबारा आएगा, ऐसी आशा थी, लेकिन वो भी समय बीत गया। जो होना चाहिए था, जिस गति से होना चाहिए, जिस स्केल से होना चाहिए था वो हम नहीं कर पाए। आज उसमें बहुत बड़ा बदलाव इस दशक में देखा जा रहा है। सड़क हो, समुद्री मार्ग हो, व्यापार हो, waterways हो, हर क्षेत्र में आज infrastructure का कायाकल्‍प दिख रहा है। Highways पर, रेकॉर्ड निवेश हो रहा है माननीय अध्यक्ष जी। दुनिया भर में आज चौड़ी सड़कों की व्यवस्था होती थी, भारत में चौड़ी सड़कें, highway, expressway, आज देश की नई पीढ़ी देख रही है। भारत में वैश्विक स्‍तर के अच्छे highway, expressway दिखें, इस दिशा में हमारा काम है। पहले रेलवे infrastructure, अंग्रेजों ने जो देकर के गए उसी पर भी हम बैठे रहे, उसी को हमने अच्‍छा मान लिया। गाड़ी चलती थी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वो समय था, जिस प्रकार से अंग्रेज जो छोड़ करके गए थे उसी भाव में जीते रहे और रेलवे की पहचान क्‍या बन गई थी? रेलवे यानी धक्‍का-मुक्‍की, रेलवे यानी एक्सीडेंट, रेलवे यानी लेटलतीफी, यही यानी एक स्थिति थी लेटलतीफी में एक कहावत बनी गई थी रेलवे यानी लेटलतीफी। एक समय था हर महीने एक्सीडेंट होने वाली घटनाएं बार-बार आती थी। एक समय था एक्सीडेंट एक किस्मत बन गई थी। लेकिन अब ट्रेनों में, ट्रेनों के अंदर वंदे भारत, वंदे भारत की मांग हर एमपी चिट्ठी लिखता है, मेरे यहां वंदे भारत चालू करें। आज रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प हो रहा है। आज एयरपोर्टों का कायाकल्प हो रहा है। सत्तर साल में सत्तर एयरपोर्ट, नौ साल में सत्तर एयरपोर्ट। देश में waterways भी बन रहा है। आज waterways पर ट्रान्स्पोर्टशन हो रहा है। आदरणीय अध्यक्ष जी, देश आधुनिकता की तरफ बढ़े इसके लिए आधुनिक infrastructure को बल देते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मेरे जीवन में सार्वजनिक जीवन में, 4-5 दशक मुझे हो गए और मैं हिन्‍दुस्‍तान के गांवों से गुजरा हुआ इंसान हूँ। 4-5 दशक तक उसमें से एक लंबा कालखंड परिव्राजक के रूप में बिताया है। हर स्तर के परिवारों से बैठने-उठने का, बात करने का अवसर मिला है और इसलिए भारत के हर भू भाग को समाज की हर भावना से परिचित हूँ। और मैं इसके आधार पर कह सकता हूँ और बड़े विश्वास से कह सकता हूँ कि भारत का सामान्य मानवी positivity से भरा हुआ है। सकारात्मकता उसके स्वभाव का, उसके संस्कार का हिस्सा है। भारतीय समाज negativity को सहन कर लेता है, स्वीकार नहीं करता है, ये उसकी प्रकृति नहीं है। भारतीय समुदाय का स्‍वभाव खुशमिजाज है, स्‍वप्‍नशील समाज है, सत्कर्म के रास्ते पर चलने वाला समाज है। सृजन कार्य से जुड़ा हुआ समाज है। मैं आज कहना चाहूंगा जो लोग सपने लेकर के बैठे हैं कि कभी यहां बैठते थे फिर कभी मौका मिलेगा, ऐसे लोग जरा 50 बार सोचें, अपने तौर-तरीकों पर जरा पुनर्विचार करें। लोकतंत्र में आपको भी आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। आधार आज डिजिटल लेनदेन का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण अंग बन गया है। आपने उसको भी निराधार करके रख दिया था। अब उसके भी पीछे पड़ गए थे। उसको भी रोकने के लिए कोर्ट-कचहरी तक को छोड़ा नहीं था। GST को ना जाने क्‍या-क्‍या कह दिया गया। पता नहीं लेकिन आज हिन्‍दुस्‍तान की अर्थव्यवस्था को और सामान्य मानवी का जीवन सुगम बनाने में GST ने एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। उस जमाने में HAL को कितनी गालियां दी गई, किस प्रकार से और बड़े-बड़े फॉरम का misuse किया गया। आज एशिया का सबसे बड़ा हेलीकॉप्टर बनाने वाला हब बन चुका है वो। जहां से तेजस हवाई जहाज सैकड़ों की संख्या में बन रहे हैं, भारतीय सेना के हजारों, हजारों-करोड़ों रुपयों के ऑर्डर आज HAL के पास है। भारत के अंदर vibrant डिफेन्स industry आगे आ रही है। आज भारत defence export करने लगा है। माननीय अध्यक्ष जी, हिन्‍दुस्‍तान के हर नौजवान को गर्व होता है, निराशा में डूबे हुए लोगों से अपेक्षा नहीं है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आप जानते हैं भलीभांति समय सिद्ध कर रहा है जो कभी यहां बैठते थे वो वहां जाने के बाद भी फेल हुए हैं और देश पास होता जा रहा है, distinction पर जाके और इसलिए समय की मांग है कि आज निराशा में डूबे हुए लोग थोड़ा स्वस्थ मन रख के आत्मचिंतन करें।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यहां जम्मू-कश्मीर की भी चर्चा हुई और जो अभी अभी जम्मू-कश्मीर घूम करके आए उन्होंने देखा होगा कितने आन-बान-शान के साथ आप जम्मू-कश्मीर में जा सकते हैं, घूम सकते हैं, फिर सकते हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, मैं भी जम्‍मू-कश्‍मीर में यात्रा लेकर के गया था और लाल चौक पर तिरंगा फहराने का संकल्प लेकर के चला था और तब आतंकवादियों ने पोस्टर लगाए थे, उस समय और कहा था कि देखते हैं किसने अपनी माँ का दूध पिया है जो लाल चौक पर आ करके तिरंगा फहराता है? पोस्टर लगे थे और उस दिन 24 जनवरी थी, मैंने जम्मू के अंदर भरी सभा में कहा था, अध्यक्ष जी। मैं पिछली शताब्दी की बात कर रहा हूं। और तब मैंने कहा था आतंकवादी कान खोलकर सुन लें, 26 जनवरी को ठीक 11 बजे मैं लाल चौक पहुंचुंगा, बिना सिक्योरिटी आऊंगा, बुलेटप्रूफ जैकेट के बिना आऊंगा और फैसला लाल चौक में होगा, किसने अपनी मां का दूध पिया है। वो समय था।

