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मंच पर बिराजमान प्रात:स्मरणीय, वंदनीय, परम श्रद्धेय पूज्य संतगण, माँ भारती की भक्ति में डूबे हुए उपस्थित सभी महानुभाव, जिन संतो के चरणों में बैठना जीवन का एक बहुत बड़ा सौभाग्य होता है, उन संतों के बगल में बैठने का जो अवसर आए, तो बैठने वाले की हालत क्या हुई होगी इसका आप अंदाज कर सकते हैं..! जिनकी वाणी सुनने के लिए मीलों दूर से कष्ट उठा कर के करोड़ों-करोड़ों लोग पहुंचते हैं, शब्द रूपी प्रसाद ग्रहण करने के लिए तपस्या करते हैं ऐसे ओजस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, माँ सरस्वती के धनी, जिनके आशीर्वाद से लाभान्वित हुए हैं ऐसे महापुरूषों के बीच खड़े होकर के कुछ कहने की नौबत आए, तो उस कहने वाले का हाल कैसा होता होगा इसका आप भली-भांति अंदाजा कर सकते हैं..! ईश्वर ने जब से मुझे दुनिया को जानने और समझने का सामर्थ्य दिया, तब से जितने भी कुंभ के मेले हुए उन सब में मैं उपस्थित रहा और कभी ये भी सौभाग्य मिला था कि पूरा समय भी मैं वहाँ रहा था। लेकिन इस बार का ये पहला कुंभ का मेला ऐसा था कि जिसमें मैं पहुंच नहीं पाया था। मन में एक कसक थी, एक पीड़ा थी कि मैं ये क्यों कर नहीं पाया..? और जब मुझे गुरू जी अभी मिले तो तुरंत पूछा कि बेटा, इस बार कुंभ में क्यों नहीं दिखाई दिए..? मन में एक कसक तो अभी भी है कि नहीं पहुंच पाया, लेकिन आज इस समारोह में और वो भी गंगा के तट पर हरिद्वार की भूमि में इसी पवित्र स्थल पर इन सभी संतों, आचार्यों और भगवंतों के दर्शन का मुझे सौभाग्य मिला..! शायद ईश्वर की इच्छा होगी कि मेरी वो कसक कम हो, और इसलिए ही ये कुछ व्यवस्था ईश्वर ने बनाई होगी..! ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज आप सब लोगों के चरणों में वंदन करने का अवसर मिला है..!

मैं एक बात यहाँ बताना चाहता हूँ। हमारे देश में किसी के लिए कुछ भी कह देना बहुत आसान हो गया है। शब्दों का मूल्य ना समझते हुए, शब्दों का सामर्थ्य ना समझते हुए, किसी के लिए कुछ भी कह देना ये मानों एक नया स्वभाव पनपा है। और इसलिए पता नहीं किस-किस के लिए क्या-क्या कहा गया होगा..! लेकिन एक समृद्व राज्य के इतने वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर रहने के बाद मैं सार्वजनिक रूप से और इन मीडिया वाले मित्रों की हाजिरी में अपने अनुभव से घोषित करना चाहता हूँ। यहाँ एक भी संत महात्मा, एक भी संस्था ऐसी नहीं है जिसने कभी भी, कभी भी गुजरात में मुख्यमंत्री के पास आकर के किसी भी चीज की कभी मांग की हो..! ये देने वाले लोग हैं..! वरना आसानी से यह कह दिया जाता है। और इसलिए आज मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ ये कहना चाहता हूँ कि मेरे 12 साल के कार्यकाल में मुझे एक भी संत महात्मा, एक भी समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति ऐसा मिला नहीं है जिसने सरकार से कुछ मांगा हो..! बहुत लोग होंगे जिनको ये बात नजर आना मुश्किल है। संतो की शक्ति ऐसे चश्मों को निर्माण करे, ऐसे ऐनक का निर्माण करे ताकि ऐसे लोगों को कुछ सत्य दिखाई दे..! और उस अर्थ में, उनकी वाणी का सामर्थ्य हजारों गुना बढ जाता है..! उन्होंने जो मर्यादा रेखाएं तय की होती हैं उस मर्यादा रेखाओं के बाहर जाने का साहस कत्तई कोई नहीं कर पाता है, क्योंकि वो सिर्फ शब्द नहीं होते हैं, वो एक साधना का अंश होता है..!

मैं बाबा रामदेव जी को सालों से जानता हूँ। वो जब साइकिल से घूमते थे तब से जानता हूँ और एक छोटी सी पुडिया में से काजू का टुकड़ा देते थे वो भी याद है..! आप कल्पना कर सकते हैं, एक व्यक्ति अहर्निश, एक निष्ठ, अखंड, अविरत, ‘वन लाइफ, वन मिशन’ इस तरह चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति... इस देश में लगातार भ्रमण करता रहे..! प्रतिदिन डेढ़-दो लाख लोगों को योग के माध्यम से स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करते रहें..! अगर बाबा रामदेव जी की ये मूवमेंट दुनिया के किसी और देश में हुई होती, तो ना जाने कितनी यूनिवर्सिटीयों ने उस पर पी.एच.डी. की होती..! मैं ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ वालों को कहना चाहता हूँ कि आपने ना जाने कितने रिकॉर्ड प्रतिस्थापित किये होगें, लेकिन कभी आपने इस रिकॉर्ड की तरफ ध्यान दिया है कि अपने इतने छोटे से काल खंड में एक व्यक्ति ने टीवी के माध्यम से नहीं, फोटो के माध्यम से नहीं, रेडियो के माध्यम से नहीं, टैक्नोलॉजी के माध्यम से नहीं, रूबरू में इतने करोड़ लोगों के साथ आंख में आंख मिला कर के बात की हो ऐसा रिकॉर्ड शायद दुनिया में कहीं नहीं होगा..!

ये हमारा दुर्भाग्य है मित्रों, कि हम लोग हमारे देश के सामर्थ्य की चर्चा कभी करते नहीं हैं। किसी ने कल्पना की है कुंभ के मेले की..? कुंभ के मेले की व्यवस्था कितनी जबर्दस्त होती है..! वहाँ संतों मंहतों के एक-एक छोटे नगर बस जाते हैं। और गंगा के किनारे पर हर दिन यूरोप का एक देश इक्कठा हो इतनी भीड़ जमा होती है, इतने भक्तों का जमघट जमा होता है। और उसके बाद भी ना कोई मारकाट, ना कोई लूट, ना कोई अकस्मात, ना कोई मौत, ना कोई बीमारी... और दो-दो, तीन-तीन महीने तक बिना किसी आमंत्रण के बिना किसी सूचना के करोड़ों-करोड़ों लोग पहुंचते हैं..! क्या किसी मैनेजमेंट गुरु ने सोचा है, क्या दुनिया को मैनेजमेंट सिखाने वालों ने कभी सोचा है कि ये कौन सी मैनेजमेंट है, ये कौन सी व्यवस्था है..? ये संत-शक्ति के सामर्थ्य और सहस्त्र वर्षों की परंपरा का परिणाम है। लेकिन हम स्वाभिमान खो चुके हैं। आत्म गौरव के साथ दुनिया के साथ आंख में आंख मिला कर के हमारे सामर्थ्य का परिचय कराने की आदत गुलामी के काल खंड के कारण छूट गई है। और तब जा कर के इस चेतना को विश्व के सामने प्रस्तुत करना हर भारतवासी का सपना हो वो बहुत स्वाभाविक है और मैं भी एक हिन्दुस्तान के छोटे बच्चे के नाते उन महापुरूषों के शब्दों पर भरोसा करता हूँ। श्री अरविंद ने कहा था, जिसे मैं वेद वाक्य मानता हूँ, कि मुझे विश्वास है कि मेरी भारतमाता आजाद तो होगी ही, पर इतना ही नहीं, मेरी भारत माता विश्व कल्याणक बन कर रहेगी..! ये सपना देखा था। आज जब पूरा हिन्दुस्तान स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती मना रहा है तब, इस महापुरूष के सपनों को पूरा कौन करेगा..? क्या इस देश के एक-एक बच्चे का दायित्व नहीं है, हम सभी भारतवासियों का दायित्व नहीं है, हम सभी नौजवानों का दायित्व नहीं है कि जिस स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मैं अपनी आंखों के सामने देख रहा हूँ कि मेरी भारत माता जगतगुरू के स्थान पर विराजमान है..! मुझे उस महापुरूष के सपनो में विश्वास है और उन्होंने कहा था कि मेरी आशा देश के नौजवान हैं..! 150 साल हो गए उस महापुरुष के जन्म को, 125 साल पहले ये बात उन्होंने बताई थी और आज पूरे विश्व का सबसे युवा कोई देश है तो वो हिन्दुस्तान है..!

आज पूरे विश्व में चर्चा चल रही है कि 21 वीं सदी हिन्दुस्तान की सदी है। पूरा विश्व ये मानता है कि 21 वीं सदी ज्ञान की सदी है और इसलिए जब-जब मानव जात ने ज्ञान युग में प्रवेश किया है तो उस सभी समय हिन्दुस्तान ने मानव जात का नेतृत्व किया है..! 21 वीं सदी यदि ज्ञान की सदी है तो 21 वीं सदी का नेतृत्व भी ये ज्ञानवान देश के पास होगा, ये हम सबको भरोसा होना चाहिए और उस दिशा में हमें एक नागरिक के नाते, हम जहाँ भी हों, जैसे भी हों, उस कर्तव्य का पालन करने के लिए सवा सौ करोड़ देशवासियों का संकल्प इस आशा-आकांक्षा की परिपूर्ति कर सकता है..!

भाइयो और बहनों, अभी-अभी नवरात्र का पर्व पूरा हुआ है और ये मेरा सौभाग्य रहा कि कुछ कारणवश ऐसे कार्यक्रम बन गए, वैसे मीडिया के मित्र तो उसका ऐसा डिजाइन बना कर के दुनिया को समझा रहे हैं कि मोदी कैसे बड़ी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रहे हैं..! ऐसा बता रहे हैं..! तो ये मैं बताना चाहता हूँ कि कोई प्लानिंग-ब्लानिंग नहीं है..! ईश्वर की इच्छा होगी, मेरा मन करता था बड़े दिनों से कि माँ काली के पास चला जाऊँ, बैलूर मठ चला जाऊँ, जिन संतों के साथ बचपन बिताया था, एक बार फिर उनके पास चला जाऊँ..! और कुछ दिन पहले में बंगाल, कलकत्ता गया और माँ काली के पास गया, रामकृष्ण परमहंस की उस पवित्र भूमि पर गया, बैलूर मठ गया, संतों के बीच समय बिताया..! बाद में सूचना आई केरल से, नारायण गुरू की पवित्र परंपरा के पास दर्शन करने का अवसर आया। नारायण गुरू ने अपना पूरा जीवन वंचितों के लिए, पीड़ितों के लिए, दलितों के लिए, शोषितों के लिए, समाज के निम्न स्तर की भलाई के लिए लगाया था और सौ साल पहले शिक्षा की ऐसी अलख जगाई थी कि उस संत की तपस्या का परिणाम है कि आज पूरे हिन्दुस्तान में सर्वाधिक शिक्षा कहीं है तो उस प्रदेश का नाम केरला है। संत का प्रताप है..! और आज दक्षिण से निकल के मैं सीधा हिमालय की गोद में, गंगा की चरणों में बाबा रामदेव जी जिस गुरूकुल को शुरू कर रहे हैं, आचार्यकुल को शुरु कर रहे हैं, ऐसे एक पवित्र कार्य में जुड़ने का मुझे सौभाग्य मिला है।