माननीय अध्यक्ष जी,

और जब श्रीनगर के लालचौक में तिरंगा फहराया, उसके बाद मैंने मीडिया के लोग पूछने लगे मैंने कहा था, कि आमतौर पर तो 15 अगस्त और 26 जनवरी को जब भारत का तिरंगा लहराता है तो भारत के आयुध, भारत के बारूद सलामी देते हैं, आवाज करके देते हैं। मैंने कहा, आज जब मैं लाल चौक के अंदर तिरंगा फहराऊं, दुश्मन देश का बारूद भी सलामी कर रहा है, गोलियां चला रहा था, बंदूकें-बम फोड़ रहा था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आज जो शांति आई है, आज चैन से जा सकते हैं। सैकड़ों की तादाद में जा सकते हैं। ये माहौल और पर्यटन की दुनिया में कई दशकों के बाद सारे रिकॉर्ड जम्मू–कश्मीर ने तोड़े हैं। आज जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आज जम्मू-कश्मीर में हर घर तिरंगा के सफल कार्यक्रम होते हैं। मुझे खुशी है कुछ लोग हैं, जो कभी कहते थे तिरंगे से शांति बिगड़ने का खतरा लगता था कुछ लोगों को। ऐसा कहते थे कि तिरंगे से जम्मू-कश्मीर में शांति बिगड़ने का खतरा रहता था। वक्त देखिए, वक्त का मजा देखिए- अब वो भी तिरंगा यात्रा में शरीक हो रहे हैं।