मैं जानता हूँ आज के इस अवसर के बाद भांति-भांति की चर्चा हमें सुनने को मिलेगी..! मैं जब छोटा था, तो हमारे कान में एक सवाल पूछा जाता था, हमारे मनो को भ्रमित किया जाता था। कभी-कभी मुझे लगता है कि बाबा रामदेव जी सारे देश को कपालभाति की ओर खींच कर ले गए हैं और उसके कारण जिनके कपाल में भ्रांतियाँ पड़ी हैं, वो ज्यादा परेशान नजर आते हैं..! लेकिन मुझे भरोसा है कि ये कपालभाति कभी ना कभी एक कपाल की भ्रांतियों को भी समाप्त करने का सामर्थ्य दिखाएगी..! हम बचपन में क्या सुनते थे..? हर कोई बोलता था और मैं समझ नहीं पाता था कि ये लोग ऐसा क्यों बोलते हैं और ये अभी भी मेरे मन में है क्योंकि मैं बचपन से किसी संत को देखता था तो बड़ी जिज्ञासा होती थी। कभी उनसे मैं सवाल पूछने चला जाता था, कभी किसी मंदिर में रूके हैं तो खाने-वाने को पूछने चला जाता था, मेरी अपनी एक रुचि थी..! पता नहीं ये ईश्वर ने तय किया होगा मेरे लिए, लेकिन मुझे बड़ा आकर्षण था..! और मैं बहुत छोटे नगर में पैदा हुआ हूँ, मैंने तो गाड़ी भी बचपन में देखी नहीं थी कि कार क्या होती है..! लोग कहते थे कि अरे छोड़ो, ये साधुलोग खाते हैं और सोते हैं, बस। कुछ करते नहीं है, लड्डू खाना बस, और कुछ काम नहीं। और अब जब काम करते हैं तो लोग पूछते हैं कि अरे, आपका ये काम है क्या, क्यों करते हो..? मैं हैरान हूँ..! बाबा रामदेव जी को सबसे बड़ा सवाल ये है कि आप ये सब करते क्यों हो? पहले लोग पूछते थे क्यों नहीं करते हो, अब पूछते हैं कि क्यों करते हो..? क्या इन लोगों को जवाब देना जरूरी बनता है, भाई? इनके लिए समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बाबा रामदेव जिस काम को कर रहे हैं, मैं मानता हूँ राष्ट्र की सेवा है। और हमारी पूरी संत परंपरा को देखिए। हर संत ने अपना जीवन उपदेशों तक कभी सीमित नहीं रखा। उन्होंने आचरण पर बल दिया है और कर्त्तव्य भाव से समाज जीवन की पीड़ाओं को दूर करने के लिए उनसे जो कुछ भी उस युग में हो सका, उसे करते रहे। किसी की जेब में एक पैसा ना हो और साल भर हरिद्वार में रहना हो, कोई मुझे बताए, वो भूखा रहेगा..? कौन खिलाता है, ये खिलाने वाले कौन हैं..? ये ही छोटे-मोटे संत हैं, जो अपने यहाँ से किसी भूखे को जाने नहीं देते हैं। मैंने बाबा रामदेव जी से एक बार पूछा था कि मैं तो योग की परंपरा से जुड़ा हुआ इंसान हूँ और दिन-रात दौड़ पाता हूँ उसमें योग का बहुत बड़ा योगदान है। तो, मैंने उनको पूछा एक बार कि योग से ऊर्जा प्राप्त होती है, स्वस्थता प्राप्त होती है, उमंग रहता है, वो सब तो है, लेकिन चारों तरफ से जब इतनी यातनाएं आती हों तो उसको झेलने की ताकत कहाँ से आती है ये तो बताओ..! क्या नहीं बीती बाबा रामदेव पर और क्या गुनाह था उनका..? क्या भारत जैसे लोकतंत्र देश में आपके विचारों से विपरीत विचार कहना गुनाह है..? क्या आपको जो बात पंसद नहीं है वो बात अगर कोई कहे, तो उसके लिए कोई भी अनाप-शनाप शब्द बोलने का आपको अधिकार मिल जाता है..? मैं दिल्ली में बैठे हुए शंहशाहों से पूछना चाहता हूँ, और ये मोदी नहीं पूछ रहा है, देश की भलाई के लिए भक्ति पूर्वक जुल्म के सामने झूझने वाली और जुल्म के सामने ना झुकने वाली माता राजबाला चीख-चीख के पूछ रही है और दिल्ली के शंहशाहों का जवाब मांग रही है..! कुछ लोगों को लगता था कि दमन के दौर से दुनिया को दबोच दिया जाता है। वे लोग कान खोल कर सुन लें, अंग्रेजी सल्तनत भी कभी किसी को दबोच नहीं पाई, आप लोगों की ताकत क्या है..? आप लोग चीज क्या हैं..? एक बार निकलो तो सही, जनता को जवाब देना पड़ जाएगा..!

मित्रों, मैं साफ मानता हूँ कि बाबा रामदेव आज जो कुछ भी कर रहे हैं, मैं नहीं मानता हूँ कि कोई योजना से कर रहे हैं। वो निकले थे तो नागरिकों की स्वस्थता के लिए, वो निकले थे ताकि योग के माध्यम से गरीब से गरीब आदमी अपने आप को स्वस्थ्य रख सके, वो निकले थे क्योंकि महंगी दवा गरीब को बचा नहीं सकती है, योग बचा सकता है और सिर्फ इसलिए निकले थे..! लेकिन दस साल लगातार भ्रमण करते-करते उन्होंने देखा कि नागरिकों के स्वास्थ्य का जितना संकट है, उससे ज्यादा राष्ट्र के स्वास्थ्य का संकट है और तब जा कर के उन्होंने राष्ट्र के लिए आवाज उठाना शुरू किया। और भाइयो-बहनों, इसमें एक सच्चाई है और मुझे विश्वास है कि भले ही उन पर अनेक प्रकार के, भांति-भांति के आरोप लगाने की कोशिश हुई हो... वैसे बाबा रामदेव जी मुझे मिलते हैं तो मुझे कुछ दूसरा कहते हैं। वे मुझे कहते हैं कि मोदी जी, हम दोनों सगे भाई हैं..! मैंने कहा, क्यों..? बोले, जितने प्रकार के जुल्म मुझ पर हो रहे हैं, वो सभी प्रकार के आपके ऊपर भी हो रहे हैं..! तो मैं एक सूची बनाता हूँ कि आज उन पर एक जुल्म हुआ तो मेरी बारी कब आएगी..? क्या शासन का ये काम है..? क्या सद्प्रवृति को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए..? आप बीमारियों की दवाई कहीं और खोज रहे हैं, बीमारी की जड़ों को दूर करने का काम ये संत परंपरा कर रही है और उसी को आप नकार रहे हो तो बुराइयाँ बढ़ती ही जाएगी..! जो श्रेष्ठ है, उत्तम है, सही रास्ता है, इसको नकारने से काम नहीं चलता..!

भाइयो और बहनों, इस देश में ऐसा एक छोटा सा वर्ग है जो ये मानता है कि हिन्दुस्तान का जन्म 15 अगस्त 1947 को हुआ है। और जो लोग ये मानते हैं कि हिन्दुस्तान 15 अगस्त को पैदा हुआ वो सारे गलत रास्ते पर जा रहे हैं..! ये सहस्त्र वर्ष पुराना, एक महान सांस्कृतिक धरोहर वाला, समय के हर पहलु को अनुभव करते हुए, कठिनाइयों से रास्ता खोजते हुए, विश्व कल्याण की कामना करते हुए आगे जा रहा एक समाज है और तभी तो विश्व की अनेक हस्तियाँ मिटने के बाद भी हमारी हस्ती मिटती नहीं है..! जिन चीजों से हम खत्म नहीं हुए हैं, जिसने हमें बचाए रखा है उनको बचाना ये हम लोगों का दायित्व बन जाता है। अगर हम उसको खो देंगे तो समाज कोई भी हो, अगर वो समाज इतिहास की जड़ों से अपने आप को काट डालता है, सांस्कृतिक छाँव से अपने आप को अलग कर देता है, तो उस समाज में इतिहास निर्माण करने की ताकत नहीं रहती है..! इतिहास वही समाज बना सकता है, जो समाज इतिहास में से प्राण शक्ति को प्राप्त करता है..! हम लोग हमारे अपने इतिहास के प्रति शर्मिंदा होते हैं, खुद को इतिहास से अलग रखने का प्रयास करते हैं, सांस्कृतिक विरासत को हम पुराण पंथी कह कर, गालियाँ दे कर के उसका इंकार कर देते हैं... और तब जा कर के स्वस्थ समाज के निर्माण में रुकावटें पैदा होती हैं..!

हमारी समाज व्यवस्था को बढ़िया बनाने का और बचाने का सबसे बड़ा काम परिवार संस्था ने किया है। हम धीरे-धीरे देख रहे हैं कि हमारी परिवार संस्था संकट में आ रही है। ज्वाइंट फैमिली से हट-हट के हम माइक्रो परिवार की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं..! बच्चे आया के भरोसे पल रहे हैं..! हमारा सामर्थ्य कितना था, हमारी समाज व्यवस्थाएं क्या थीं, उसमें से कौन सी चीज अच्छी है कौन सी चीज़ें कालबाह्य हैं, जो निकम्मी है उसको उखाड़ फैंकना, ये हमारे समाज की ताकत है..! और मित्रों, आज मैं ये गर्व से कहना चाहता हूँ कि हम ही लोग इतने भाग्यवान हैं, इस भारत भूमि में जन्में हुए हम लोग इतने भाग्यवान है कि हमारी धरती एक ऐसी बहुरत्न वंसुधरा है, हमारी समाज व्यवस्था इतनी जागृत है कि जिसके कारण जब-जब हमारे भीतर बुराइयाँ पैदा हुईं, हमारे अंदर कमियाँ आई तो उन कमियों को दूर करने के लिए, उन बुराइयों की मुक्ति के लिए हमारे ही समाज के भीतर से तेजस्वी, ओजस्वी, प्राणवान महापुरुषों का जन्म हुआ..! अस्पृश्यता को हमने जन्म दिया, तो कोई गांधी आया जिसने अस्पृश्ता के खिलाफ जंग छेड़ा..! हम ईश्वर भक्ति में लीन थे, तब कोई विवेकानंद आया और उसने कहा कि अरे, दरिद्रनारायण की सेवा करो..! हम मंदिर, माता, भगवान उसी में लगे हुए थे, तब कोई विवेकानंद आया और उसने कहा कि अरे छोड़ो सब, तुम्हारे सब भगवानों को डूबा दो, तुम सिर्फ भारत माता की सेवा करो, ये देश तेजस्वी बन कर के निकलेगा..! ये सामर्थ्य है इस समाज का..! विधवाओं के प्रति अन्याय करने वाले इस समाज के खिलाफ इसी कोख से एक महापुरूष पैदा हुए जिन्होंने विधवाओं के कल्याण के लिए अलख जगाई और समाज के खिलाफ लड़ाई लड़े..! ये संतों का, ऋषियों का, मुनियों का, आचार्यों का योगदान है और तब जा कर के हुआ है..! ये देश राजनेताओं ने नहीं बनाया है, ये देश किसी सरकार ने नहीं बनाया है, ये देश ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, शिक्षकों ने बनाया है, और तब जा कर के देश आगे बढ़ा है। सारी चीज़ें हमने राज के आस-पास, इर्द-गिर्द हमने इक्कठी कर दी हैं, और इन सारी शक्तियों को हमने नकार दिया है..! आवश्यकता है कि इन सभी शक्तियों को जोड़ें, सब शक्तियों का मिलन हो, सतसंकल्प के साथ सतशक्तियाँ सतपथ पर चलें, तो दुनिया की कोई ताकत ऐसी नहीं है कि इस भारत महामाता को जगदगुरू बनने से रोक सके..!