और आदरणीय अध्यक्ष जी,

अखबारों में एक खबर आई थी जिसकी तरफ ध्यान नहीं गया होगा। आदरणीय अध्यक्ष जी, उसी समय अखबारों में एक खबर आई थी इसके साथ जब ये लोग टीवी में चमकने की कोशिश में लगे थे। लेकिन उसी समय श्रीनगर के अंदर दशकों बाद थियेटर हाउस फुल चल रहे थे और अलगाववादी दूर-दूर तक नजर नहीं आते थे। अब ये विदेश ने देखा है.

आदरणीय अध्यक्ष जी

अभी हमारे साथी, हमारे माननीय सदस्य नॉर्थ-ईस्‍ट के लिए कह रहे थे। मैं कहूंगा जरा एक बार नॉर्थ-ईस्‍ट हो आइए। आपके जमाने का नॉर्थ-ईस्‍ट और आज के जमाने का नॉर्थ-ईस्‍ट देखकर आइये। आधुनिक चौड़े हाइवे हैं, रेल की सुख-सुविधा वाला सफर है। आप आराम से हवाई जहाज से जा सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट के हर कोने में आज बड़ी और मैं गर्व के साथ कहता हूँ आजादी के 75 साल मना रहे हैं, तब मैं गर्व से कहता हूं 9 साल में करीब-करीब 7500 जो हथियार के रास्ते पर चल पड़े थे, ऐसे लोगों ने सरेंडर किया और अलगाववादी प्रवृत्ति छोड़ करके मुख्‍य धारा में आने का काम किया है।

आदरणीय अध्‍यक्ष जी,

आज त्रिपुरा में लाखों परिवारों को पक्का घर मिला है, उसकी खुशी में मुझे शरीक होने का अवसर मिला था। जब मैंने त्रिपुरा में हीरा योजना की बात कही थी, तब मैंने कहा था हाईवे-आईवे-रेलवे और एयरवे हीरा, ये हीरा का आज सफलतापूर्वक त्रिपुरा की धरती पर मजबूती नजर आ रही है। त्रिपुरा तेज गति से आज भारत की विकास यात्रा का भागीदार बना है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं जानता हूं सच सुनने के लिए भी बहुत सामर्थ्‍य लगता है। आदरणीय अध्यक्ष जी, झूठे, गंदे आरोपों को सुनने के लिए भी बहुत बड़ा धैर्य लगता है और मैं इन सबका अभिनंदन करता हूं जिन्‍होंने धैर्य के साथ गंदी से गंदी बातें सुनने की ताकत दिखाई है, ये अभिनंदन के अधिकारी हैं। लेकिन सच सुनने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं वो कितनी निराशा की गर्त में डूब चुके होंगे इसका देश आज सबूत देख रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, विचारधाराओं में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ये देश अजर-अमर है। आओ हम चल पड़ें- 2047, आजादी के 100 साल मनाएंगे, एक विकसित भारत बनाकर रहेंगे। एक सपना ले करके चलें, एक संकल्प ले करके चलें, पूरे सामर्थ्य के साथ चलें और जो लोग बार-बार गांधी के नाम पर रोटी सेंकना चाहते हैं- उनको मैं कहना चाहता हूं एक बार गांधी को पढ़ लें। एक बार महात्मा गांधी को पढ़ें, महात्‍मा गांधी ने कहा था- अगर आप अपने कर्तव्यों का पालन करोगे तो दूसरे के अधिकारों की रक्षा उसमें निहित है। आज कर्तव्य और अधिकार के बीच में भी लड़ाई देख रहे हैं, ऐसी नासमझी शायद देश ने पहली बार देखी होगी।

और इसलिए माननीय अध्यक्ष जी,

मैं फिर एक बार आदरणीय राष्ट्रपति जी को अभिनंदन करता हूं, राष्‍ट्रपति जी का धन्यवाद करता हूं और देश आज यहां से एक नई उमंग-नए विश्‍वास-नए संकल्प के साथ चल पड़ा है।

बहुत-बहुत धन्यवाद!