भाइयो और बहनों, मैं बहुत आशावादी व्यक्ति हूँ। विश्वास मेरी रगों में दौड़ता है। मेरा पसीना विकास मंत्र से पुलकित होता है। और इसलिए मैं कहता हूँ और गुजरात के अनुभव से कहता हूँ कि निराश होने का कोई कारण नहीं है..! मुझे याद है कि 2001 में जब गुजरात में भंयकर भूंकप आया, तब सारा विश्व कहता था कि गुजरात मौत की चादर ओढ कर के सोया है, अब गुजरात खड़ा नहीं हो सकता..! अब गुजरात का कुछ होगा नहीं, अध्याय पूरा हो गया..! जो गुजरात के लिए अच्छा चाहते थे वो भी दु:खी थे, उनको भी लगता था कि परमात्मा ने इतना बड़ा कहर क्यों किया..? लेकिन वही गुजरात ने करके दिखाया..! सारा विश्व कहता है, वर्ल्ड बैंक कहती है कि भयानक भूंकप की आफत में से निकलने में समृद्घ देशों को भी सात साल लगते हैं। हम तो गरीब देशों में गिने जाते हैं, लेकिन गुजरात तीन साल के भीतर-भीतर दौड़ने लग गया था। मित्रों, मैं साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि आज जो विश्व भर में गुजरात के विकास की जो चर्चा हो रही है, आज विश्वभर में गुजरात के प्रति संतोष का एक भाव जो प्रकट हो रहा है, उसका कारण नरेन्द्र मोदी नहीं है, नहीं है, नहीं है..! अगर उसका यश भागी कोई है तो छह करेाड़ गुजरातियों का पुरषार्थ है। अगर छह करोड़ गुजरातियों का पुरूषार्थ विश्व के सामने एक आदर्श पैदा कर सकता है, तो सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों का पुरुषार्थ पूरे विश्व में एक नई चेतना पैदा कर सकता है, इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए..!

भाइयो और बहनों, हमने ना कभी जीवन में लेने, पाने, बनने के सपने देखें हैं, ना कभी ऐसे सपने संजोए हैं। हम तो फकीरी को लेकर चलने वाले इंसान हैं..! कल क्या था..? अगर कल कुछ नहीं था तो आने वाले कल में कुछ होना चाहिए इसकी कामना कभी जिंदगी में नहीं की..! और मित्रों, राजा रंतिदेव ने कहा था और ये देश की विशेषता देखिए कि जहाँ एक राजा किस प्रकार की ललकार करता है। राजा रंतिदेव ने कहा था ‘ना कामये राज्यम्, ना मोक्षम्, ना पुर्नभवम्, कामये दु:ख तप्तानाम्, प्राणीनाम् आर्त नाशनम्’... ना मुझे राज्य की कामना है, ना मुझे मोक्ष की कामना है, अगर कामना है तो पीड़ितों के, दुखियारों के, वंचितों के आंसू पोछने की कामना है, ये हमारी पंरपरा रही है..! ‘ना कामये राज्यम्, ना मोक्षम्, ना पुर्नभवम्’, हम उस परंपरा से निकले हैं, जिसने हमें सिखाया है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’... हम उस परंपरा से निकले हैं..! कुछ लोग हमारे इरादों पर शक करते हैं। अपने-पराए ऐसी दीवारें खड़ी करने की कोशिश करते हैं। मैं उन सबको कहना चाहता हूँ कि मैं जिस परंपरा में पला हूँ, मैं जिस संस्कारों में बड़ा हुआ हूँ और जिसने मुझे जो मंत्र सिखाया है, उस मंत्र को मैं मेरे राजनीतिक जीवन का मेनिफेस्टो मानता हूँ..! वो मंत्र कहता है, ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया’..! मुझे कभी ये नहीं कहा कि ‘हिन्दु सुखिन: संतु, हिन्दु निरामया’, ऐसा नहीं कहा..! मेरे पूर्वजों ने मुझे कहा है, ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणी पश्यन्तु, माँ कश्चित दु:ख भाग भवेत’... सबके कल्याण की बात, सबके स्वास्थ्य की बात, सबकी समृद्घि की बात, ये मैनिफैस्टो हमें हमारे पूर्वजों ने दिया है। शायद दुनिया में किसी समाज के पास, किसी धर्म के पास, किसी परंपरा के पास दो लाइन में मानव विकास का चित्र खींचा गया हो, सोशल वैलफेयर के कामों का खाका लिया गया हो, ऐसा शायद दुनिया में कहीं नहीं होगा, ये मेरा ज्ञान कहता है..! और इसलिए भाइयो और बहनों, हमारे पास अगर इतनी बड़ी विरासत है, तो भय किस चीज का..?

मुझे स्मरण है, 2002 में मैं चुनाव जीत कर आया था। कई लोगों के लिए बहुत बड़ा सदमा था, वो बेचारे अभी तक होश में नहीं आए हैं..! 12 साल हो गए..! उस दिन का मेरा एक भाषण है। मैं मीडिया के मित्रों को कहता हूँ कि आप में अगर ईमानदारी नाम की चीज है तो उस समय के यू-टयूब पर जा कर के मेरा वो भाषण देख लीजिए। चुनाव जीतने के बाद मैंने कहा था कि अब चुनाव समाप्त हो चुके हैं, राजनीतिक गहमागहमी समाप्त हो चुकी है, तू-तू, मैं-मैं का दौर खत्म हो चुका है, अब हम सबको मिल कर के गुजरात को आगे बढ़ाना है..! और मैंने कहा था कि जिन्होंने हमें वोट दिए हैं वो भी मेरे हैं, जिन्होंने हमें वोट नहीं दिया वो भी मेरे हैं, और जिन्होंने किसी को वोट नहीं दिया वो भी मेरे हैं..! मैंने ये भी कहा था, ‘अभयम्’, ये मेरा शब्द था उस दिन के भाषण में, 2002 के उस माहौल में..! ये संतो की कृपा रही है, इन्हीं की शिक्षा-दीक्षा रही है कि उस माहौल में भी, इतने विकट वातावरण में भी ईश्वर ने मेरे मुंह से एक शब्द निकाला था और मैंने कहा था कि अब सरकार बन चुकी है और मेरा एक ही मंत्र है, ‘अभयम्’..! भाइयों-बहनों, आज 12 साल हो चुके हैं। जिस गुजरात के अंदर आए दिन दंगे होते थे, निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया जाता था, आज 12 साल हो गए हैं, लेकिन दंगो का नामों-निशान वहां नहीं बचा है, मित्रों..! क्यों..? ‘सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया’, ये मंत्र की साधना की है तब जा कर के ये हुआ है। और इसलिए भाइयों-बहनों, मैं कहना चाहता हूँ कि एक छोटी सी जमात इस राष्ट्र की मूल धारा को ललकारती रही है। हमने उसकी अनदेखी की है, उसके कारण हमें बहुत भुगतना पड़ा है। छोटी सी ही क्यों ना हो, लेकिन सात्विक शक्ति को हमें इतनी उभारनी होगी, ताकि इस प्रकार की विकृतियाँ अपने आप नष्ट हो जाएं।

आयुर्वेद तो यही कहता है..! और आज बहुत बड़ी सेवा की है आचार्य जी ने, इतने बड़े ग्रंथ दिए हैं। देखिए, हमारे यहाँ एक जमाना था, सारा विज्ञान ऋषियों के द्वारा ही आया हुआ है। हमारे ऋषि-मुनि जंगलों में तपस्या करते थे, उसी से तो हमारे सारे ग्रंथ बने थे..! उसी परंपरा की एक छोटी सी कड़ी के रूप में आज इस भूमि पर इतने समृद्घ ग्रंथों का लोकापर्ण किया है और मैंने आचार्य जी से प्रार्थना की है कि इसका डिजिटल फार्म हो ताकि दुनिया, नई पीढ़ी जरा इन्टरनेट पर जाकर देखें कि पेड़-पौधे क्या देते हैं, ये परमात्मा हमें क्या दे रहे हैं..! हमारे लिए सब चीजें मौजूद हैं, उसको जोड़ने का काम आचार्य जी ने इन ग्रंथों के माध्यम से किया है। आने वाली पीढ़ी के लिए सदियों तक काम आने वाला ये उत्तम काम इन्होंने किया है। मैं आपका अभिनंदन करता हूँ, मैं पतंजली योगपीठ का अभिनंदन करता हूँ कि उन्होंने हमारी जो मूलभूत शक्ति है उस पर अत्यन्त भरोसा करते हुए उसका पुनर्जागरण करने का एक अभियान उठाया है..!

भाइयो और बहनों, आज मुझे एक सम्मान पत्र दिया गया। मैं अपने आप से पूछता हूँ कि क्या मैं इसके योग्य हूँ..? मेरी आत्मा कहती है कि नहीं, मैं इसके लिए कत्तई योग्य नहीं हूँ..! लेकिन संत तो मन से माँ के रूप होते हैं, संतों के भीतर माँ का एक विराट रूप का अस्तित्व होता है। और जो संतों के निकट जाता है, उसको संतों की भीतर का जो मातृत्व होता है उसकी अनुभूति होती है। और माँ अपने बच्चे को जब वो चल नहीं पाता है, तो उंगली पकड़ कर चलो-चलो, दौड़ो-दौड़ो, अब बहुत पास में है, ऐसे खींच कर ले जाती है। माँ को मालूम होता है कि बच्चा दौड़ नहीं पाएगा, फिर भी माँ पुचकारती है कि अरे दौड़ो-दौड़ो, आ जाओ-आ जाओ... ऐसा करके दौड़ाती है..! मुझे लगता है कि मेरी दौड़ कुछ कम पड़ रही है, मुझे लगता है कि अभी भी मुझमें कुछ कमियाँ हैं और संतो ने आज मुझे एक अलग ढंग से इंगित किया है कि बेटे, ये सब तुम्हे अभी पूरा करना बाकी है..! ये सम्मान पत्र नहीं है, ये आदेश पत्र है और मेरे लिए ये प्रेरणा पुष्प है..! ये प्रेरणा पुष्प मुझे हर पल कमियों से मुक्ति पाने की ताकत दे..! और मैं संतों से खुले आम कहता हूँ, बुरा मत मानना संतों, मुझे संतों से वो आशीर्वाद नहीं चाहिए जो किसी पद के लिए होते हैं, नहीं चाहिए..! हम उसके लिए पैदा नहीं हुए हैं। मुझे संतो से आशीर्वाद चाहिए और इसलिए चाहिए कि मैं कभी कुछ गलत ना करूँ, मेरे हाथों से कुछ गलत ना हो जाए, मेरे हाथों से किसी का बुरा ना हो जाए..! संत मुझे वो आशीर्वाद दें, गंगा मैया मुझे वो सामर्थ्य दे, राजाधिराज हिमालय मुझे वो प्रेरणा दे और आप सब जनता जर्नादन ईश्वर का रूप होती है, मैं उसके चरणों में नतमस्तक होता हूँ और मैं ईश्चर के चरणों में नमन करता हूँ ताकि 125 करोड़ नागरिकों की तरह एक नागरिक के नाते हम भी कभी भी किसी का बुरा ना करें, किसी के लिए बुरा ना सोचें और जो महान कार्य के लिए यज्ञ चल रहे हैं... आप देखिए, कितनी बड़ी शिक्षा संस्था चला रहे हैं..! मैं तो यहाँ हरिद्वार की धरती पर इस शुभ अवसर पर बाबा रामदेव जी से प्रार्थना करता हूँ कि हिन्दुस्तान में संतों के द्वारा शिक्षा के जो काम हो रहे हैं, एक बार यहीं पर उनका सबसे बड़ा मेला लगना चाहिए और लोग देखें कि कोई पाँच लाख बच्चों को पढ़ा रहा है, कोई दो लाख बच्चों को पढ़ा रहा है और सब संस्कार और शिक्षण दोनों की चिंता कर रहे हैं..! ये छोटे काम नहीं है मित्रों, ये राष्ट्र निर्माण की अमूल्य सेवा है, जो इन महापुरूषों के द्वारा हो रही है..! हम कम से कम देखें तो सही, समझें तो सही, उनका गौरवगान तो करें..! लेकिन नहीं, अगर उनकी राजनीतिक उठापटक में इसका कोई मेल नहीं बैठता है, तो पता नहीं क्या कुछ कह देते हैं..! मैं हैरान हूँ, बाबा रामदेव के लिए क्या-क्या शब्द प्रयोग किए हैं इन लोगों ने, क्या-क्या शब्द बोले हैं, मैं सोच नहीं सकता हूँ, मित्रों..! मन में बड़ी पीड़ा होती है। ईश्वर से हम प्रार्थना करें कि हम सत्संकल्प लिए आगे बढ़ें और स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जंयति के निमित्त उनके सपनों को पूर्ण करने के लिए ऐसा भारत बनाने के लिए पूरी शक्ति और सामर्थ्य का अनुभव करें, इसी एक प्रार्थना के साथ फिर एक बार इस अवसर पर मुझे आने का अवसर मिला, जीवन की धन्यता के साथ उस ऋण को स्वीकार करते हुए, मैं सभी के चरणों में वंदन करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ..!

भारत माता की जय..!

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Text of PM’s reply to the motion of thanks on the President's Address in the Lok Sabha
February 08, 2023
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“President in the visionary address to both Houses gave direction to the nation”
“There is positivity and hope towards India at a global level”
“Today reforms are not carried out of compulsion but by conviction”
India under UPA was called the ‘Lost Decade’ while today people are calling the present decade as ‘India’s Decade’”
“India is the mother of democracy, constructive criticism is vital for a strong democracy and criticism is like a ‘shuddhi yagya’”
“Instead of constructive criticism, some people indulge in compulsive criticism
“The blessings of 140 crore Indians is my ‘Suraksha Kavach’”
“Our government has addressed the aspirations of the middle class. We have honoured them for their honesty.”
“Indian society has the capability to deal with negativity but it never accepts this negativity”

आदरणीय अध्यक्ष जी,

सबसे पहले मैं राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद करता हूं और ये मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे पहले भी कई बार राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद करने का अवसर मिला है। लेकिन इस बार मैं धन्यवाद के साथ-साथ राष्ट्रपति महोदया जी का अभिनंदन भी करना चाहता हूं। अपनी विजनरी भाषण में राष्ट्रपति जी ने हम सबका और करोड़ो देशवासियों का मार्गदर्शन किया है। गणतंत्र के मुखिया रूप में उनकी उपस्थिति ऐतिहासिक भी है और देश की कोटि-कोटि बहन-बेटियों के लिए बहुत बड़ा प्रेरणा का अवसर भी है।

आदरणीय राष्ट्रपति महोदया ने आदिवासी समाज का गौरव तो बढ़ाया ही है लेकिन आज आजादी के इतने सालों के बाद आदिवासी समाज में जो गौरव की अनुभूति हो रही है, उनका जो आत्मविश्वास बढ़ा है और इसके लिए ये सदन भी और देश भी उनका आभारी होगा। राष्ट्रपति जी के भाषण में ‘संकल्प से सिद्धि तक यात्रा का बहुत बढ़िया तरीके से एक खाका खींचा गया एक प्रकार से देश को अकाउंट भी दिया गया, इंस्पिरेशन भी दिया गया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी यहां पर सभी माननीय सदस्यों ने इस चर्चा में हिस्सा लिया, हर किसी ने अपने-अपने आंकड़े दिए, अपने-अपने तर्क दिए और अपनी रुचि, प्रवृत्ति के अनुसार सबने अपनी बातें रखी और जब इन बातों को गौर से सुनते हैं, उसे समझने का जब प्रयास करते हैं तो ये भी ध्यान में आता है कि किसकी कितनी क्षमता है, किसकी कितनी योग्यता है, किसकी कितनी समझ है और किसका क्या इरादा है। ये सारी बातें प्रकट होती ही हैं। और देश भली-भांति तरीके से उसका मूल्यांकन भी करता है। मैं चर्चा में शामिल सभी माननीय सदस्यों का ह्दय से आभार व्यक्त करता हूं। लेकिन मैं देख रहा था कल कुछ लोगों के भाषण के बाद पूरा Ecosystem, समर्थक उछल रहा था और कुछ लोग तो खुश होकर के कह रहे थे, ये हुई न बात। बड़ा शायद नींद भी अच्छी आई होगी, शायद आज उठ भी नहीं पाए होंगे। और ऐसे लोगों के लिए कहा गया है, बहुत अच्छे ढंग से कहा गया है-

ये कह-कहकर हम दिल को बहला रहे हैं,

ये कह-कहकर के हम दिल को बहला रहे हैं, वो अब चल चुके हैं,

वो अब चल चुके हैं, वो अब आ रहे हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

जब राष्ट्रपति जी का भाषण हो रहा था, कुछ लोग कन्नी भी काट गए और एक बड़े नेता महामहिम राष्ट्रपति जी का अपमान भी कर चुके हैं। जनजातीय समुदाय के प्रति नफरत भी दिखाई दी है और हमारे जनजातीय समाज के प्रति उनकी सोच क्या है। लेकिन जब इस प्रकार की बातें टीवी के सामने कही गई तो भीतर पड़ा हुआ जो नफरत का भाव था जो सच वो बाहर आकर ही रहा गया। ये खुशी है, ठीक है बाद में चिट्ठी लिखकर के बचने की कोशिश तो की गई है।

माननीय अध्यक्ष जी।

जब राष्ट्रपति जी के भाषण पर चर्चा मैं सुन रहा था, तो मुझे लगा कि बहुत सी बातों को मौन रहकर भी स्वीकार किया गया है। यानी एक प्रकार से सबके भाषण में सुनता था, तब लगा कि राष्ट्रपति जी के भाषण के प्रति किसी को एतराज नहीं है, किसी ने उसकी आलोचना नहीं की। भाषण की हर बात, अब देखिए क्या कहा है राष्ट्रपति जी ने मैं उन्हीं के शब्द को क्वोट करता हूं। राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में कहा था, जो भारत कभी अपनी अधिकांश समस्याओं के समाधान के लिए दूसरों पर निर्भर था, वही आज दुनिया की समस्याओं के समाधान का माध्यम बन रहा है। राष्ट्रपति जी ने यह भी कहा था, जिन मूल सुविधाओं के लिए देश की एक बड़ी आबादी ने दशकों तक इंतजार किया, वे इन वर्षों में उसे मिली है। बड़े-बड़े घोटालों, सरकारी योजनाओं में भ्रष्ट्राचार की जिन समस्याओं से देश मुक्ति चाहता था, वह मुक्ति अब देश को मिल रही है। पॉलिसी-पैरालिसिस की चर्चा से बाहर आकर आज देश और देश की पहचान, तेज विकास और दूरगामी दृष्टि से लिए गए फैसलों के लिए हो रही है। ये पैराग्राफ जो मैं पढ़ रहा हूं वो राष्ट्रपति जी भाषण के पैराग्राफ को मैं क्वोट कर रहा हूं। और मुझे आशंका था कि ऐसी-ऐसी बातों पर यहां जरूर एतराज करने वाले तो कुछ लोग निकलेंगे, वो विरोध करेंगे कि ऐसा कैसे बोल सकते हैं राष्ट्रपति जी। लेकिन मुझे खुशी है किसी ने विरोध नहीं किया सबने स्वीकार किया, सबने स्वीकार किया। और माननीय अध्यक्ष जी मैं 140 करोड़ देशवासियों का आभारी हूं कि सबके प्रयास के परिणाम आज इन सारी बातों को पूरे सदन में स्वीकृति मिली है। इससे बड़ा गौरव का विषय क्या होगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी। सदन में हंसी-मजाक, टीका-टिप्पणी, नोक-झोंक ये तो होता रहता है। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि आज राष्ट्र के रूप में गौरवपूर्ण अवसर हमारे सामने खड़े हैं, गौरव के क्षण हम जी रहे हैं। राष्ट्रपति जी के पूरे भाषण में जो बातें हैं वो 140 करोड़ देशवासियों के सेलिब्रेशन का अवसर है, देश ने सेलिब्रेट किया है।

माननीय अध्यक्ष जी। 100 साल में आई हुई ये भयंकर बीमारी, महामारी दूसरी तरफ युद्ध की स्थिति, बंटा हुआ विश्व इस स्थिति में भी, इस संकट के माहौल में भी देश को जिस प्रकार से संभाला गया है, देश जिस प्रकार से संभला है इससे पूरा देश आत्मविश्वास से भर रहा है, गौरव से भर रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी। चुनौतियों के बिना जीवन नहीं होता है, चुनौतियां तो आती हैं। लेकिन चुनौतियों से ज्यादा सामर्थ्यवान है 140 करोड़ देशवासियों का जज्बा। 140 करोड़ देशवासियों का सामर्थ्य चुनौतियों से भी ज्यादा मजबूत है, बड़ा है और सामर्थ्य से भरा हुआ है। इतनी बड़ी भयंकर महामारी, बंटा हुआ विश्व युद्ध के कारण हो रहे विनाश, अनेकों देशों में अस्थिरता का माहौल है। कई देशों में भीषण महंगाई है, बेरोजगारी, खाने-पीने का संकट और हमारे अड़ोस-पड़ोस में भी जिस प्रकार से हालत बनी हुई है, ऐसी स्थिति में माननीय अध्यक्ष जी कौन हिन्दुस्तानी इस बात पर गर्व नहीं करेगा कि ऐसे समय में भी देश दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना है। आज पूरे विश्व में भारत को लेकर के पॉजिटिविटी है, एक आशा है, भरोसा है। और माननीय अध्यक्ष जी ये भी खुशी की बात है कि आज भारत को विश्व के समृद्ध देश ऐसे जी-20 समूह की अध्यक्षता का अवसर भी मिला है।

ये देश के लिए गर्व की बात है। 140 करोड़ देशवासियों के लिए गौरव की बात है। लेकिन मुझे लगता है, पहले मुझे नहीं लगता था, लेकिन अभी लग रहा है शायद इससे भी कुछ लोगों को दुख हो रहा है। 140 करोड़ देशवासियों में किसी को दुख नहीं हो सकता है। वो आत्मनिरीक्षण करें वो कौन लोग हैं जिसको इसका भी दु:ख हो रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

आज दुनिया की हर विश्वसनीय संस्था, सारे एक्सपर्ट्स जो वैश्विक प्रभावों को बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं। जो भविष्य का अच्छे से अनुमान भी लगा सकते हैं। उन सबको आज भारत के प्रति बहुत आशा है, विश्वास है और बहुत एक मात्रा में उमंग भी है। और आखिर ये सब क्यों? ऐसे ही तो नहीं है। आज पूरी दुनिया भारत की तरफ इस प्रकार से बड़ी आशा की नजरों से क्यों देख रही है। इसके पीछे कारण है। इसका उत्तर छिपा है भारत में आई स्थिरता में, भारत की वैश्विक साख में, भारत के बढ़ते सामर्थ्य में और भारत में बन रही नई संभावनाओं में है।

माननीय अध्यक्ष जी,

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में जो बातें हो रही हैं। उसी को मैं अगर शब्दबद्ध करूं और कुछ बातें उदाहरण से समझाने की कोशिश करुं। अब आप देखिए भारत में एक दो तीन दशक अस्थिरता के रहे हैं। आज स्थिरता है, political stability है, Stable Government भी है और Decisive Government है, और उसका भरोसा स्वाभाविक होता है। एक निर्णायक सरकार, एक पूर्ण बहुमत से चलने वाली सरकार वो राष्ट्र हित में फैसले लेने का सामर्थ्य रखती है। और ये वो सरकार है Reform out of compulsion नहीं Reform out of conviction हो रही है। और हम इस मार्ग पर हटने वाले नहीं है चलते रहेंगे। देश को समय की मांग के अनुसार जो चाहिए वो देते रहेंगे।

माननीय अध्यक्ष जी,

एक और उदाहरण की तरफ मैं जाना चाहूंगा। इस कोरोना काल में मेड इन इंडिया वैक्सीन तैयार हुई। भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चलाया और इतना ही नहीं अपने करोड़ों नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन के टीके लगाए। इतना ही नहीं 150 से ज्यादा देशों को इस संकट के समय हमने जहां जरूरत थी, वहां दवाई पहुंचाई, जहां जरूरत थी, वहां वैक्सीन पहुंचाई। और आज विश्व के कई देश हैं, जो भारत के विषय में इस बात पर बड़े गौरव से विश्व के मंच पर धन्यवाद करते हैं, भारत का गौरव गान करते हैं। उसी प्रकार से तीसरे एक पहलू की तरफ ध्यान दें। इसी संकट काल में आज भारत का digital infrastructure जिस तेजी से digital infrastructure ने अपनी ताकत दिखाई है। एक आधुनिकता की तरफ बदलाव किया है। पूरा विश्व इसका अध्ययन कर रहा है। मैं पिछले दिनों जी-20 समिट में बाली में था। Digital India की चारों तरफ वाहवाही हो रही थी। और बहुत curiosity थी कि देश कैसे कर रहा है? कोरोना काल में दुनिया के बड़े-बड़े देश, समृद्ध देश अपने नागरिकों को आर्थिक मदद पहुंचाना चाहते थे। नोटें छापते थे, बांटते थे, लेकिन बांट नहीं पाते थे। ये देश है जो एक फ्रिक्शन ऑफ सेकंड में लाखों करोड़ों रुपये देशवासियों के खाते में जमा करवा देता है। हजारों करोड़ रुपये ट्रांसफर हो जाते हैं। एक समय था, छोटी-छोटी टेक्नोलॉजी के लिए देश तरसता था। आज देश में बहुत बड़ा फर्क महसूस हो रहा है। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में देश बड़ी ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। CoWin दुनिया के लोग अपने वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट भी दे नहीं पाते थे जी। आज वैक्सीन का हमारे मोबाइल फोन पर हमारा सर्टिफिकेट दूसरी सेकंड पर अवेलेबल है। ये ताकत हमनें दिखाई है।

माननीय अध्यक्ष जी,

भारत में नई संभावनाएं हैं। दुनिया को सशक्त value और supply chain उसमें आज पूरी दुनिया ने इस कोरोना कालखंड ने supply chain के मुद्दे पर दुनिया को हिला कर रख दिया है। आज भारत उस कमी को पूरा करने की ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। कईयों को ये बात समझने में बहुत देर लग जाएगी, अध्यक्ष जी। भारत आज इसी दिशा में एक manufacturing hub के रूप में उभर रहा है और दुनिया भारत की इस समृद्धि में अपनी समृद्धि देख रही है।

माननीय अध्यक्ष जी,

निराशा में डूबे हुए कुछ लोग इस देश की प्रगति को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें भारत के लोगों की उपलब्धियां नहीं दिखती है। अरे 140 करोड़ देशवासियों के पुरुषार्थों पर आस्था का परिणाम है, जिसके कारण आज दुनिया में डंका बजना शुरू हुआ है। उन्हें भारत के लोगों के पुरुषार्थ परिश्रम से प्राप्त उपलब्धियां उनको नजर नहीं आ रही है।

माननीय अध्यक्ष जी,

पिछले 9 वर्ष में भारत में 90 हजार स्टार्टअप्स और आज स्टार्टअप्स की दुनिया में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच चुके हैं। एक बहुत बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम आज देश के Tier 2, Tier 3 cities में भी पहुंच चुका है। हिन्दुस्तान के हर कोने में पहुंचा है। भारत के युवा सामर्थ्य की पहचान बनता जा रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

इतने कम समय में और कोरोना के विकट कालखंड में 108 यूनिकॉर्न बने हैं। और एक यूनिकॉर्न का मतलब होता है, उसकी वैल्यू 6-7 हजार करोड़ से ज्यादा होती है। ये इस देश के नौजवानों ने करके दिखाया है।

माननीय अध्यक्ष जी,

आज भारत दुनिया में mobile manufacturing में दुनिया में दूसरे बड़ा देश बन गया है। घरेलू विमान यात्री domestic Air Traffic पर हैं। आज विश्व में हम तीसरे नंबर पर पहुंच चुके हैं। Energy Consumption को प्रगति का एक मानदंड माना जाता है। आज भारत Energy consumption में दुनिया में consumer के रूप में तीसरे नंबर पर हम पहुंच चुके हैं। Renewable Energy की capacity में हम दुनिया में चौथे नंबर पर पहुंच चुके हैं। स्पोर्ट्स कभी हमारी कोई पूछ नहीं होती थी, कोई पूछता नहीं था। आज स्पोर्ट्स की दुनिया में हर स्तर पर भारत की खिलाड़ी अपना रुतबा दिखा रहे हैं। अपना सामर्थ्य दिखा रहे हैं।

Education समेत हर क्षेत्र में आज भारत आगे बढ़ रहा है। पहली बार माननीय अध्यक्ष जी, गर्व होगा, पहली बार higher education में enrolment वालों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा हो गई है। इतना ही नहीं, बेटियों की भी भागीदारी बराबर होती जा रही है। देश में इंजीनियरिंग हो, मेडिकल कॉलेज हो, professional colleges हों उसकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। स्पोर्ट्स के अंदर भारत का परचम ओलंपिक हो, कॉमनवेल्थ हो, हर जगह पर हमारे बेटे, हमारी बेटियों ने शानदार प्रदर्शन किया है।

माननीय अध्यक्ष जी,

किसी भी भारतीय को ऐसी अनेक बातें मैं गिना सकता हूँ। राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में कई बातें कही हैं। देश में हर स्तर पर, हर क्षेत्र में, हर सोच में, आशा ही आशा नजर आ रही है। एक विश्वास से भरा हुआ देश है। सपने और संकल्प लेकर के चलने वाला देश है। लेकिन यहाँ कुछ लोग ऐसे निराशा में डूबे हैं, काका हाथरसी ने एक बड़ी मजेदार बात कही थी। काका हाथरसी ने कहा था-

'आगा-पीछा देखकर क्यों होते गमगीन, जैसी जिसकी भावना वैसा दीखे सीन'।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आखिर ये निराशा भी ऐसी नहीं आई है, इसके पीछे एक कारण है। एक तो जनता का हुकुम, बार-बार हुकुम, लेकिन साथ-साथ इस निराशा के पीछे जो अंतर्मन में पड़ी हुई चीज़ है, जो चैन से सोने नहीं देती है, वो क्या है, पिछले 10 साल में, 2014 के पहले 2004 से 2014, भारत की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो गई। निराशा नहीं होगी तो क्या होगा? 10 साल में महंगाई डबल डिजिट रही, और इसलिए कुछ अगर अच्छा होता है तो निराशा और उभर करके आती है और जिन्होंने बेरोजगारी दूर करने के वादे किए थे।

माननीय अध्यक्ष जी,

एक बार जंगल में दो नौजवान शिकार करने के लिए गए और वो गाड़ी में अपनी बंदूक-वंदूक नीचे उतार करके थोड़ा टहलने लगे। उन्होंने सोचा कि थोड़ा अभी आगे चलना है तो थोड़ा हाथ-पैर ठीक कर लें। लेकिन गए थे तो बाघ का शिकार करने के लिए और उन्होंने देखा कि आगे जाएंगे तो बाघ मिलेगा। लेकिन हुआ ये कि वहीं पर बाघ दिखाई दिया, अभी नीचे उतरे थे। अपनी गाड़ी में बंदूक-वंदूक वहीं पड़ी थी। बाघ दिखा, अब करें क्या? तो उन्होंने licence दिखाया कि मेरे पास बंदूक का licence है। इन्होंने भी बेरोजगारी दूर करने के नाम पर कानून दिखाया कि कानून बना दिया है जी। अरे देखो, कानून बना दिया है। यही इनके तरीके हैं, पल्ला झाड़ दिया। 2004 से 2014, आजादी के इतिहास में सबसे घोटालों का दशक रहा, सबसे घोटालों का। वही 10 साल, UPA के वो 10 साल, कश्मीर से कन्याकुमारी, भारत के हर कोने में आतंकवादी हमलों का सिलसिला चलता रहा, 10 साल। हर नागरिक असुरक्षित था, चारों तरफ यही सूचना रहती थी कि कोई अंजानी चीज़ को हाथ मत लगाना। अंजानी चीज़ से दूर रहना, वहीं खबरें रहती थी। 10 साल में जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक हिंसा ही हिंसा देश उनका शिकार हो गया था। उन 10 साल में, भारत की आवाज ग्लोबल प्लैटफॉर्म पर इतनी कमजोर थी कि दुनिया सुनने तक तैयार नहीं थी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इनकी निराशा का कारण ये भी है आज जब देश की क्षमता का परिचय हो रहा है, 140 करोड़ देशवासियों का सामर्थ्य खिल रहा है, खुलकर के सामने आ रहा है। लेकिन देश का सामर्थ्य तो पहले भी था। लेकिन 2004 से लेकर के 2014 तक इन्होंने वो अवसर गंवा दिया। और UPA की पहचान बन गई हर मौके को मुसीबत में पलट दिया। जब technology information का युग बड़ी तेजी से बढ़ रहा था, उछल रहा था, उसी समय ये 2जी में फंसे रहे, मौका मुसीबत में। सिविल न्यूक्लियर डील हुआ, जब सिविल न्यूक्लियर डील की चर्चा थी, तब ये कैश फॉर वोट में फंसे रहे। ये खेल चले।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

2010 में, कॉमनवेल्थ गेम्स हुए, भारत को दुनिया के सामने, भारत के युवा सामर्थ्य को प्रस्तुत करना एक बहुत बड़ा अवसर था। लेकिन फिर मौका मुसीबत में और CWG घोटाले में पूरा देश दुनिया में बदनाम हो गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

ऊर्जा का किसी भी देश के विकास में अपना एक महात्म्य होता है। और जब दुनिया में भारत की ऊर्जा शक्ति के उभार की दिशा में चर्चा की जरूरत थी, इस सदी के दूसरे दशक में हिन्‍दुस्‍तान की चर्चा ब्लैकआउट के नाते हुई। पूरे विश्व में ब्लैकआउट के वो दिन चर्चा के केंद्र में आ गए। कोयला घोटाला चर्चा में आ गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

देश पर इतने आतंकी हमले हुए। 2008 के हमलों को कोई भूल नहीं सकता है। लेकिन आतंकवाद पर सीना तानकर आंख में आंख मिलाकर के हमले करने का सामर्थ्य नहीं था, उसकी चुनौती को चुनौती देने की ताकत नहीं थी और उसके कारण आतंकवादियों के हौसले बुलंद होते गए, और पूरे देश में दस साल तक खून बहता रहा, मेरे देश के निर्दोष लोगों का, वो दिन रहे थे।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब एलओसी, एलएसी भारत के सामर्थ्य की ताकत का अवसर रहता था, उस समय डिफेंस डील को ले करके हेलिकॉप्टर घोटाले, और सत्ता को कंट्रोल करने वाले लोगों के नाम उसमें चिह्नित हो गए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब देश के लिए जरूरत थी और निराशा के मूल में ये चीजें पड़ी हुई हैं, सब उभर करके आ रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस बात को हिंदुस्तान हर पल याद रखेगा कि 2014 के पहले का जो दशक था, The Lost Decade के रूप में जाना जाएगा और इस बात को इंकार नहीं कर सकते कि 2030 का जो दशक है, ये India's Decade है पूरे विश्व के लिए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

लोकतंत्र में आलोचना का बहुत महत्व मैं मानता हूं। और मैं हमेशा मानता हूं कि भारत जो कि Mother of democracy है, सदियों से हमारे यहां लोकतंत्र हमारी रंगों में पनपा हुआ है। और इसलिए मैं हमेशा मानता हूं कि आलोचना एक प्रकार से लोकतंत्र की मजबूती के लिए, लोकतंत्र के संवर्धन के लिए, लोकतंत्र के स्पिरिट के लिए, आलोचना एक शुद्धि यग्न है। उस रूप में हम आलोचना को देखने वाले हैं। लेकिन दुर्भाग्य से बहुत दिनों से मैं इंतजार कर रहा हूं कोई तो मेहनत करके आएगा, कोई तो एनालिसिस करे तो कोई आलोचना करेगा ताकि देश को कुछ लाभ हो। लेकिन 9 साल आलोचना ने आरोपों में गंवा दिए इन्होंने। सिवाय आरोप, गाली-गलौच, कुछ भी बोल दो, इसके सिवाय कुछ नहीं किया। गलत आरोप और हाल ये चुनाव हार जाओ-ईवीएम खराब, दे दो गाली, चुनाव हार जाओ-चुनाव आयोग को गाली दे दो, क्या तरीका है। अगर कोर्ट में फैसला पक्ष में नहीं आया तो सुप्रीम कोर्ट को गाली दे दो, उसकी आलोचना कर दो।

माननीय अध्यक्ष जी,

अगर भ्रष्टाचार की जांच हो रही है तो जांच एजेंसियों को गाली दो। अगर सेना पराक्रम करे, सेना अपना शौर्य दिखाए और वो narrative देश के जन-जन के अंदर एक नया विश्वास पैदा करें तो सेना की आलोचना करो, सेना को गाली दो, सेना पर आरोप करो।

कभी आर्थिक, देश की प्रगति की खबरें आएं, आर्थिक प्रगति की चर्चा हो, विश्व के सारे संस्थान भारत का आर्थिक गौरवगान करें तो यहां से निकलो, आरबीआई को गाली दो, भारत के आर्थिक संस्‍थानों को गाली दो।

माननीय अध्यक्ष जी,

पिछले नौ साल हमने देखा है कुछ लोगों की bankruptcy को देखा है। एक constructive criticism की जगह compulsive critics ने ले ली है और compulsive critics इसी में डूबे हुए हैं, खोए हुए हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

सदन में भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों के बारे में बहुत कुछ कहा गया और मैंने देखा कि बहुत सारे विपक्ष के लोग इस विषय में सुर में सुर मिला रहे थे। मिले मेरा-तेरा सुर।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मुझे लगता था देश की जनता देश के चुनाव के नतीजें ऐसे लोगों को जरूर एक मंच पर लाएंगे। लेकिन वो तो हुआ नहीं, लेकिन इन लोगों को ईडी का धन्यवाद करना चाहिए कि ईडी के कारण ये लोग एक मंच पर आए हैं। ईडी ने इन लोगों को एक मंच पर ला दिया है और इसलिए जो काम देश के मतदाता नहीं कर पाए।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं कई बार सुन रहा हूँ, यहां कुछ लोगों को Harvard Study का बड़ा क्रेज है। कोरोना काल में ऐसा ही कहा गया था और कांग्रेस ने कहा था कि भारत की बर्बादी पर Harvard में Case Study होगी, ऐसा कहा था और कल फिर सदन में Harvard University में Study की बात कल फिर हुई, लेकिन माननीय अध्यक्ष जी बीते वर्षों में Harvard में एक बहुत बढ़िया Study हुई है, बहुत important study हुई है। और वो स्‍टडी है, उसका टॉपिक क्‍या था मैं जरूर सदन को बताना चाहूंगा और ये स्‍टडी हो चुकी है। स्‍टडी है The Rise and Decline of India’s Congress Party, ये स्‍टडी हो चुका है और मुझे विश्वास है अध्यक्ष जी, मुझे विश्वास है भविष्य में कांग्रेस की बर्बादी पर सिर्फ Harvard नहीं, बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में अध्ययन होना ही होना है और डूबाने वाले लोगों पर भी होने वाला है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस प्रकार के लोगों के लिए दुष्यंत कुमार ने बहुत बढ़िया बात कही है और दुष्यंत कुमार ने जो कहा है बहुत फिट बैठता है उन्होंने कहा है:-

‘तुम्हारे पाँव के नीचे, कोई जमीन नहीं,

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं’।

आदरणीय अध्यक्ष जी

ये लोग बिना सिर-पैर की बात करने के आदी होने के कारण उनको ये भी याद नहीं रहता है वो खुद का कितना contradiction करते हैं। कभी एक बात-कभी दूसरी बात, कभी एक तरफ, कभी दूसरी तरफ हो सकता है वो आत्मचिंतन करके खुद के अंदर जो विरोधाभास है उसको भी तो ठीक करेंगे। अब 2014 से ये लगातार कोस रहे हैं हर मौके पर कोस रहे हैं भारत कमजोर हो रहा है, भारत की कोई सुनने को तैयार नहीं है, भारत का दुनिया में कोई वजूद ही नहीं रहा न जाने क्या- क्या कहा और अब क्या कह रहे हैं। अब कह रहे हैं कि भारत इतना मजबूत हो गया है कि दूसरे देशों को धमकाकर फैसले करवा रहा है। अरे पहले यह तो तय करो भई कि भारत कमजोर हुआ है कि मजबूत हुआ है।

माननीय अध्यक्ष जी

कोई भी जीवंत संगठन होता है, अगर जीवंत व्यवस्था होती है जो जमीन से जुड़ी हुई व्यवस्था होती है वे जनता-जनार्दन में क्या चलता है लोगों के अंदर उसका चिंतन करता है, उससे कुछ सीखने की कोशिश करता है और अपनी राह भी समय रहते हुए बदलता रहता है। लेकिन जो अहंकार में डूबे होते है, जो बस सब कुछ हम ही को ज्ञान है सब कुछ हमारा ही सही है ऐसी जो सोच में जीते हैं, उनको लगता है कि मोदी को गाली देकर ही हमारा रास्ता निकलेगा। मोदी पर झूठे अनाप-शनाप कीचड़ निकालकर ही रास्ता निकलेगा। अब 22 साल बीत गए वो गलतफहमी पालकर के बैठे हुए है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

मोदी पे भरोसा अखबार की सुर्खियों से पैदा नहीं हुआ है। मोदी पे ये भरोसा टीवी पर चमकते चेहरों से नहीं हुआ है। जीवन खपा दिया है पल-पल खपा दिए है। देश के लोगों के लिए खपा दिए हैं, देश के उज्जवल भविष्य के लिए खपा दिए है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जो देशवासियों का मोदी पर भरोसा है, ये इनकी समझ के दायरे से बाहर है और समझ के दायरे से भी काफी ऊपर है। क्या ये झूठे आरोप लगाने वालों पर मुफ्त राशन प्राप्त करने वाले मेरे देश के 80 करोड़ देशवासी क्या कभी उन पर भरोसा करेंगे क्या।

आदरणीय अध्यक्ष जी

वन नेशन वन राशन कार्ड देशभर में कहीं पर भी गरीब से गरीब को भी अब राशन मिल जाता है। वो आपकी झूठी बातों पर, आपके गलत गलीच आरोपों पर कैसे भरोसा करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जिस किसान के खाते में साल में 3 बार पीएम किसान सम्मान निधि के 11 करोड़ किसानों के खाते में पैसे जमा होते हैं, वो आपकी गालियां, आपके झूठे आरोपों पर विश्वास कैसे करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

जो कल फुटपाथ पर जिंदगी जीने के लिए मजबूर थे, जो झुग्गी-झोपड़ी में जिंदगी बसर करते थे, ऐसे 3 करोड़ से ज्यादा लोगों को पक्के घर मिले हैं उनको तुम्हारी ये गालियां, ये तुम्हारी झूठी बातें क्यों वो भरोसा करेगा अध्यक्ष जी।

आदरणीय अध्यक्ष जी

9 करोड़ लोगों को मुफ्त गैस के कनेक्शन मिला है वो आपके झूठ को कैसे स्वीकार करेगा। 11 करोड़ बहनों को इज्जत घर मिला है, शौचालय मिला है वो आपके झूठ को कैसे स्वीकार करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

आजादी के 75 साल बीत गए 8 करोड़ परिवारों को आज नल से जल मिला है, वो माताएं तुम्हारे झूठ को कैसे स्वीकार करेगी, तुम्हारी गलतियों को, गालियों को कैसे स्वीकार करेगी। आयुष्मान भारत योजना से 2 करोड़ परिवारों को मदद पहुंची है जिंदगी बच गई है उनकी मुसीबत के समय मोदी काम आया है, तुम्हारी गालियों को वो कैसे स्वीकार करेगा, कैसे स्वीकार करेगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी

आपकी गालियां, आपके आरोपों को इन कोटि-कोटि भारतीयों से होकर के गुजरना पड़ेगा, जिनको दशकों तक मुसीबतों में जिंदगी जीने के लिए तुमने मजबूर किया था।

आदरणीय अध्यक्ष जी

कुछ लोग अपने लिए, अपने परिवार के लिए बहुत कुछ तबाह करने पर लगे हुए हैं। अपने लिए, अपने परिवार के लिए जी रहे हैं मोदी तो 25 करोड़ देशवासियों के परिवार का सदस्य है।

आदरणीय अध्यक्ष जी

140 करोड़ देशवासियों के आशीर्वाद ये मेरा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। और गालियों के शस्त्र से, झूठ के शस्त्र-अस्त्रों से इस सुरक्षा कवच को तुम कभी भेद नहीं सकते हो। वो विश्वास का सुरक्षा कवच है और इन शस्त्रों से तुम कभी भेद नहीं सकते हो।

आदरणीय अध्यक्ष जी

हमारी सरकार कुछ बातों के लिए प्रतिबद्ध है। समाज के वंचित वर्ग को वरीयता उस संकल्प को लेकर के हम जी रहे हैं, उस संकल्प को लेकर के चल रहे हैं। दशकों तक दलित, पिछड़े, आदिवासी जिस हालत में उनको छोड़ दिया गया था। वो सुधार नहीं आया जो संविधान निर्माताओं ने सोचा था। जो संविधान निर्माताओं ने निर्दिष्ट किया था। 2014 के बाद गरीब कल्याण योजनाओं का सर्वाधिक लाभ मेरे इन्ही परिवारों को मिला है। दलित, पिछड़ों, आदिवासी की बस्तियों में पहली बार माननीय अध्यक्ष जी पहली बार बिजली पहुंची है। मीलों तक पानी के लिए जाना पड़ता था। पहली बार नल से जल पहुंच रहा है। इन परिवारों में पहुंच रहा है माननीय अध्यक्ष जी। अनेक परिवार, कोटि-कोटि परिवार पहली बार पक्के घर में आज जा पाए हैं। वहां रह पाए हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जो बस्तियां आपने छोड़ दी थी। आपके लिए चुनाव के समय ही जिसकी याद आती थी। आज सड़क हो, बिजली हो, पानी हो, इतना ही नहीं 4जी कनेक्टिविटी भी वहां पहुंच रही है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

पूरा देश गौरव कर रहा है। आज एक आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में जब देखते हैं। पूरा देश गौरवगान कर रहा है। आज देश में आधी जाति समूह के नर-नारी जिन्होंने मातृभूमि के लिए जीवन तर्पण कर दिए। आजादी के जंग का नेतृत्व किया उनका पुण्य स्मरण आज हो रहा है और हमारे आदिवासियों का गौरव दिवस मनाया जा रहा है। और हमें गर्व है कि ऐसी महान हमारी आदिवासी परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में एक महिला देश का नेतृत्व कर रही है, राष्ट्रपति के रूप में काम कर रही है। हमने उनका हक दिया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हम पहली बार देख रहे हैं। एक बात ये भी सही है। हम सबका समान अनुभव है सिर्फ मेरी ही है ऐसा नहीं है आपका भी है। हम सब जानते हैं कि जब मां सशक्त होती है, तो पूरा परिवार सशक्त होता है। परिवार सशक्त होता है तो समाज सशक्त होता है और तभी जाकर के देश सशक्त होता है। और मुझे संतोष है कि माताएं, बहनों, बेटियों की सबसे ज्यादा सेवा करने का सौभाग्य हमारी सरकार को मिला है। हर छोटी मुसीबत को दूर करने का प्रामाणिक पूर्वक प्रयास किया है। बड़ी संवेदनशीलता के साथ उस पर हमने ध्यान केंद्रित किया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

कभी-कभी मजाक उड़ाया जा रहा है। ऐसा कैसा प्रधानमंत्री है। लाल किले पर से टॉयलेट की बात करता है। बड़ा मजाक उड़ाया गया। आदरणीय अध्यक्ष जी, ये टॉयलेट, ये इज्जत घर, ये मेरी इन माताओं-बहनों की क्षमता, उनकी सुविधा, उनका सुरक्षा का सम्मान करने वाली बात है। इतना ही नहीं माननीय अध्यक्ष जी, जब मैं सेनेटरी पैड की बात करता हूं तो लोगों को लगता है अरे प्रधानमंत्री ऐसे विषयों में क्यों जाते हैं।

माननीय अध्यक्ष जी,

सेनेटरी पैड के अभाव में गरीब बहन-बेटियां क्या अपमान सहती थीं, बीमारियों का शिकार हो जाती थीं। माताओं-बहनों को धुएं में दिन के कई घंटे बिताने पड़ते थे। उनका जीवन धुएं में फंसा रहता था, उससे मुक्ति दिलाने का काम उन गरीब माताओं-बहनों के लिए यह सौभाग्य हमें मिला है। जिंदगी खप जाती थी। आधा समय पानी के लिए, आधा समय केरोसिन की लाइन के अंदर खपे रहते थे। आज उससे माताओं-बहनों को मुक्ति दिलाने का संतोष हमें मिला है।

माननीय अध्यक्ष जी,

जो पहले चलता था, अगर वैसा ही हम चलने देते शायद कोई हमें सवाल भी नहीं पूछता कि मोदी जी ये क्यों नहीं किया, वो क्यों नहीं किया क्योंकि देश को आपने ऐसी स्थिति में ला दिया था कि इससे बाहर निकल ही नहीं सकता था। वैसी निराशा में देश को झोंक कर रखा हुआ था। हमने उज्ज्वला योजना से धुएं से मुक्ति दिलाई, जल-जीवन से पानी दिया, बहनों के सशक्तिकरण के लिए काम किया। 9 करोड़ बहनों को सेल्फ हेल्प ग्रुप स्वयं सहायता समूह से जोड़ना। माइनिंग से लेकर के डिफेंस तक आज माताओं-बहनों को, बेटियों के लिए अवसर खोल दिए हैं। ये अवसर खोलने का काम हमारी सरकार ने किया है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

इस बात को हम याद करें, वोट बैंक की राजनीति ने देश के सामर्थ्य को कभी-कभी बहुत बड़ा गहरा धक्का पहुंचाया है। और उसी का परिणाम है कि देश में जो होना चाहिए, जो समय पर होना चाहिए था उसमें काफी देर हो गई। आप देखिए मध्यम वर्ग, लंबे समय तक मध्यम वर्ग को पूरी तरह नकार दिया गया। उसकी तरफ देखा तक नहीं गया। एक प्रकार से वो मान के चला कि हमारा कोई नहीं, अपने ही बलबूते पर जो हो सकता है करते चलो। वो अपनी पूरी शक्ति बेचारा खपा देता था। लेकिन हमारी सरकार, एनडीए सरकार ने मध्यम वर्ग की ईमानदारी को पहचाना है। उन्हें सुरक्षा प्रदान की है और आज हमारा परिश्रमी मध्यम वर्ग देश को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। सरकारी की विभिन्न योजनाओं से मध्यम वर्ग को कितना लाभ हुआ है माननीय अध्यक्ष जी, मैं उदाहरण देता हूं 2014 से पहले जीबी डेटा क्योंकि आज युग बदल चुका है। ऑनलाइन दुनिया चल रही है। हरेक के हाथ में मोबाइल पड़ा हुआ है। कुछ लोगों के जेब फटे हुए हो तो भी मोबाइल तो होता ही है।

आदरणीय अध्यक्ष जी, 2014 के पहले जीबी डेटा की कीमत 250 रुपया थी। आज सिर्फ 10 रुपया है। आदरणीय अध्यक्ष जी, Average हमारे देश में एक नागरिक Average 20 जीबी का उपयोग करता है। अगर उस हिसाब को मैं लगाऊँ तो Average एक व्यक्ति का 5 हजार रुपया बचता है आदरणीय अध्यक्ष जी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जन औषधि स्‍टोर आज पूरे देश में आकर्षण का कारण बने हैं, क्योंकि मध्‍यम वर्ग का परिवार उसको अगर परिवार में सीनियर सिटीजन है, डायबिटीज जैसी बीमारी है, तो हजार, दो हजार, ढाई हजार, तीन हजार की दवाई हर बार महीने लेनी पड़ती है। जन औषधि केंद्र में जो दवाई बाजार में 100 रुपये में मिलती है, जन औषधि में 10 रुपये, 20 रुपये मिलती है। आज 20 हजार करोड़ रुपया मध्‍यम वर्ग का जन औषधि के कारण बचा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

हर मध्यम वर्गीय परिवार का एक सपना होता है खुद का एक घर बने और urban इलाके में होम लोन के लिए की बड़ी व्यवस्था करने का काम हमने किया और रेरा का कानून बनाने के कारण जो कभी इस प्रकार का तत्व मध्‍यम वर्ग की मेहनत की कमाई को सालों तक डूबों कर रखते थे, उसमें से मुक्ति दिलाकर के उसको एक नया विश्वास देने का काम हमने किया और उसके कारण खुद का घर बनाने की उसकी सहूलियत बढ़ गई है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हर मध्यम वर्गीय परिवार को अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए उसकी उच्च शिक्षा के लिए उसके मन में एक मंसूबा रहता है। वो चाहता है आज जितनी मात्रा में मेडिकल कॉलेजेस हों, इंजीनियरिंग कॉलेजेस हों, प्रोफेशनल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई गई है। सीटें बढ़ाई गई हैं। उसने मध्यम वर्ग के एस्‍पीरेशन को बहुत उत्तम तरीके से एड्रेस क्या है। उसको विश्वास होने लगा है कि उनके बच्‍चों का उज्‍जवल भविष्‍य निर्धारित है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

देश को आगे बढ़ाना है, तो भारत को आधुनिकता की तरफ ले जाए बिना कोई चारा नहीं है। और समय की मांग है कि अब समय नहीं गंवा सकते और इसलिए हमने इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ बहुत बड़ा ध्यान दिया है और ये भी मानें, स्वीकारियेगा भारत की एक जमाने में पहचान थी गुलामी के कालखंड के पहले, ये देश architecture के लिए infrastructure के लिए दुनिया में उसकी एक ताकत थी, पहचान थी। गुलामी के कालखंड में सारा नष्ट हो गया। देश आजाद होने के बाद वो दिन दोबारा आएगा, ऐसी आशा थी, लेकिन वो भी समय बीत गया। जो होना चाहिए था, जिस गति से होना चाहिए, जिस स्केल से होना चाहिए था वो हम नहीं कर पाए। आज उसमें बहुत बड़ा बदलाव इस दशक में देखा जा रहा है। सड़क हो, समुद्री मार्ग हो, व्यापार हो, waterways हो, हर क्षेत्र में आज infrastructure का कायाकल्‍प दिख रहा है। Highways पर, रेकॉर्ड निवेश हो रहा है माननीय अध्यक्ष जी। दुनिया भर में आज चौड़ी सड़कों की व्यवस्था होती थी, भारत में चौड़ी सड़कें, highway, expressway, आज देश की नई पीढ़ी देख रही है। भारत में वैश्विक स्‍तर के अच्छे highway, expressway दिखें, इस दिशा में हमारा काम है। पहले रेलवे infrastructure, अंग्रेजों ने जो देकर के गए उसी पर भी हम बैठे रहे, उसी को हमने अच्‍छा मान लिया। गाड़ी चलती थी।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वो समय था, जिस प्रकार से अंग्रेज जो छोड़ करके गए थे उसी भाव में जीते रहे और रेलवे की पहचान क्‍या बन गई थी? रेलवे यानी धक्‍का-मुक्‍की, रेलवे यानी एक्सीडेंट, रेलवे यानी लेटलतीफी, यही यानी एक स्थिति थी लेटलतीफी में एक कहावत बनी गई थी रेलवे यानी लेटलतीफी। एक समय था हर महीने एक्सीडेंट होने वाली घटनाएं बार-बार आती थी। एक समय था एक्सीडेंट एक किस्मत बन गई थी। लेकिन अब ट्रेनों में, ट्रेनों के अंदर वंदे भारत, वंदे भारत की मांग हर एमपी चिट्ठी लिखता है, मेरे यहां वंदे भारत चालू करें। आज रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प हो रहा है। आज एयरपोर्टों का कायाकल्प हो रहा है। सत्तर साल में सत्तर एयरपोर्ट, नौ साल में सत्तर एयरपोर्ट। देश में waterways भी बन रहा है। आज waterways पर ट्रान्स्पोर्टशन हो रहा है। आदरणीय अध्यक्ष जी, देश आधुनिकता की तरफ बढ़े इसके लिए आधुनिक infrastructure को बल देते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मेरे जीवन में सार्वजनिक जीवन में, 4-5 दशक मुझे हो गए और मैं हिन्‍दुस्‍तान के गांवों से गुजरा हुआ इंसान हूँ। 4-5 दशक तक उसमें से एक लंबा कालखंड परिव्राजक के रूप में बिताया है। हर स्तर के परिवारों से बैठने-उठने का, बात करने का अवसर मिला है और इसलिए भारत के हर भू भाग को समाज की हर भावना से परिचित हूँ। और मैं इसके आधार पर कह सकता हूँ और बड़े विश्वास से कह सकता हूँ कि भारत का सामान्य मानवी positivity से भरा हुआ है। सकारात्मकता उसके स्वभाव का, उसके संस्कार का हिस्सा है। भारतीय समाज negativity को सहन कर लेता है, स्वीकार नहीं करता है, ये उसकी प्रकृति नहीं है। भारतीय समुदाय का स्‍वभाव खुशमिजाज है, स्‍वप्‍नशील समाज है, सत्कर्म के रास्ते पर चलने वाला समाज है। सृजन कार्य से जुड़ा हुआ समाज है। मैं आज कहना चाहूंगा जो लोग सपने लेकर के बैठे हैं कि कभी यहां बैठते थे फिर कभी मौका मिलेगा, ऐसे लोग जरा 50 बार सोचें, अपने तौर-तरीकों पर जरा पुनर्विचार करें। लोकतंत्र में आपको भी आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। आधार आज डिजिटल लेनदेन का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण अंग बन गया है। आपने उसको भी निराधार करके रख दिया था। अब उसके भी पीछे पड़ गए थे। उसको भी रोकने के लिए कोर्ट-कचहरी तक को छोड़ा नहीं था। GST को ना जाने क्‍या-क्‍या कह दिया गया। पता नहीं लेकिन आज हिन्‍दुस्‍तान की अर्थव्यवस्था को और सामान्य मानवी का जीवन सुगम बनाने में GST ने एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। उस जमाने में HAL को कितनी गालियां दी गई, किस प्रकार से और बड़े-बड़े फॉरम का misuse किया गया। आज एशिया का सबसे बड़ा हेलीकॉप्टर बनाने वाला हब बन चुका है वो। जहां से तेजस हवाई जहाज सैकड़ों की संख्या में बन रहे हैं, भारतीय सेना के हजारों, हजारों-करोड़ों रुपयों के ऑर्डर आज HAL के पास है। भारत के अंदर vibrant डिफेन्स industry आगे आ रही है। आज भारत defence export करने लगा है। माननीय अध्यक्ष जी, हिन्‍दुस्‍तान के हर नौजवान को गर्व होता है, निराशा में डूबे हुए लोगों से अपेक्षा नहीं है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आप जानते हैं भलीभांति समय सिद्ध कर रहा है जो कभी यहां बैठते थे वो वहां जाने के बाद भी फेल हुए हैं और देश पास होता जा रहा है, distinction पर जाके और इसलिए समय की मांग है कि आज निराशा में डूबे हुए लोग थोड़ा स्वस्थ मन रख के आत्मचिंतन करें।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यहां जम्मू-कश्मीर की भी चर्चा हुई और जो अभी अभी जम्मू-कश्मीर घूम करके आए उन्होंने देखा होगा कितने आन-बान-शान के साथ आप जम्मू-कश्मीर में जा सकते हैं, घूम सकते हैं, फिर सकते हैं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, मैं भी जम्‍मू-कश्‍मीर में यात्रा लेकर के गया था और लाल चौक पर तिरंगा फहराने का संकल्प लेकर के चला था और तब आतंकवादियों ने पोस्टर लगाए थे, उस समय और कहा था कि देखते हैं किसने अपनी माँ का दूध पिया है जो लाल चौक पर आ करके तिरंगा फहराता है? पोस्टर लगे थे और उस दिन 24 जनवरी थी, मैंने जम्मू के अंदर भरी सभा में कहा था, अध्यक्ष जी। मैं पिछली शताब्दी की बात कर रहा हूं। और तब मैंने कहा था आतंकवादी कान खोलकर सुन लें, 26 जनवरी को ठीक 11 बजे मैं लाल चौक पहुंचुंगा, बिना सिक्योरिटी आऊंगा, बुलेटप्रूफ जैकेट के बिना आऊंगा और फैसला लाल चौक में होगा, किसने अपनी मां का दूध पिया है। वो समय था।

माननीय अध्यक्ष जी,

और जब श्रीनगर के लालचौक में तिरंगा फहराया, उसके बाद मैंने मीडिया के लोग पूछने लगे मैंने कहा था, कि आमतौर पर तो 15 अगस्त और 26 जनवरी को जब भारत का तिरंगा लहराता है तो भारत के आयुध, भारत के बारूद सलामी देते हैं, आवाज करके देते हैं। मैंने कहा, आज जब मैं लाल चौक के अंदर तिरंगा फहराऊं, दुश्मन देश का बारूद भी सलामी कर रहा है, गोलियां चला रहा था, बंदूकें-बम फोड़ रहा था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आज जो शांति आई है, आज चैन से जा सकते हैं। सैकड़ों की तादाद में जा सकते हैं। ये माहौल और पर्यटन की दुनिया में कई दशकों के बाद सारे रिकॉर्ड जम्मू–कश्मीर ने तोड़े हैं। आज जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आज जम्मू-कश्मीर में हर घर तिरंगा के सफल कार्यक्रम होते हैं। मुझे खुशी है कुछ लोग हैं, जो कभी कहते थे तिरंगे से शांति बिगड़ने का खतरा लगता था कुछ लोगों को। ऐसा कहते थे कि तिरंगे से जम्मू-कश्मीर में शांति बिगड़ने का खतरा रहता था। वक्त देखिए, वक्त का मजा देखिए- अब वो भी तिरंगा यात्रा में शरीक हो रहे हैं।

और आदरणीय अध्यक्ष जी,

अखबारों में एक खबर आई थी जिसकी तरफ ध्यान नहीं गया होगा। आदरणीय अध्यक्ष जी, उसी समय अखबारों में एक खबर आई थी इसके साथ जब ये लोग टीवी में चमकने की कोशिश में लगे थे। लेकिन उसी समय श्रीनगर के अंदर दशकों बाद थियेटर हाउस फुल चल रहे थे और अलगाववादी दूर-दूर तक नजर नहीं आते थे। अब ये विदेश ने देखा है.

आदरणीय अध्यक्ष जी

अभी हमारे साथी, हमारे माननीय सदस्य नॉर्थ-ईस्‍ट के लिए कह रहे थे। मैं कहूंगा जरा एक बार नॉर्थ-ईस्‍ट हो आइए। आपके जमाने का नॉर्थ-ईस्‍ट और आज के जमाने का नॉर्थ-ईस्‍ट देखकर आइये। आधुनिक चौड़े हाइवे हैं, रेल की सुख-सुविधा वाला सफर है। आप आराम से हवाई जहाज से जा सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट के हर कोने में आज बड़ी और मैं गर्व के साथ कहता हूँ आजादी के 75 साल मना रहे हैं, तब मैं गर्व से कहता हूं 9 साल में करीब-करीब 7500 जो हथियार के रास्ते पर चल पड़े थे, ऐसे लोगों ने सरेंडर किया और अलगाववादी प्रवृत्ति छोड़ करके मुख्‍य धारा में आने का काम किया है।

आदरणीय अध्‍यक्ष जी,

आज त्रिपुरा में लाखों परिवारों को पक्का घर मिला है, उसकी खुशी में मुझे शरीक होने का अवसर मिला था। जब मैंने त्रिपुरा में हीरा योजना की बात कही थी, तब मैंने कहा था हाईवे-आईवे-रेलवे और एयरवे हीरा, ये हीरा का आज सफलतापूर्वक त्रिपुरा की धरती पर मजबूती नजर आ रही है। त्रिपुरा तेज गति से आज भारत की विकास यात्रा का भागीदार बना है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं जानता हूं सच सुनने के लिए भी बहुत सामर्थ्‍य लगता है। आदरणीय अध्यक्ष जी, झूठे, गंदे आरोपों को सुनने के लिए भी बहुत बड़ा धैर्य लगता है और मैं इन सबका अभिनंदन करता हूं जिन्‍होंने धैर्य के साथ गंदी से गंदी बातें सुनने की ताकत दिखाई है, ये अभिनंदन के अधिकारी हैं। लेकिन सच सुनने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं वो कितनी निराशा की गर्त में डूब चुके होंगे इसका देश आज सबूत देख रहा है।

माननीय अध्यक्ष जी,

राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, विचारधाराओं में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ये देश अजर-अमर है। आओ हम चल पड़ें- 2047, आजादी के 100 साल मनाएंगे, एक विकसित भारत बनाकर रहेंगे। एक सपना ले करके चलें, एक संकल्प ले करके चलें, पूरे सामर्थ्य के साथ चलें और जो लोग बार-बार गांधी के नाम पर रोटी सेंकना चाहते हैं- उनको मैं कहना चाहता हूं एक बार गांधी को पढ़ लें। एक बार महात्मा गांधी को पढ़ें, महात्‍मा गांधी ने कहा था- अगर आप अपने कर्तव्यों का पालन करोगे तो दूसरे के अधिकारों की रक्षा उसमें निहित है। आज कर्तव्य और अधिकार के बीच में भी लड़ाई देख रहे हैं, ऐसी नासमझी शायद देश ने पहली बार देखी होगी।

और इसलिए माननीय अध्यक्ष जी,

मैं फिर एक बार आदरणीय राष्ट्रपति जी को अभिनंदन करता हूं, राष्‍ट्रपति जी का धन्यवाद करता हूं और देश आज यहां से एक नई उमंग-नए विश्‍वास-नए संकल्प के साथ चल पड़ा है।

बहुत-बहुत धन्यवाद!